‘क्रिश्चियन’ तोते में अटकी कांग्रेस की जान
   दिनांक 13-दिसंबर-2018
इतालवी में ‘सिग्नोरा’ हिन्दी के ‘श्रीमती’ सरीखा संबोधन है। लेकिन किसी सिग्नोरा को घेरने घोटाले का भूत भी इटली से बरास्ता दुबई होते हुए भारत चला आएगा, किसने सोचा था?
 सीबीआई गिरफ्त में क्रिश्चियन मिशेल
दो बरस पहले की बात है। अगस्ता वेस्टलैंड की आहट से देश की सबसे पुरानी पार्टी के सूरमा सहम गए थे। सोशल मीडिया पर जिनकी तुरंत गिरफ्तारी का तूफान उठा था, वह उसे जंतर-मंतर पर औपचारिक गिरफ्तारी देकर किसी तरह ठंडा करना चाहते थे। कांग्रेस ने 6 मई, 2016 को संसद का घेराव किया। सोनिया और राहुल के नेतृत्व में पार्टी के तमाम नेता और कार्यकर्ताओं ने दिल्ली के जंतर-मंतर से पैदल मार्च किया।
मगर याद कीजिए, सड़क पर गर्मी दिखाने वाली कांग्रेस सदन के भीतर ठंडी पड़ी थी। संसद में अगस्ता वेस्टलैंड पर चर्चा से कांग्रेस ने जिस तरह कदम खींचा, उससे राजनीतिक विश्लेषक हैरान रह गए। भ्रष्टाचार से जुड़े किसी मामले पर विमर्श से भागती पार्टी का डर और अनमनापन कुछ अलग ही तरह की राजनीतिक आशंकाओं को जन्म दे रहा था। यानी जो सतह पर था केवल वही सच नहीं था। असली बात कहीं नीचे दबी थी।
यह ऐसा मसला था, जिसमें देश के सबसे नामी राजनीतिक कुनबे के नाम दलाली के आरोपों में लिथड़े थे। आरोप यह भी थे कि मीडिया के कुछ नामी-असरदार चेहरे भी रक्षा सौदों के मामले में हवा बनाने और भ्रम फैलाने के एवज में करोड़ों रुपये डकार चुके हैं। विडंबना यह कि भारत में यह मामला एक तरह से दबा ही दिया गया था। मगर अगस्ता का जिन्न इटली के मिलान की अदालतों से फिर बाहर उछल आया। इस बहुचर्चित मामले में दलाली के आरोपी क्रिश्चियन मिशेल का दुबई से भारत लाया जाना कांग्रेस के लिए किसी आफत से कम नहीं है। खासकर ऐसे समय जब पार्टी राज्य चुनावों में जान झोंक कर लड़ रही है। ध्यान देने वाली बात यह है कि राफेल मुद्दे पर ठोस तथ्य जनता के सामने रखने में नाकाम युवराज जब चीख-चीख कर अपना गला बैठा चुके, तब यह जिन्न इस बुजुर्ग पार्टी की छाती पर चढ़ बैठा है।
यानी दूसरे को घेरने निकली पार्टी गफलत में खुद उस गड्ढे में जा गिरी जो उसने कभी अपनी चालबाजियों में खोदा था। किंतु क्या इसे सिर्फ गफलत कहा जा सकता है? शायद नहीं। गफलत नहीं, शायद यह लत है।
वरना, बोफोर्स के बाद रक्षा सौदों में दलाली की कीचड़ फिर उसी परिवार के दामन पर क्यों उछलती? अधिकांश लोग आज भी बोफोर्स प्रकरण की जांच के तरीकों से संतुष्ट नहीं हैं। कभी देश की राजनीति में भूकम्प ला देने वाला बोफर्स कांड अब भले ही बंद किताब हो, लेकिन ओतावियो क्वात्रोकी जैसे इतालवी दलाल की ‘गांधी’ परिवार के ‘घर तक घुसपैठ’ से जुड़ी बदनामी का दाग ऐसा है कि क्वात्रोकी की मौत के बाद भी मिटने वाला नहीं है।
ऐसे में वीवीआईपी हेलीकॉप्टरों की खरीद में दलाली की बात उजागर होने से कांग्रेस का मुखिया परिवार फिर भारी संदेह के घेरे में हैं। इस मामले में मुख्य दलाल क्रिश्चियन मिशेल के हाथ का लिखा नोट एक अन्य मध्यस्थ गुइडो हैशके के यहां 2013 की शुरुआत में मारे गए छापे में मिला। इस नोट के मुताबिक, कुल दलाली 30 मिलियन यूरो की थी जो कि लगभग 242 करोड़ रुपये बैठती है। 12 हेलीकॉप्टरों को खरीदने का सौदा 3,600 करोड़ रुपये में हुआ था। नोट के मुताबिक, वायुसेना अधिकारियों को 6 मिलियन यूरो दिया जाना था जो कि लगभग 48 करोड़ रुपये हुआ। रक्षा मंत्रालय में वरिष्ठ नौकरशाहों को 8.4 मिलियन यूरो यानी लगभग 68 करोड़ रुपये दिए जाने की बात थी। अंतिम श्रेणी राजनैतिक नेताओं की थी, जहां 15़16 मिलियन यूरो दिखाए गए हैं, जो लगभग 122 करोड़ रुपये बैठते हैं।
क्रिश्चियन मिशेल क्या कहेगा, क्या नहीं? यह आने वाले दिन ही बताएंगे, मगर कांग्रेस एक बार फिर लोगों से यदि आग्रह करती है कि इसे किसी ‘खास’ नाम से जोड़ने या समझने की भूल न करें तो क्या लोग इस बात का भरोसा करेंगे?
