अब गूंजे पार्थ के धनुष की टंकार
   दिनांक 13-दिसंबर-2018
   - तरुण विजय               
मर्यादा की रक्षा के लिये उद्धत वीर अपने लक्ष्य में सदैव सफल हुआ करते थे
वे आंखें पथरा-सी गईं जिन्होंने राम मंदिर के लिये अपना बलिदान देने वाले कारसेवकों की रक्तरंजित लाशें अयोध्या की गलियों में देखीं थीं। पर राजनीति का कलुष और निर्मम स्वरूप इतना हृदयविदारक एवं राम के वनवास से बढ़कर संताप देने वाला होता है कि उन हुतात्मा कारसेवकों को बार-बार स्मरण करना भी हमें दिखाई नहीं देता। धनपति और जातिपति कुछ इसी प्रकार ख्ोल खेलते हैं। राम को मूर्ति नहीं चाहिए। राम को तो भक्त का मन और भक्ति का शांत वातावरण चाहिए। अयोध्या को हिन्दुओं ने रणभूमि नहीं बनाया। हिन्दुओं ने तो अयोध्या को युद्ध से रहित, रण से परे अध्यात्म की चरम पावन धरा के रूप में ही देखा और धारण किया। मुसलमानों के बर्बर सिपहसालारों ने राम मंदिर को ध्वस्त किया और उस बर्बरता के वाहक भारतीय सेकुलरों ने हमारे हृदय में बसे राम की भक्ति पर तेजाबी हमले किये। मुझे पिछले सप्ताह दक्षिण कोरिया की यात्रा पर जाने का अवसर मिला और वहां पिछले 50 वर्ष से एक अद्भुत भारत भक्ति का केन्द्र- भारत कला संग्रहालय चला रहीं वयोवृद्ध हिन्दू कला साधिका प्रो. किम से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्हें राष्ट्रपति के.आर. नारायणनन के समय भारत ने पद्मश्री से अलंकृत किया था और श्रीमती इंदिरा गांधी ने भी उन्हें सम्मानित किया था। वे अयोध्या और दक्षिण कोरिया के प्राचीन संबंधों पर शोध कर रही हैं तथा केवल इसी उद्देश्य से कई बार भारत यात्रा कर चुकी हैं कि उन्हें कहीं, किसी तरह अयोध्या में कोरिया की स्मृति को संजोये कोई आलेख, शिलापट्ट या श्रुतिकथा मिल जाये। प्रो. किम किस भारत की साधिका हैं? उस भारत की जिसमें अयोध्यावासी श्रीराम हें। सेकुलरों ने तो उस आयोध्या को ही नहीं बल्कि रामनाम को ही उपहास और तिरस्कार का पात्र इस प्रकार बनाने का प्रयास किया मानो बाबर के हथौड़े राम मंदिर पर चल रहे हैं। वस्तुत: प्रो. किम के मानस का भारत ही वास्तविक भारत है।
 
अयोध्या भारत को परिभाषित करने वाली पूजा है। वह राम का पर्याय और भारत का सूर्योदय है। अयोध्या भारत की पुन: प्राप्ति का संघर्ष है जो हर दल, हर हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई का संयुक्त प्रयास होना चाहिए। हर भारतीय गगनभेदी गूंज के साथ खड़े होकर कहे कि इस देश में भारत में जन्मी आस्थाओं के अनुयायियों से विदेशी हमलावरों ने जिस प्रकार की बर्बरता एवं अमानुषिकता का व्यवहार किया, वह वैश्विक मानवता के प्रति अपराध है और हम आज अपने उन रक्त बंधु हिन्दुओं के साथ खड़े हैं जिन्होंने सदियों तक अत्याचार सहने के बाद भी भारत में वैचारिक स्वतंत्रता पर आंच नहीं आने दी तथा भारत को दुनिया का एकमात्र ऐसा देश बनाया जहां विश्व की हर आस्था और पंथ के अनुयायियों को अपने-अपने विचार और आस्था के पथ पर चलने का पूर्ण स्वतंत्रता है।
क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि जिन आक्रामक मुसलमानों और ईसाइयों ने भारत में हिन्दुओं पर रोंगटे खड़े करने वाले अत्याचार किये और उनके विरुद्ध षड्यंत्र आज तक जारी हैं, उनके परंपरा वाहक अपने ही स्वदेशी बंधु-बांधवों की पीड़ा में तनिक भी सहभागी होने के लिए तैयार नहीं? वह दिन जब भारत के सभी सामाजिक समुदाय इकट्ठे होकर राम, कृष्ण और शिव के काराबद्ध मंदिरों को मुक्त कर तीनों जगह वैदिक पाताकाएं लहराने के लिए तैयार हो जायेंगे वह दिन भारत की वास्तविक स्वतंत्रता का दिन होगा। दक्षिण कोरिया में एक मित्र मिले और उन्होंने भारत में आयोध्या से लेकर शबरीमला तक हिन्दुओं द्वारा सड़कों पर उतर कर संघर्ष करने के समाचारों की चर्चा करते हुए कहा- कि क्या वास्तव में भारत हिन्दू बहुसंख्यक है? क्या ये संभव हो सकता है कि बहुसंख्यक हिन्दू देश में हिन्दुओं के ही सामूहिक धार्मिक अधिकारों और अभिप्साओं की रक्षा के लिये उन्हें इस प्रकार संघर्ष करना पड़े मानो वे किसी इस्लामिक अरब देश में क्षुद्र अल्पसंख्यक समुदाय हों? क्या इसमें दोष अहिन्दुओं का या दोष रीढ़हीन, शौर्यहीन, लक्ष्यहीन हिन्दुओं का है? वे हिन्दू कहां गये जो अर्जुन के उपासक थे और जिनके धनुष की प्रत्यंचा की टंकार धर्म शत्रुओं के हृदय को भय से कंपा देती थी और मर्यादा की रक्षा के लिये उद्धत, वीर अपने लक्ष्य में सदैव सफल हुआ करते थे? यह तो पुन: अयोध्या समय है। आपका धन, वैभव, पद, प्रतिष्ठा और लोगों को बड़े-बड़े पदों पर बैठाने या अपने पगों तले कुचलने का अहंकार सब समय के प्रवाह में उस तरह मिट्टी में मिल जायेगा जिस तरह गजनवी के हमले में मुंह मोड़ने वालों के नाम या भगत सिंह के खिलाफ लाहौर की अदालत में गवाही देने वाले भारतीयों के नाम मिट्टी में मिल गये। अब तो बस एक ही बात उठे— हम सब एक दूसरे के सहयोगी भारतीय द्वेष-विद्वेष से परे अयोध्या में जय श्रीराम कहते हुए रामलला को प्लास्टिक के छत्र से बाहर निकाल विश्व में अनुपम श्रीराम मंदिर के गर्भगृह में अश्रुसिक्त आंखें, क्षमा में कंपकंपाते जुड़े हाथों और श्रद्धावनत मांथे से प्रतिष्ठित करेंगे, विराजित करेंगे, पूजित करेंगे। यही होगी अर्जुन की प्रत्यंचा की टंकार। हिन्दुओ अब की बार हिन्दुओं से छल ना होने देना।
(लेखक राज्यसभा के पूर्व सांसद हैं)