क्यों छटपटा रहे हैं चिदंबरम ?
   दिनांक 07-नवंबर-2018
    - मनोज वर्मा                            
चिदंबरम सहित कांग्रेस के कई नेता भ्रष्टाचार के मामलों में घिरे हैं और पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को जवाब देने नहीं बन रहा
सीबीआई में मचे घमासान पर वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिंदबरम सवाल उठाते हैं कि जांच एजेंसी के भीतर चल रही गड़बड़ियों को देश देख रहा है। इस विनाश के बीज बोने का कौन जिम्मेदार है? चिदंबरम के इस सवाल पर राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने लगे हाथ यह आशंका जता दी कि सीबीआई से लेकर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) तक जो हो रहा है, उससे लगता है कि कहीं यह चिंदबरम के खिलाफ चल रही जांच को प्रभावित करने का षड्यंत्र तो नहीं! माना जाता है कि सुब्रमण्यम स्वामी यूं ही कुछ नहीं बोलते। लिहाजा सीबीआई में मचे घमासान की कडि़यों को चिंदबरम और कांग्रेस से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
दरअसल, चिदंबरम का बयान ऐसे समय आया है, जब सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना को छुट्टी पर भेज दिया गया है। ये दोनों अधिकारी हाल ही में एक घटनाक्रम में आपस में उलझ पड़े थे। सीबीआई प्रकरण के लगभग समानांतर ही एयरसेल मैक्सिस मामले में ईडी ने पूरक आरोप-पत्र दायर किया था। पटियाला हाउस न्यायालय में दाखिल इस आरोप-पत्र में चिदंबरम को पहला आरोपी बनाया गया है। इसमें उनके अलावा अन्य नौ लोगों के नाम भी हैं।
इस मामले की सुनवाई 26 नवंबर को होगी। इससे पूर्व ईडी ने पूर्व दूरसंचार मंत्री दयानिधि मारन, उनके भाई कलानिधि मारन और अन्य के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल किया था। इसमें एजेंसी ने आरोप लगाया था कि चिदंबरम ने मार्च 2006 में मैक्सिस की सहायक कंपनी ग्लोबल कम्युनिकेशन सर्विस होल्डिंग्स लि. को विदेशी निवेश संवर्द्धन बोर्ड (एफआईपीबी) मंजूरी दिलवाई थी। साथ ही कहा है कि चिदंबरम ने वित्त मंत्री रहते हुए अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया। 35 अरब रुपये के एयरसेल मैक्सिस सौदे और तीन अरब पांच करोड़ रुपये के आईएनएक्स मीडिया मामले की जांच के दौरान उनकी भूमिका पर सवाल उठे। संप्रग-1 सरकार के दौरान वित्त मंत्री रहे चिदंबरम के कार्यकाल के दौरान ही एफआईपीबी ने दोनों प्रस्तावों को मंजूरी दी थी। एयरसेल मैक्सिस सौदे में अब तक सीबीआई और ईडी की पूछताछ में सवालों के जवाब देते रहे चिदंबरम व उनके बेटे कार्ति चिदंबरम अब अदालत में सवालों का जवाब देने की कोशिश कर रहे हैं।
इस मामले में चिदंबरम पर वित्त मंत्री रहते हुए कथित तौर पर एयरसेल-मैक्सिस को एफडीआई की मंजूरी देने में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति को नजरअंदाज करने का आरोप है। एयरसेल ने 2006 में 3,500 करोड़ रुपये की एफडीआई लाने के लिए इजाजत मांगी थी, लेकिन वित्त मंत्रालय ने इसे कम करके दिखाया।
ईडी के मुताबिक, वित्त मंत्रालय ने मामले को आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति के पास जाने से बचाने के लिए दिखाया कि एयरसेल ने केवल 180 करोड़ रुपये की एफडीआई के लिए इजाजत मांगी है। उस समय लागू नियमों के मुताबिक, 600 करोड़ रुपये तक के विदेशी निवेश को वित्त मंत्री एफआईपीबी के जरिये मंजूरी दे सकते थे। कार्ति पर आरोप है कि इस मामले में उन्हें पैसे मिले थे। इस मामले में ईडी चिदंबरम से कई बार पूछताछ कर चुका है। चिदंबरम पर कसते शिकंजे के बीच भाजपा ने कांग्रेस पर हमला बोल दिया। हालांकि पी. चिदंबरम लगातार आरोपों से इनकार करते रहे हैं।
