मुस्लिम लीग की राह पर चल रही पीएफआई
   दिनांक 14-दिसंबर-2018
पी.एफ.आई. मुस्लिम लीग की राह पर चल रही है और इसके पीछे उन राजनीतिक दलों का ‘हाथ’ है, जो वोट के लिए कट्टरवादियों की हर गतिविधि का समर्थन करते हैं
एक प्रशिक्षण शिविर में पी.एफ.आई. के रंगरूट (फाइल चित्र)
पिछले कुछ बरसों में मुस्लिम चरमपंथी गुट पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पी.एफ.आई.) और उसकी राजनीतिक इकाई सोशल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ इंडिया (एस.डी.पी.आई.) का अच्छा-खासा विस्तार हुआ है। इसके पीछे सेकुलर दल हैं, जो उनकी गलत बात को भी मान लेते हैं। कांग्रेस और एस.डी.पी.आई. के बीच जिस तरह के संबंध बन रहे हैं, उनसे यही लगता है कि इन दोनों के बीच कोई समझौता हो चुका है। इसी संबंध को पुष्ट करने वाले कुछ प्रसंगों पर यहां चर्चा जरूरी है। मई, 2018 में संपन्न कर्नाटक विधानसभा चुनाव में एस.डी.पी.आई. ने कांग्रेस का नैतिक समर्थन किया था। इन दिनों हो रहे तेलंगाना के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में मुसलमानों के लिए ऐसी-ऐसी बातें कही हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि यदि वह सत्ता में आई तो वहां ‘शरिया कानून’ लागू होगा। इसी कड़ी में एक और बात है, जिस पर गौर करना जरूरी है। नवंबर माह के अंत में एस.डी.पी.आई. ने दिल्ली के प्रेस क्लब में एक संवाददाता सम्मेलन किया। इस अवसर पर मुस्लिम पॉलिटिकल काउंसिल आॅफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. तस्लीम अहमद रहमानी ने कहा, ‘‘अगर 5,00,000 लोग अयोध्या में राम मंदिर के लिए जुट सकते हैं, तो एस.डी.पी.आई. की खुद की अपनी ही इतनी ताकत है कि वह मस्जिद बनाने के लिए 25,00,000 लोगों को जुटा सकती है।’’ यहां यह जानना दिलचस्प है कि रहमानी का एस.डी.पी.आई. से कोई संबंध नहीं है। इसके बावजूद उन्होंने उस संवाददाता सम्मेलन में मुख्य भूमिका निभाई। दरअसल, जितने भी मुसलमान नेता हैं, उनमें से प्राय: सभी यह मानकर चल रहे हैं कि विरोधियों को हराने के लिए सभी मुसलमानों को एकजुट होना होगा और उसी सोच के तहत ये लोग एस.डी.पी.आई. को मजबूती देने में लगे हैं। एस.डी.पी.आई. में अभी इतनी ताकत नहीं है कि वह अपनी बातों को नीति में बदल सके। इसलिए वह कांग्रेस से दोस्ती बढ़ाने में लगी है। उसे लगता है कि उसकी बात कांग्रेस ही मान सकती है, क्योंकि उसका इतिहास मुस्लिम तुष्टीकरण का रहा है।
मुस्लिम वोट बैंक की अवधारणा अंग्रेजों की मानसिकता की उपज है। अंग्रेजों ने मुस्लिम तुष्टिकरण का भरपूर उपयोग ‘फूट डालो, राज करो’ की नीति में किया। बाद में इस नीति को कांग्रेस और वामपंथियों ने भी अपनाया। वामपंथियों ने तो पश्चिम बंगाल और केरल में मुस्लिम तुष्टीकरण में सारी हदें पार कर दीं। यही कारण है कि एक तरफ केरल इस्लामिक कट्टरवाद की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बनकर उभरा, तो दूसरी ओर पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश से आने वाले मुस्लिम घुसपैठियों के लिए स्वर्ग ही बन गया।
अब थोड़ा इतिहास की ओर रुख करते हैं। 1921 में मोपला में भयानक दंगे हुए थे। इसमें लगभग 10,000 हिन्दुओं की हत्या हुई थी और लगभग 1,00,000 हिन्दुओं को बेघर होना पड़ा था। यही नहीं, लगभग 20,000 हिन्दुओं को इस्लाम स्वीकार करना पड़ा था। अंग्रेजी सेना के हस्तक्षेप के बाद वह कत्लेआम रुका था। समय बीतता गया और कई हिंसक घटनाएं और दंगे होते रहे।
1924 में ‘समस्त केरल जम ईयथुल उलेमा’ नामक एक संगठन इस्लाम को वहाबी विचारधारा से बचाने के लिए सामने भी आया, लेकिन बात बनी नहीं।
इंडियन मुस्लिम लीग की स्थापना 1937 में की गई, जिसमें केरल का अपना एक अहम् हिस्सा था। जमात-ए-इस्लामी-ए-हिन्द का गठन 1941 में किया गया। 1948 में इंडियन मुस्लिम लीग का पुनर्जन्म हुआ और इस बात को लीग ने हमेशा जताने का प्रयास किया कि वह जिन्ना वाली मुस्लिम लीग से बिल्कुल ही अलग है, जबकि सिर्फ इंडियन मुस्लिम लीग नाम होने के कारण ही वह हमेशा कट्टरवादी मुसलमानों की पहली पसंद बनी रही।
