घट-घट में बसे हैं राम
   दिनांक 24-दिसंबर-2018
- संध्या जैन                            
भगवान राम घट-घट और जन-जन में विद्यमान हैं। इसके प्रमाण सदियों पुराने साहित्य, शिलालेख और भित्तिचित्रों में मौजूद हैं। जो लोग श्रीराम के अस्तित्व को ही नकारते हैं, उन्हें इन प्रमाणों को अवश्य देखना चाहिए
 राम सीता की छवि वाला यह सिक्का जिसके दोनों भाग दिख रहे हैं अकबर ने जारी किया था
सूर्य वंश के राजकुमार की गाथा का सबसे प्रामाणिक ग्रंथ ‘वाल्मीकि रामायण’ श्रीराम के जीवन की ऐसी झांकी प्रस्तुत करता है, जो आश्चर्यजनक परिवर्तनों से गुजरती है- राम के राज्याभिषेक की तैयारी, अचानक उनके वनवास की घोषणा और अगले ही पल 14 वर्ष का वनवास, वहां उनकी पत्नी का अपहरण, जिन्हें वापस लाने के लिए एक भयंकर युद्ध और अंत में विजय पताका के साथ अयोध्या में राजा के रूप में पुनरागमन। यह एक उथल-पुथल भरी यात्रा है जो आप राजा नहीं बन सकते से शुरू होकर हिंदू परंपरा के एकमात्र अवतार-राजा के राज्यारोहण पर पूर्ण होती है। बाबरी ढांचा समर्थक इतिहासकारों का दावा है कि श्रीराम एक कल्पना हैं जिनका इतिहास में कोई अस्तित्व नहीं। कांग्रेस की अगुआई वाली संप्रग सरकार ने अपने द्रमुक सहयोगी को खुश करने के उद्देश्य से श्रीराम के अस्तित्व को अस्वीकार करने के क्रम में भारत को श्रीलंका से जोड़ने वाले रामसेतु को मानव-निर्मित मानने से इंकार कर दिया।
12 सितंबर, 2007 को सरकार ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई.) को सर्वोच्च न्यायालय में भारत और श्रीलंका के बीच मानव निर्मित पुल और रामायण के पौराणिक पात्रों के अस्तित्व को सवालों के कटघरे मेंं खड़ा करने के लिए हलफनामा दर्ज करने का निर्देश दिया, जिसने श्रीराम के पूजा संबंधी प्राचीन काल के अभिलेखों को खोजने और संरक्षित करने का प्रामाणिक काम किया है। हलफनामे में कहा गया है, ‘‘रामायण के पौराणिक ग्रंथ प्राचीन भारतीय साहित्य का महत्वपूर्ण अंग हैं, लेकिन इन्हें ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं माना जा सकता जिसके जरिए इनमें वर्णित पात्रों के अस्तित्व और घटनाओं को निर्विवाद रूप से प्रामाणिक सिद्ध किया जाए।’’ ए.एस.आई. ने दावा किया कि पानी के नीचे नजर आने वाली संरचना मानव निर्मित नहीं, बल्कि उथले पानी और बालू पट्टी की प्राकृतिक रचना है, जो कई सहस्राब्दि से समुद्र की लहरों की गतिविधि और तलछट के इकट्ठा होने से उभरी है। वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने तुरंत प्रधानमंत्री कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई और जनता में उभरे कड़े विरोध ने सरकार को आनन-फानन में हलफनामे को वापस लेने के लिए मजबूर कर दिया।
लगभग एक साल बाद पांच प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव की राह आसान करने के लिए कांग्रेस ने सेतुसमुद्रम परियोजना से हाथ झाड़ते हुए उसे भाजपा की अगुआई वाली राजग सरकार की ओर से उठाया गया कदम बताया। लेकिन अक्तूबर, 2008 में नौवहन और सड़क परिवहन मंत्री और द्रमुक नेता टी़ आऱ बालू, जो परियोजना के मुख्य योजनाकार थे, ने अदालत में एकतरफा हलफनामा दायर किया। इसके अुनसार, ‘‘रामसेतु को राम ने स्वयं नष्ट कर दिया’ था और यह संरचना हिंदू धर्म का अभिन्न अंग नहीं थी।’’ इस हलफनामे में ‘कोई भी पात्र जीवित नहीं’ के आधार को बदलकर ‘राम ने स्वयं सेतु को नष्ट कर दिया की दलील प्रस्तुत की गई।’ इसका साफ अर्थ था कि राम का अस्तित्व था, रावण के साथ युद्ध हुआ था, और राम ने भारत लौटने पर पुल को नष्ट कर दिया था। वैज्ञानिक साक्ष्य दिसंबर, 2017 में सामने आए जब अमेरिकी ‘साइंस’ चैनल ने जोर देकर कहा, ‘‘भारत और श्रीलंका को जोड़ने वाला रामसेतु मानव निर्मित था, प्राकृतिक नहीं। वहां किसी दूर स्थान से लाए गए पत्थरों को बालू पट्टी के ऊपर रखा गया गया है और शीर्ष पर रखा गया है यानी प्राकृतिक रूप से मौजूद एक संरचना पर मनुष्यों ने एक पुल बनाया था।’’ अब, पौराणिक काल से श्रीराम की आस्था से जुड़े साहित्यिक संदर्भों, अभिलेखों और मूर्तिकला संबंधी साक्ष्यों के विशाल कोश में से चंद बिंदुओं पर नजर डालेंं-
