सांकरी प्रेमगली में नवजोत
   दिनांक 10-दिसंबर-2018

 पाक आर्मी चीफ (बाजवा) से गले मिलते हुए कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू
तारीखें रटने में हमेशा फिसड्डी रहने के कारण मुझे इतिहास पढने में कभी रूचि नहीं रही. बस कुछ टोटके आजमा कर मोटी-मोटी बातें याद कर लेता था. मिसाल के लिए भक्ति काल के कवियों वाले पाठ में जब पढ़ा कि संत कवि कबीरदास सन 1518 में मगहर में पंचतत्व में विलीन हुए थे और गुरु नानक देव जी ने उनकी मृत्यु के इक्कीस वर्षों के बाद सन 1539 में करतारपुर में पार्थिव शरीर का त्याग किया था तो बस इतना याद रख पाया कि कबीर और नानक दोनों लगभग समकालीन थे. फिर भी हमारे हिन्दी के गुरू जी ने जब एक बार पूछा कि कबीर का देहांत पहले हुआ या गुरु नानक देव जी का तो मैंने फट से बता दिया कि कबीरदास गुरुनानक से कुछ पहले पैदा हुए और कुछ पहले ही मरे भी. इतना ज्ञान कबीर के सिर्फ एक दोहे को याद रखने के कारण बघार सका जिसमे वह कहते हैं “जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहिं’. दोहे की दूसरी पंक्ति भी याद थी ‘प्रेम गली अति सांकरी, जामे दो न समाहिं’ पर वह दूसरी पंक्ति तब मेरी समझ में नहीं आ पायी थी. अब देखता हूं कि गुरु नानक देव जी के पवित्र मृत्युस्थल करतारपुर को जाने वाली गली में पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और उन्ही के मंत्रिमंडल के सदस्य नवजोत सिंह सिद्धू विपरीत दिशाओं में चलने के कारण एक साथ नहीं समा पा रहे हैं तो उस पंक्ति की प्रासंगिकता भी समझ में आ रही है.
सिद्धू करतारपुर जाने वाली उस सांकरी गली के दूसरे छोर पर खड़े पाकिस्तानी सेना के जनरल बाजवा को अपनी उन फौलादी बांहों में जकड़ने के लिए बेताब हैं जिनसे वे कभी पाकिस्तानी क्रिकेट टीम की ज़बरदस्त गेंदों पर छक्के लगाया करते थे. पर रावलपिंडी एक्सप्रेस कहे जाने वाले शोएब अख्तर की बिजली की रफ़्तार वाली तेज़ गेंदों को हवा में उड़ा देने वाली उनकी धुआंधार बैटिंग अब कैसे नज़र आयेगी जब सिद्धू स्वयं एक तिनके की तरह पाकिस्तान प्रेम के बगूले में उड़े जा रहे हैं. कबीर दास को शायद इसका भी इलहाम हो गया था.- “ उठा बगूला प्रेम का तिनका उड़ा अकास, तिन का तिन से जा मिला तिन का तिन के पास.” प्रेम के इस बगूले में होश गंवा कर उड़ते हुए सिद्धू जेनरल बाजवा को झप्पी में बांधेंगे तो उनके सीने में छुपी आई एस आई और आतंकियों की धडकनें कहाँ सुन पायेंगे. प्रेम की इस नयी जोत को जगाने में नवजोत इतना मगन हैं कि उनके कानों में उन्ही के मुख्य मंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह की आवाज़ भी आनी बंद हो चुकी है. कैप्टेन अमरिंदर की वर्जना को वह उतना ही असम्पृक्त होकर पी जाते हैं जितना मीरा बाई राणा के भेजे हुए ज़हर का प्याला पीने में दिखी थीं. मीरा बाई कहती थीं ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोई.’ पाकिस्तान प्रेम की नवजोत जलाते हुए सिद्धू भी अपने मुख्यमंत्री के बारे मे कहते हैं ‘ कैप्टेन साहेब फ़ौज के कप्तान होंगे, मेरे कप्तान तो सिर्फ राहुल हैं, दूसरा न कोई ’
 
सिद्धू कभी नरेन्द्र मोदी के भक्त थे, आजकल राहुल के हैं. क्या पता कब गलियारे के उस पार जाकर कह बैठें ‘मेरे तो इमरान भाई, दूसरो न कोई’ और कोई होगा भी कैसे जब गलियारे के दूसरे छोर पर इमरान भाई बाहें पसारे खड़े हैं, पुचकार के कह रहे हैं ‘भारत के प्रधान मंत्री यदि मोदी की जगह सिद्धू होते तो भारत पाकिस्तान के बीच सारी समस्याएं ख़तम हो जातीं.’ हाफ़िज़ सईद के साथ फोटो खिंचवाते समय सिद्धू की आँखों में जब राहुल के संग इमरान की दस्तरख्वान पर बैठकर पाकिस्तानी बिरयानी खाने के सपने डोल रहे थे तब उन्हें कैसे ध्यान आता कि जिसके साथ वह फोटो खिंचाने में मगन हैं वह दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी हाफ़िज़ सईद है. सिद्धू को प्रेमदिवानी मीरा की तरह लगता है ‘अंसुवन जल सींच सींच प्रेम बेल बोई, अब तो बेल फ़ैल गयी आनंद फल होई ‘ यह दूसरी बात है कि आनंद फल चखने के लिए सिद्धू ने अंसुवन जल से प्रेम बेल को नहीं सींचा है बल्कि खोखले ठहाके लगा लगा कर, टीवी सितारों के साथ गलबहियां डालते डालते वह उस मुकाम तक पहुंचे हैं जहाँ उनकी बाहों में जेनरल बाजवा और इमरान भाई जकड़े हुए हैं. इन दोनों को गलतफहमी है कि उनके हाथ ऐसा प्रभावशाली नेता आ गया है जो सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानियों के मन से 26/11 के मुम्बई के धमाकों की, सीमापार से रोज़ आतंकियों के छद्मवेश में पाकिस्तानी सेना के सैनिकों की घुसपैठ की और उनके द्वारा की गयी निहत्थे नागरिकों की कायराना हत्याओं की तस्वीरें मिटा सकेगा. काश उनमे इतनी समझ होती कि पवित्र करतारपुर गुरुद्वारे तक पहुंचानेवाली सांकरी गली में एक तरफ से पाकिस्तान प्रेम में सुधबुध खो बैठे नवजोत सिद्धू और उनके मतिभ्रष्ट “असली कप्तान” का जाना और दूसरी तरफ से ए के 47 और 56 राइफलों, मशीनगनों और हथगोलों से लैस आतंकियों का भारत की दिशा में आना एक साथ संभव नहीं हो पाएगा।