राममंदिर और सरयू तट का सच
   दिनांक 11-दिसंबर-2018
  - संध्या जैन                  
सरयू नदी तट पर राम जन्मभूमि परिसर का उत्खनन और उससे प्राप्त भग्नावशेष वहां भव्य मंदिर होने के अकाट्य प्रमाण हैं। न्यायालय की देरी विवाद को बिना वजह बढ़ाने का ही काम कर रही है। देर से मिलने वाला ‘न्याय’ कैसे करेगा लोगों को संतुष्ट ?
 रामचबूतरे की सबसे शुरुआती स्थिति दर्शाता उत्खनन से प्राप्त एक भग्नावशेष
छह दिसंबर, 1992 को बाबरी ढांचे के विध्वंस के बाद श्रीराम जन्मभूमि पर पुलिस और अर्द्ध-सैनिक बलों का पहरा और कड़ा हो गया। वहां 2003 में 5 मार्च को तब ऊर्जा का पुन: संचार हुआ जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ (न्यायमूर्ति सुधीर नारायण, एस.आर. आलम और भंवर सिंह) ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई.) को यह पता लगाने के लिए खुदाई करने का निर्देश दिया कि विवादित स्थल पर क्या कोई मंदिर या संरचना थी, जिसे तोड़कर वहां ढांचा बनाया गया।
अदालत के इस निर्देश से बाबरी समर्थक समूह में खलबली मच गई। प्रोफेसर इरफान हबीब, के़ एम़ श्रीमाली, सूरजभान और वकील राजीव धवन ने विरोध जताते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि अदालत अपने आदेश से उस सिद्धांत को मौन न्यायिक मान्यता दे रही है कि किसी भी स्मारक को ढहाना या हटाना जायज है, अगर यह बात प्रमाणित होती है कि वहां पहले से किसी अन्य समुदाय की मजहबी आस्था से जुड़ी संरचना मौजूद थी। देखते ही देखते उनके अब तक बुलंद किए गए दावे की कलई उतरने लगी कि ‘ढांचा खाली भूमि पर बनाया गया था।’ उल्लेखनीय है कि तोजो-विकास इंटरनेशनल प्राइवेट ने उस स्थल का प्रारंभिक ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (जीपीआर) सर्वेक्षण किया था। 17 फरवरी, 2003 को न्यायालय के सामने प्रस्तुत अपनी रपट में उसने प्राचीन संरचनाओं के मौजूद होने की संभावना व्यक्त की थी, लेकिन उसकी पुष्टि पुरातात्विक खुदाई के बाद ही हो सकती थी। इसके बाद अदालत के आदेश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीक्षक पुरातत्वविद् डॉ. बी़ आऱ मनी की देखरेख में ए.एस.आई. ने 12 मार्च से 7 अगस्त, 2003 के बीच उस जगह की खुदाई की। ए.एस.आई. ने 22 सितंबर, 2003 को अदालत में अपनी रपट जमा कर दी।
खुदाई की पूरी प्रक्रिया और उस दौरान मिले प्राचीन शिल्प और स्थापत्य चिह्नों को न्यायिक पर्यवेक्षकों, वकीलों, दलों और उनके नामांकित प्रतिनिधियों की निगरानी में स्थिर और वीडियो कैमरा से दर्ज किया गया। पारदर्शिता बनाए रखने के लिए खुदाई में मिलीं सभी वस्तुओं को संबंधित पक्षकारों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में उसी दिन सील किया गया और फैजाबाद के आयुक्त की ओर से उपलब्ध कराए गए सुरक्षित कक्ष में रखा गया। हर दिन जब जरूरत पड़ने पर कक्ष खोला जाता तो काम हो जाने पर वापस उसी तरह सीलबंद कर दिया जाता।
इस दौरान ए.एस.आई. ने कुल 90 सुरंगें खोदीं। स्थल को पांच क्षेत्रों में विभाजित किया गया-पूर्वी, दक्षिणी, पश्चिमी, उत्तरी और टीला। खुदाई में मिली मुख्य चीजें इस प्रकार हैं-