दरसल, भूल तो इस हल्ले की धूल उठने से पहले ही कोई कर चुका है! किसी ने इस देश को दगा दिया है! कौन है?
इटली में दलाली और दलालों के खुलते चिट्ठों में ‘सिग्नोरा’ को उस सरकार द्वारा किए जा रहे हेलीकॉप्टर सौदे में ‘मुख्य कारक’ बताया गया। यह सिग्नोरा है कौन? क्या वह पार्टी से बड़ी है? क्या वह ‘गांधी’ से भी बड़ी है?
घूस देने वाले जेल की हवा खा चुके हैं। घूस लेने वाले कौन हैं? अदालत, सरकार जो जब करे तब करे, जनता के सामने सिग्नोरा की यह पहेली उसी पार्टी को सुलझानी है, जिसके माथे इटली की आफत पड़ी है।
ठहरिए, यह मुद्दा सिर्फ राजनीतिक रणनीतियों और न्यायपालिका की तारीखों से नहीं बिंध सकता। यह गंभीर बात है कि सिग्नोरा के साथ भारतीय राजनीति के उस पुरखे का उपनाम भी विदेशी अदालत में उछला जिसके लिए भारतीय समाज की भावनाओं को कांग्रेस का शीर्ष परिवार भुनाता रहा।
वैसे यह भी ध्यान देने वाली बात है कि कांग्रेस एक पार्टी नहीं, बल्कि सत्ता और परस्पर हितों के संतुलन का पूरा पारिस्थितिक तंत्र है। इस दल का मुखिया परिवार इस पूरे पारिस्थितिक तंत्र को बांधे-चलाए रखने वाली धुरी है। ऐसे में धुरी की जरा-सी डगमगाहट पूरे तंत्र को अस्थिर कर देती है। साथ ही, पार्टी और यह पूरा पारिस्थितिक तंत्र मानता है कि कांग्रेस को सत्ता केवल गांधी-नेहरू परिवार के नेतृत्व में ही मिल सकती है। राजीव गांधी की असामयिक और दुखद हत्या के बाद जब सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान संभालने से इनकार कर दिया था तो यह बुजुर्ग पार्टी न सिर्फ सत्ता से बाहर रही, बल्कि टूट और छीजन का भी शिकार हुई।
सोनिया के कमान संभालते ही फिर से चीजें सधी हुई लगने लगी थी। यानी कुनबे के उपनाम को सत्ता की कुंजी मान लिया गया। ‘गांधी’ मतलब कुर्सी ! सात दशक के लोकतांत्रिक सफर में कांग्रेस की राजनीति ने यह साबित कर दिया कि उनके लिए ‘गांधी’ सिर्फ वोट है। लेकिन इटली की अदालत से पता चला कि बात इससे भी घिनौनी है- सिग्नोरा के लिए गांधी सिर्फ नोट है!
क्या गांधी वही थे जो ‘सिग्नोरा गांधी’ संबोधन से लिथड़ी करतूतों में नजर आते हैं?
जाहिर है, अगस्ता की आहट ने फिर से कांग्रेस तंत्र की सांसें फुला दी हैं। कोई हैरानी नहीं कि मीडिया सहित समाज जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में फैला यह पारिस्थितिक तंत्र फिर कांग्रेस नेतृत्व के सुर में सुर मिलाता दिखाई दे।
मामले को फिर उसी तरह दबाने की कोशिश हो, जिस तरह 2013 में इसे दफनाया गया था। परंतु लगता नहीं कि चुनावी साल में यह मुद्दा दफन होगा। जिन्न अब चिराग से बाहर है, क्योंकि रक्षा सौदों में दलाली का चिराग घिसना कुछ लोगों की आदत रही है।
सनद रहे, सिग्नोरा तुम्हें सामने आना होगा! ‘गांधी’ से अपना रिश्ता बताना ही होगा!