1950 में ‘केरल नदवतुल मुजाहिदीन’ नामक एक सामाजिक संगठन का जन्म हुआ। ऐसे कई संगठन समय- समय पर उभरे और उन्होंने अपनी कट्टरता के माध्यम से मुस्लिम समाज के बीच पैठ बनाने का प्रयास भी किया। इसी क्रम में स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आॅफ इंडिया, जो ‘सिमी’ के नाम से जाना जाता है, की स्थापना 1977 में उत्तर प्रदेश में की गई थी। इस पूरे क्रम में केरल में मुस्लिम वोट कमोबेश मुस्लिम लीग के पास ही बना रहा। इसका सबसे बड़ा कारण यही रहा था कि वह इस समय तक भी केवल मुसलमानों की भारत की एकमात्र पार्टी थी। 1967 में माकपा ने एक कदम आगे बढ़ाया और मुस्लिम लीग को सरकार में आने का न्योता दिया। इसके बाद से ही केरल के दोनों राजनीतिक गुट माकपा नेतृत्व वाला लेफ्ट डेमोके्रटिक फ्रंट (एल.डी.एफ.) और कांग्रेस नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यू.डी.एफ.) मुस्लिम वोट बैंक के लिए हमेशा मुस्लिम लीग को रिझाने में लगे रहे। 1991 में अब्दुलनसीर मदनी ने ‘इस्लामिक सेवा संघ’ की शुरुआत की। इसके बैनर तले उसने भड़कीले भाषणों के जरिए पूरे केरल में अपनी पैठ बनाने की कवायद शुरू की। अयोध्या की घटना के बाद ‘इस्लामिक सेवा संघ’ पर प्रतिबंध लगा। इसके बाद मदनी ने एक राजनीतिक दल ‘पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी’ का गठन कर सीधे राजनीति में प्रवेश किया।
अयोध्या की घटना के बाद इंडियन मुस्लिम लीग पर अयोध्या मुद्दे को लेकर सक्रिय नहीं रहने के आरोप उसके अपने ही लोगों ने लगाए। इस कारण वह कुछ कमजोर भी हुई। यह माकपा के लिए एक बड़ा मौका था और उसने इंडियन मुस्लिम लीग से एक अलग संगठन ‘इंडियन नेशनल लीग’ का गठन करवाने में सफलता प्राप्त कर ली। ‘इंडियन नेशनल लीग’ में भी एल.डी.एफ. के साथ जाने को लेकर एक राय नहीं थी। इस कारण पुन: इसमें बिखराव भी हुआ।
70 के दशक से ही खाड़ी देशों से केरल आने वाले पैसों में बहुत ही ज्यादा बढ़त दर्ज की जाने लगी थी। जाहिर तौर पर इसका लाभ सबसे ज्यादा मुस्लिम समाज को ही हो रहा था। यही वह समय था जब दुनियाभर में कट्टरवादी इस्लामिक विचारधारा का फैलाव देखा गया। 80 के दशक के अंत तक कश्मीर का मुद्दा भी पूरी तरह गर्म हो गया था, या यूं कहें तो गर्म कर दिया गया था। बाद के दशक में अयोध्या मुद्दे को इन संगठनों ने अपने-अपने तरीके से भुनाने का प्रयास किया। माकपा ने भी इसे एक सुनहरे मौके के रूप में लिया, क्योंकि यह उसे मुस्लिम वोट बैंक में घुसपैठ करने और मुस्लिम लीग को उसी के गढ़ में चुनौती देने का अवसर दे रहा था। इसके बाद माकपा ने हर एक अतिवादी और कट्टरवादी समूह को बढ़ावा देना शुरू किया, चाहे वह मदनी हो या जमात-ए-इस्लामी।
1993 से एक और संगठन ने काम करना शुरू किया, जिसका नाम था ‘नेशनल डेवलपमेंट फ्रंट’ (एन.डी.एफ.)। दोनों बड़े राजनीतिक गुट एल.डी.एफ. और यू.डी.एफ. ने अलग-अलग समय और प्रकार से एन.डी.एफ. का उपयोग और दुरुपयोग भी किया। एन.डी.एफ. के कार्यकर्ताओं ने केरल के मराड समुद्र तट पर एक मामूली नल के विवाद को लेकर आठ हिन्दू मछुआरों की हत्या कर दी। इस मामले में एन.डी.एफ. के 65 गुर्गों को अदालत ने सजा भी सुनाई।
इस घटना के बाद एन.डी.एफ. को प्रतिबंध का भय सताने लगा और उसने फरवरी, 2007 में बेंगलुरु में अपना पी.एफ.आई. में विलय कर दिया। लेकिन तब तक एन.डी.एफ. काफी कुख्यात हो चुका था। कुछ समय तक जमात-ए-इस्लामी-हिन्द और एन.डी.एफ. ने साथ मिलकर काम किया। एक तरफ जमात मुसलमानों के बुद्धिजीवी वर्ग में काम कर रहा थी, वही एन.डी.एफ. जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा था। वर्तमान में पी.एफ.आई. अयोध्या मुद्दे को उठाकर मुस्लिम वोट बैंक के सबसे बड़े हिस्सेदार के रूप में उभरने की कोशिश कर रहा है।
(लेखक पी.एफ.आई. पर शोध कर रहे हैं)