1. उस स्थल पर उत्तर वैदिक काल यानी ईसा पूर्व पहली शताब्दी (अवधि-1) के दौरान रहने वाले लोगों से जुड़े प्रमाण मिले हैं, जो काले रंग से रंगे सामान का प्रयोग करते थे। इस परत में बर्तन, टूटा सामान, मन्नत टंकी के अवशेष, कांच के मोती, गोलाकर पट्टियां, टूटी हुई पशु मूर्ति, लोहे का चाकू और हरे शीशे का गोलाकार स्तूप, जिसकी एक सतह पर अशोक कालीन ब्राह्मी लिपि में सिद्ध की कथा का चित्रण है और दूसरी सतह खाली है।
2. इसके बाद शुंग कालीन (ईसा पूर्व पहली और दूसरी शताब्दी अवधि-2) संस्कृति के अवशेष मिलते हैं, जिसमें पत्थर और र्इंट की संरचनाओं के निर्माण से जुड़ी पहली गतिविधि दिखाई देती है। इस परत में मिलने वाली चीजों में शामिल थी टेराकोटा की मनुष्य और पशुओं की मूर्तियां, अनाज पीसने की चक्की, पत्थर के ढक्कन का हिस्सा, चूड़ी के टुकड़े और एक मुहर का टूटा हुआ हिस्सा, जिस पर ब्राह्मी लिपि में ‘स’ अंकित था।
3. कुषाण काल (ईसा पूर्व पहली-तीसरी शताब्दी, अवधि 3) की विशिष्ट पहचान थे मिट्टी के बर्तन। अगली परत में एक बड़ी र्इंट की भट्टी, मनुष्य और पशुओं की मूर्तियां, चूड़ी के टुकड़े, मन्नत टंकी का हिस्सा मिला। ये सभी मिट्टी से बनाए गए थे। इनके अतिरिक्त हड्डी का एक हेयरपिन और सुरमा लगाने वाली तांबे की पिन भी मिली थी। यहां पर र्इंट से बनी एक विशालकाय संरचना के अवशेष मिलते हैं, जो बड़ी इमारतों के निर्माण के संकेत देते हैं। खुदाई के इस स्तर पर पत्थर और र्इंटों से इमारत बनाने के सबूत मिले।
 
जन्मभूमि का उत्खनन करने वालों को दिखाई दी जमीन में गहरी धंसी गुप्तकालीन दीवार 
4. भवन निर्माण गतिविधि गुप्त काल (चौथी से छठी शताब्दी- अवधि 4) में भी बनी रही। खुदाई में निकली वस्तुओं में उस समय की विशिष्ट टेराकोटा मूर्तियां और एक तांबे का सिक्का शामिल था, जिसकी एक सतह पर राजा की छवि और दूसरी पर श्रीचंद्र (गुप्त) के साथ एक गरुड़ का चित्रण है। सुंदर नक्काशी वाले बर्तनों के टुकड़े भी मिले।
5. उत्तर गुप्त-राजपूत काल (सातवीं-दसवीं शताब्दी, अवधि 5) की अवधि में तेज किनारे वाले कटोरे मिले हैं और र्इंट से बना एक गोलाकार मंदिर मिला जिसका प्रवेश पूर्व दिशा से है। यह संरचना क्षतिग्रस्त थी, पर इसकी उत्तरी दीवार के पास एक परनाला है जो गंगा-यमुना के मैदानी भाग में पाए जाने वाले समकालीन मंदिरों की एक विशिष्टता थी।
6. प्रारंभिक मध्ययुग कालीन (11वीं -12वीं शताब्दी ई़, अवधि 6) स्तर पर उत्तर-दक्षिण दिशा में लगभग 50 मीटर की विशाल संरचना का अवशेष मिला है। र्इंटों को तोड़कर बनाया गया एक मोटा फर्श भी है जो उत्तर-दक्षिण में स्थित और स्पष्ट रूप से पूर्व की ओर झुकी र्इंट की एक चौड़ी और विशाल दीवार से (दीवार संख्या 17) से जोड़ा गया था। यह संरचना अल्पकालिक रही होगी, क्योंकि उत्खनन के दौरान सामने आए 50 स्तंभों में से सिर्फ चार ही मिले हैं। लाल पत्थर का एक खंडित अभिलेख भी मिला है जो 11वीं शताब्दी का है।
इस संरचना के अवशेषों पर तीन क्रमबद्ध मंजिलों के साथ तीन चरणों (ए, बी, और सी) में पूरी की गई एक विशाल संरचना के निर्माण के प्रमाण मिले हैं (अवधि 7, 12वीं-16वीं सदी) 