बकौल चिदंबरम, अब यह मामला अदालत में विचाराधीन है और वही इस पर फैसला करेगी। वहीं, जांच एजेंसी का कहना है कि आरोप-पत्र पर्याप्त साक्ष्यों पर आधारित है जो ई-मेल के रूप में हैं और कार्ति तथा उनके सहयोगियों के जब्त डिजिटल उपकरणों से प्राप्त किए गए हैं। इस मामले में पहला आरोप-पत्र 13 जून को कार्ति के खिलाफ दाखिल किया गया था। इसमें दावा किया गया था कि एयरसेल-मैक्सिस धनशोधन मामले में रिश्वत के रूप में दो कंपनियों को कथित तौर पर 1.16 करोड़ रुपये मिले थे।
कांग्रेस नेता चिदंबरम एक तरफ सीबीआई और ईडी के सवालों से जूझ रहे हैं तो दूसरी ओर सुब्रमण्यम स्वामी भी उन्हें घेरने में लगे हैं। 2015 में स्वामी ने ही कार्ति चिदंबरम की अलग-अलग कंपनियों के बीच वित्तीय लेन-देन का मामला उठाया था। उन्होंने कार्ति चिदंबरम पर आईएनएक्स मीडिया से गैरकानूनी तरीके से धन लेने और एयरसेल-मैक्सिस विलय से फायदा उठाने के आरोप लगाए। कार्ति चिदंबरम की विभिन्न कंपनियों के बीच वित्तीय लेन-देन का खुलासा करते हुए स्वामी ने आरोप लगाया था कि वित्त मंत्री रहते हुए चिदंबरम ने अपने बेटे कार्ति की एयरसेल-मैक्सिस सौदे से लाभ उठाने में मदद की। इसके लिए उन्होंने दस्तावेजों को जान-बूझकर रोका और अधिग्रहण प्रक्रिया को नियंत्रित किया ताकि कार्ति को अपनी कंपनियों के शेयर की कीमत बढ़ाने का वक्त मिल जाए।
वैसे 2012 में सुब्रमण्यम स्वामी ने टू जी स्पेक्ट्रम मामले में भी चिदंबरम को सह आरोपी बनाने के लिए याचिका दायर की थी जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था। पर स्वामी इस बार कोई मौका चूकना नहीं चाहते। लिहाजा सीबीआई में मचे घमासान पर जैसे ही चिदंबरम ने मुंह खोला, उन्होंने तत्काल उनके खिलाफ मोर्चा संभाल लिया और यह कह कर सनसनी फैला दी कि सीबीआई में अधिकारियों को हटाने के खेल में ईडी के एक वरिष्ठ अधिकारी को भी निलंबित करने की योजना बन रही थी ताकि चिदंबरम के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल न हो सके। अब जबकि चिदंबरम के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल हो चुका है तो कांग्रेस और चिदंबरम को सार्वजनिक तौर पर सवालों का जवाब देना भारी पड़ रहा है।
उधर पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के भ्रष्टाचार के मुद्दों पर पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को जवाब देते नहीं बन रहा है। ऊपर से पी. चिदंबरम के खिलाफ जांच एजेंसियों का कसता शिंकजा भी कांग्रेस के लिए मुश्किलें पैदा कर रहा है। इसलिए कांग्रेस चिदंबरम पर लगे आरोपों के बजाए सीबीआई और अन्य जांच एजेंसियों को लेकर लगातार बयानबाजी कर रही है ताकि जांच करने वाली एजेंसियों को लेकर ही संदेह खड़ा हो जाए। 
क्या है एयरसेल-मैक्सिस सौदा ?
सीबीआई और ईडी यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि कार्ति के पिता पी. चिदंबरम 2006 में जब वित्त मंत्री थे तो उन्होंने (कार्ति) एयरसेल-मैक्सिस करार में विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (एफआईपीबी) से किस प्रकार मंजूरी हासिल की थी।
गौरतलब है कि ईडी और सीबीआई कार्ति चिदंबरम द्वारा 2006 में एयरसेल-मैक्सिस करार के तहत एफआईपीबी की मंजूरी मिलने के मामले की जांच कर रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता चिदंबरम पर आरोप है कि उन्होंने कथित तौर पर एयरसेल-मैक्सिस को एफडीआई के अनुमोदन के लिए आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी को नजरअंदाज कर दिया था।