नोटबंदी ने देश को क्या दिया ?
   दिनांक 09-नवंबर-2018
                                                                                                    - अनुराग ठाकुर        
नोटबंदी सिर्फ़ एक घटना नहीं बल्कि उना से राजेंद्र ठाकुर, दंतेवाड़ा के नंदराम, जोधपुर की चंद्रा देवी और इंदौर से सूरज सिंह (परिवर्तित नाम) की कहानी है।
8 नवंबर की रात को जब प्रधानमंत्री ने देश में काले धन के ख़िलाफ़ एक निर्णायक युद्ध की घोषणा की तो भारत के चार अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले ये चारों भी चार अलग तरीक़े से इस फ़ैसले से प्रभावित हुए।
राजेंद्र ठाकुर,पूरी ईमानदारी के साथ अपना टैक्स जमा करने वाले राज्य के एक सरकारी कर्मचारी अपने घर में जमा छोटी मोटी नगदी को बैंक में जमा करने के लिए घंटों लाइन में लगे रहते थे। क्यों..क्योंकि वह जानते थे कि यह भ्रष्टाचार के खिलाफ इस बड़ी लड़ाई में उनके हिस्से का योगदान था जो वो दे सकते थे।उन्हें पता था कि उनकी इस ईमानदारी और मेहनत का लाभ उनका बेटा देश के प्रमुख संस्थानों में पीएचडी का अध्ययन करने के लिए मिलने वाली छात्रवृत्ति प्राप्त करके उठा सकता है।
दूसरी ओर छत्तीसगढ़ के एक छोर पर नंदराम आसानी से माओवादी हिंसा का शिकार हो सकते थे। लेकिन, अचानक से हुई नोटबंदी से माओवादी गतिविधियों में कमी आ गई। आज नंदराम ज़िला स्तर पर चल रही सरकारी योजनाओं का लाभ उठा कर एक सरकारी खनन कंपनी में काम करते हैं और मेहनत मजदूरी से अच्छी कमाई करके परिवार पाल रहे हैं। इसके साथ ही उनकी बेटी मुखमंत्री रमन सिंह सरकार की मुफ्त बाल-बाल शिक्षा कार्यक्रम के तहत शिक्षा का लाभ उठा कर अपना भविष्य सँवार रही है।
राजस्थान की श्रीमती चंद्रा देवी के पास 2015 तक अपना कोई बैंक खाता नहीं था।उनके पास अपनी कुछ नकदी थी जो वह जोधपुर के पास एक स्थानीय स्कूल में दैनिक मजदूरी के रूप में प्राप्त करती थीं। चंद्रा देवी ने कहा कि नोटबंदी ने उन्हें खुश कर दिया। लेकिन क्यों? क्योंकि नोटबंदी के दौरान उन्होंने अपने आस पास के उन लोगों को भी बैंक तक नगदी लेकर दौड़ते जाते देखा था जो नगदी उनके हिसाब से काला धन के रूप में उनके पास जमा थी। लेकिन सिर्फ़ इतना ही नहीं चंद्रा देवी को प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के माध्यम से 5000 रुपए नकद मिले। वो ख़ुश इसलिए थीं क्योंकि इसका फ़ायदा उनके गर्भ में पल रहे बच्चे को मिल सकेगा जो बाद में देश के निर्माण में अपना योगदान दे सकेगा। चंद्रादेवी को गर्व है कि उनके पास एक ऐसा प्रधानमंत्री है जो उनके बच्चे को एक समृद्ध भविष्य देने के लिए कालाधन वालों पर ऐसी चोट करने की हिम्मत रखता है कि वो ख़ुद अपना कालाधन सरकार तक पहुँचायें।
इस बीच, इंदौर में सूरज सिंह कांग्रेस के नेताओं के उन भाषणों पर मुस्कुराते हैं जो नोटबंदी के नुक़सान गिनाते फिरते हैं। वह कहते हैं, "पिछले चार वर्षों में करदाताओं की संख्या में काफी वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2017-18 में दायर कर रिटर्न की संख्या 6.85 करोड़ हो गई है, जो 2013-14 के बाद से 80% की वृद्धि है। इसके अलावा, करदाताओं की रिपोर्टिंग की संख्या 1 करोड़ से अधिक की आय 1,40,139 तक पहुंच गई है, जो निर्धारण वर्ष (एवाई) 2014-15 और 2017-18 के बीच 60% की वृद्धि है। इसके अलावा, पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित कश्मीर में पत्थरबाजों को फ़ंड उपलब्ध कराने में ख़ासी मुश्किल आने लगी जिसका परिणाम पत्थरबाजी घटनाओं में भारी गिरावट के रूप में देखने को मिलती है।"
सूरज कहते हैं, "कोई मुझे बताए,क्या वाक़ई में नोटबंदी सफल नहीं थी ?"
बहरहाल , शायद कांग्रेस पार्टी जिसने अपनी निजी पार्टियों को चलाने के लिए सार्वजनिक धन उगाहने पर भरोसा किया है, चाहे वह स्वतंत्र भारत का पहला घोटाला हो,जीप घोटाला मामला हो या कोयला घोटाला। कांग्रेस पार्टी जनता की मेहनत की कमाई का दुरुपयोग अच्छे से करती आई है। और फिर,जब वो हमें नोटबंदी पर उपदेश देते हैं, तो उन्हें अनसुना करना और दोगुनी मज़बूती के साथ एक नया भारत बनाने में लगे रहना ही बेहतर होता है
(लेखक लोकसभा सांसद हैं )