चरण ‘क’ - उत्तर-दक्षिण दिशा में लगभग 50 मीटर लंबी एक विशाल दीवार (दीवार संख्या 16) बनाई गई थी, जिसकी नींव पिछली लाल र्इंटों की जमीन को तोड़ कर तैयार की गई। यह नई शैली की संरचना थी। मिट्टी और र्इंट के टुकड़े के साथ चूना मिलाकर फर्श तैयार किया गया, जिस पर स्तंभ बनाए गए थे जिन पर संरचना खड़ी की गई होगी (कुछ खुदे हुए गड्ढों में खंभों के आधार के अवशेष मिले हैं)। यह मंजिल एक पतली दीवार से बंद घेरे में छिपी थी।
चरण ‘ख’ - बंद भाग को मिट्टी से भर दिया गया था और उस पर र्इंटों के टुकड़े बिछाकर रोड़े और र्इंटों के टुकड़े के साथ चूना मिलाकर एक मोटा फर्श तैयार किया गया गया था जो टूटी दीवार के ऊपर बनाया गया था।
चरण ‘ग’- खंभों की नींव ढह गई थी। उनके ऊपर 4-5 सेंटीमीटर मोटा फर्श बना था, जिन पर बलुआ पत्थर के चौरस आधार के अवशेष मौजूद थे। कुछ खंभे अब भी सही हालत में हैं। ज्यादातर खंभों के आसपास की जमीन टूट गई है। खंभों के आधार बहुत खराब हालत में हैं।
इस विशाल संरचना का न्यूनतम आकार उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम दिशाओं में क्रमश: 50 और 30 मीटर था। पिछली संरचनाओं के नक्काशीदार नमूनों और अन्य सजावटी आकृतियों को नए विशाल निर्माण में पुन: प्रयोग किया गया था जिसमें विशाल खंभों वाला कक्ष बनाया गया था।
र्इंट के टुकड़ों की नींव के लगभग 50 खंभे बलुआ पत्थर के ब्लॉक के नीचे स्थित कंक्रीट ब्लॉक के नीचे पाए गए। खुदाई से पता चला है कि उत्तर से दक्षिण तक खंभों के आधारों की 17 पंक्तियां थीं। प्रत्येक पंक्ति में खंभों के पांच आधार-अवशेष थे। खोदे गए 50 स्तंभों में से केवल 12 ही पूरी तरह से दिखाई दिए, 35 का आंशिक हिस्सा मिला और 3 के सिर्फ कुछ अंश ही मिले। अस्थायी रूप से बनाए मंदिर में स्थापित रामलला की उपस्थिति के कारण केंद्रीय हिस्से में खंभों के आधारों को खोजना संभव नहीं हो सका। यह विशाल संरचना आवासीय संरचनाओं से अलग थी और ऐसा मालूम होता था कि सार्वजनिक उपयोग के लिए बनाई गई है। यह अवधि 7 के दौरान लंबे समय तक अस्तित्व में थी।
 
  खुदाई से प्राप्त शिला स्तंभ का निचला हिस्सा
इस विशाल संरचना के ऊपर 16वीं शताब्दी (अवधि 8) में बाबरी ढांचे का निर्माण किया गया था। बाबरी ढांचे के केंद्रीय कक्ष का मुख्य भाग दीवार 16 के बीचोंबीच गिरा था। इसके मुख्य भाग के पूर्व में पश्चिम की ओर निकला हुआ एक गोलाकार गड्ढा था, जो र्इंट से बने एक फुटपाथ पर निकलता था। संभवत: यह जगह गरुड़ के निर्माण के लिए रखी गई होगी।
अवधि 7 के अंतिम चरण में पॉलिश किए गए सामान के टुकड़े मिले हैं जो आगे की अवधियों से संबंधित खंडों में भी मिलते रहे थे। आगे चमकदार टाइल्स के अवशेष भी मिले। बाबरी ढांचे के निर्माण में शायद इनका उपयोग किया गया था। इसी दौरान पोर्सलीन और चीनी मिट्टी के बर्तनों के थोड़े टुकडे मिले। विभिन्न कालखंडों की खुदाई में जानवरों की हड्डियां भी मिलीं, लेकिन उत्तरी और दक्षिणी हिस्से के गड़्ढों में पाए गए कंकालों के अवशेषों की जांच करने पर उन्हें अवधि 9 (बाद की अवधि और उत्तर मुगल काल) का पाया गया।
खुदाई में मिले पुराकालिक अवशेषों की लखनऊ के बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट आॅफ पैलियोबॉटनी द्वारा की गई कार्बन-14 जांच के अनुसार वे 13वीं शताब्दी ईसापूर्व की हैं। इससे हिंदू धारणा और सही साबित होती है कि राम और अयोध्या की कथा कृष्ण और हस्तिनापुर की गाथा की तुलना में पहले से अस्तित्व में थी।
रपट का निष्कर्ष यह है कि विवादित संरचना के नीचे एक विशाल संरचना के पुरातात्विक साक्ष्य मौजूद हैं, जो 10वीं सदी से लगातार संरचनात्माक रूप से बरकरार रहे जिनके ऊपर विवादित ढांचा खड़ा किया गया। खुदाई में मिलीं टूटी हुर्इं मूर्तियां, नक्काशीदार वास्तुशिल्पों के अवशेष, उत्तर में परनाला के साथ एक गोलाकार मंदिर, विशाल ढांचे से जुड़े 50 स्तंभ-आधार, उत्तर भारत के मंदिरों के स्थापत्य के विशिष्ट प्रतीक हैं।
इसलिए यह कहा जा सकता है कि बाबरी ढांचा खाली भूमि पर नहीं बनाया गया था और उस स्थल पर पाए गए अवशेष धार्मिक संरचनाओं के थे। बाबरी ढांचे के उत्तरी कक्ष की दीवार 5 मंदिर की पश्चिमी दीवार (डब्ल्यू 16) पर उठाई गई थी और दोनों दीवारों के बीच मिट्टी की कोई परत या कोई और परत नहीं थी। दीवार 5 की कोई नींव नहीं मिली। दीवार 5 को भरने के लिए ध्वस्त किए गए मंदिर की र्इंटों का उपयोग किया गया।
ढांचे की दक्षिणी दीवार (दीवार 6) की नींव इसके मध्य और दक्षिण-पूर्वी कोने के नीचे की पिछली अवधि के दो स्तंभ आधारों पर टिकी है। दीवार 6 दीवार 16 के साथ जुड़ी थी। यह स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि दीवार 16 पर बने आले को दीवार 16 के र्इंटों के समान आकार वाली र्इंटों से बंद कर दिया गया था। मूल दीवार के खुले हिस्से में चूने का 2 सेमी मोटा प्लास्टर था, जो दर्शाता है कि दीवार 16 के आलों को मंदिर ध्वस्त करने के बाद और ढांचा बनाने से पहले भरा गया था। आले छोटे देवताओं की स्थापना के लिए थे। बाबरी ढांचे के दक्षिणी कक्ष के सामने की दीवार 7 पूर्व काल के तीन खंभों के आधार पर खड़ी की गई थी जो दूसरी मंजिल के जरिए दीवार 16 से जुड़ी थी। इस प्रकार पहले से मौजूद संरचना की जानकारी होने के बाद भी बाबरी ढांचे का निर्माण किया गया।
नौ सांस्कृतिक अवधियों के दौरान जमी 10़ 80 मीटर मोटी मिट्टी की क्रमबद्ध परतों की प्रकृति दर्शाती है कि वह स्थल न कभी खाली रहा और न ही किसी आवासीय परिसर के तौर पर उपयोग किया गया। खुदाई के दौरान चार मंजिलें सामने आर्इं, जो सही हालत में थीं। मंजिल 2 के नीचे की मंजिल 3 की कार्बन डेटिंग दर्शाती है कि वे 900 से 1030 ईसा पूर्व की हैं। मंजिल 2, जिसमें पचास खंभों के आधार अवशेष मिले स्पष्ट रूप से मंदिर का फर्श रहा होगा। मंजिल 2 के ऊपर स्थित मंजिल 1 ढांचे की थी।
संरचनात्मक अवशेषों की योजना जैसे गर्भ गृह (जहां रामलला वर्तमान में स्थित हैं), अर्ध मंडप और विशाल मंडप के साथ-साथ उत्तर-पूर्व कोने पर मौजूद पुष्करणी, पूराकाल के मंदिरों के क्षतिग्रस्त अवशेष, विशाल दीवारें और पिछले मंदिरों के धार्मिक प्रतीकों का ढांचे की दीवारों में उपयोग आदि साफ तौर पर दर्शाते हैं कि बाबरी ढांचे के निर्माण के समय उन्हें मंदिर के अस्तित्व की जानकारी थी।
राम चबूतरा
ए.एस.आई. की खुदाई से पता चला कि राम चबूतरे का निर्माण कम से कम पांच अलग-अलग चरणों में हुआ था। इसका मूल उपयोग साफ नहीं, यह एक पानी की टंकी भी हो सकती है। विवादित ढांचे के परिसर के अंदर यह एक छोटे से मंच की तरह लग रहा था, लेकिन खुदाई करने के बाद एक विशाल संरचना का आकार सामने आया। यह पूर्व-पश्चिम में लगभग 22 मीटर और उत्तर-दक्षिण अभिविन्यास में लगभग 14 मीटर तक फैला था। चबूतरे का आधार 2़ 67 मीटर गहरा था और यह सात स्तरों से तैयार हुआ था। प्रत्येक स्तर कंक्रीट ब्लॉक से बना था जिसे चूना सुर्खी के गारे से जोड़ा गया था। नींव की परतें नीचे तक गई थीं। इस आधार के ऊपर आठ स्तरों की टंकी जैसी संरचना बनाई गई थी।
उपयोग के तीसरे चरण में इसमें कंक्रीट ब्लॉक और र्इंट के टुकड़े भरे गए। इसके बाद, पूरी सतह पर कंक्रीट और र्इंट के टुकड़े को चूना सुर्खी और गारे में मिलाकर बिछाया गया। इसके ऊपर एक वर्गाकार चट्टान का टुकड़ा रखा गया जो आकार में 40 सेमी ऊंचा और पूर्व-पश्चिम में 1़ 50 मीटर चौड़ा और उत्तर-दक्षिण दिशा में 1़ 55 मीटर लंबा था। यह संरचना के पश्चिम की ओर बढ़े हुए हिस्से में स्थित था। इसके ऊपरी हिस्से का 7 सेमी मोटे चूने के गारे से अच्छे से प्लास्टर किया गया था। टंकी जैसी इस संरचना की कुल ऊंचाई 75 सेमी थी। राम चबूतरा का शुरुआती स्वरूप जेसुइट पादरी और जोसेफ टिफेंथलर (जिन्होंने 1766 और 1771 सदी के दौरान स्थल का दौरा किया था) के विवरण से मेल खाता था। उन्होंने रामचबूतरे को वर्गाकार बॉक्स या वेदी (जमीन से 5 इंच ऊंचा और चूने पत्थर से पुता हुआ) के रूप में वर्णित किया है। वहां आने वाले लोग इसकी तीन परिक्रमा करने के बाद शीश नवाते थे। बाद में चबूतरे की ऊंचाई को दो चरणों में और बढ़ाया गया था। आखिर में ऊपर लखौरी र्इंटों की चार परतें बिछाई गर्इं, फिर चूना सुर्खी के गारे में मिलाकर पिछली संरचना की र्इंटों के टुकड़ों को बिछाया गया। यह शायद मुगल काल के दौरान हुआ। बाद के समय में इस पर सीमेंट से प्लास्टर किया गया जिस पर स्मारक या अलंकृत पत्थर रखा गया जैसा कि प्लास्टर पर अंकित छाप दर्शाती है।
मूर्तियां, प्रस्तर वास्तुशिल्प के अवशेष
खुदाई में कई मूर्तियों और प्रस्तर वास्तुशिल्प के अवशेष जैसे अमलाका, घाट-पल्लव आधार के खंभे जिस पर बौनी आकृतियां भारवाहक के रूप में अंकित हैं, कीर्तिमुख और देवी-देवताओं की युगल आकृतियां और अन्य प्रकार के सामान मिले जो ढांचे के नीचे की संरचना की गैर-मुस्लिम प्रकृति की पुष्टि करते हैं। खुदाई में हाथी, कछुआ और मगरमच्छ की मूर्तियां भी मिलीं। ये सभी टेराकोटा से बने थे। मगरमच्छ पवित्र नदी गंगा का वाहन है, तो कछुआ पवित्र नदी यमुना का वाहन है। दिलचस्प बात यह है कि खुदाई के दौरान न तो इस्लामी मजहबी प्रकृति की कोई कलाकृति या वास्तुकला मिली, न ही 16वीं शताब्दी में बाबरी ढांचे के निर्माण से पहले का कोई शिलालेख। यह खुदाई निश्चित रूप से अयोध्या के इस स्थल के मूल स्वामित्व से जुड़े हिंदू दावे की वैधता सिद्ध करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
(लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं। यह आलेख मीनाक्षी जैन द्वारा लिखी पुस्तक ‘राम और अयोध्या’ (प्रकाशक : आर्यन बुक्स इंटरनेशनल, 2013) पर आधारित है)