साहित्यिक प्रमाण
रामायण का उद्भव संभवत: अयोध्या के इक्ष्वाकु शासित कौशल क्षेत्र में हुआ था, जहां चारण राम के कष्टसाध्य जीवन की कथा बांचते थे। गंगा के दक्षिण तट पर स्थित आश्रम में रहने वाले ऋषि वाल्मीकि ने अंत:प्रेरणा से इन कथाओं के सभी सूत्रों को पिरोकर एक महाकाव्य की रचना की, जिसे लोकगायकों ने कंठस्थ किया और देशभर में घूम-घूम कर जनसाधारण के बीच गाकर सुनाया। यह ग्रंथ लगभग 24,000 छंदों में गढ़ा गया है जिसमें सात काण्ड हैं। प्रो़ हरमन जैकोबी का दावा है कि वाल्मीकि कृत रामायण में पांच काण्ड थे। बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड बाद में जोडेÞ गए जिनमें राम को विष्णु का अवतार कहा गया था। सात काण्डों में रचा गया ग्रंथ द्वितीय-तीसरी शताब्दी तक पूरा हो गया था। जैकोबी ने स्वीकार किया कि जोड़े गए नए काण्ड मूल पाठ में निहित एक ही भाव में गढ़े गए थे और उनमें कोई पक्षपातपूर्ण संशोधन नहीं किया गया था।
रामायण की जहां संस्कृत भाषा में 25 से अधिक अनुकृतियां हैं, वहीं स्थानीय भाषाओं में भी इसके कई संस्करण मौजूद हैं। फादर कामिल बुल्के की गणना में यह संख्या 300 तक पहुंची थी, लेकिन वाल्मीकि की लिखी कथा सर्वाधिक लोकप्रिय रही और उसे रामकथा के सबसे पुराने संस्करण के रूप में व्यापक मान्यता प्राप्त है। वाल्मीकि की कथा से ही राम के भगवान अवतार की मान्यता विकसित हुई।
 
 भगवान राम और सुग्रीव के बीच हुई भेंट को दर्शाता एक प्राचीन दुर्लभ चित्र
विदेशों में रामायण
रामायण ने शुरुआती शताब्दी में भारत के बाहर कदम रखा जब 251 ईस्वीं के दौरान कांग-सें-हुई ने रामायण को जातक कथा के रूप में चीनी भाषा में रूपांतरित किया और 472 ईस्वीं में केक्या ने अति प्राचीन संस्कृत पाठ से ‘दशरथ जातक का निदान’ का अनुवाद किया। छठी शताब्दी में सिंहल के कवि राजा कुमारदास ने श्रीलंका की सबसे शुरुआती संस्कृत कृति ‘जानकी हरण’ की रचना की। 7वीं शताब्दी में कंबोडिया के खमेर उद्धरणों ने रामायण को लोकप्रिय बनाया। नौवीं शताब्दी के अंत में रामायण का एक पूर्वी ईरानी संस्करण ईरानी बोली खोतानी में लिखा गया। राम की प्रसिद्धि तिब्बत से एशिया के सुदूर उत्तरी भूभाग तक फैलने लगी, जहां सातवीं-नौवीं सदी में लिखी पांडुलिपियों के दो संस्करण मिले। 1075 ईस्वीं में लिखी वाल्मीकि कृत रामायण की सबसे पुरानी पांडुलिपि नेपाल में संरक्षित है।
रामायण के बौद्ध और जैन संस्करण
तीन शुरुआती बौद्ध ग्रंथों-‘दशरथ कथानम’, ‘अनामकम जातकम’ और ‘दशरथ जातक’ में रामचरित दिखाई देता है। पहली-दूसरी शताब्दी ईस्वी में लिखी गई ‘दशरथ कथानम’ का मूल पाठ अब उपलब्ध नहीं, लेकिन 472 ईस्वीं का चीनी अनुदित संस्करण अब भी मौजूद है। इसमें सीता का कोई जिक्र नहीं है और राम को निर्वासन के दौरान पहाड़ पर निवास करते बताया गया है। ‘अनामकम जातकम’ में भी रामायण का एक अलग ही स्वरूप प्रस्तुत किया गया है, जिसमें किसी भी चरित्र का उल्लेख उसके नाम से नहीं है। ‘दशरथ जातक’ जेतवन में गौतम बुद्ध का वर्णन करता है, जहां वे पिता की मृत्यु से शोकसंतप्त एक व्यक्ति को सलाह दे रहे हैं, ‘‘बंधु, जो पूरी दुनिया की आठ स्थितियों को भलीभांति जान चुका हो उसे पिता की मृत्यु पर कोई शोक नहीं होना चाहिए।’’ बुद्ध ने राम की कहानी सुनाई और कहा कि पूर्व जन्म में वही राम थे। यह दिलचस्प है, क्योंकि यह उस विचारधारा को नकारता है जिसके तहत यह आरोप लगाया गया, ‘‘बुद्ध को विष्णु का अवतार मानना हिंदू परंपरा में बाद की अवधि में स्थापित और राजनीतिक रूप से प्रेरित दलील थी।’’
जैनियों ने राम को अपनी 63 विभूतियों (श्लाकापुरुष) में स्थान दिया है जो मूलत: 100-200 ईस्वीं से संबंधित साहित्य है। रामकथा का सबसे पुराना जैन संस्करण संघदास (तीसरी या चौथी शताब्दी ईस्वी) की ‘वासुदेवहिन्दी’ है, जो प्राकृत में लिखी गई है। अन्य प्राकृत कार्यों में श्रीमहावीर के बाद रची गई विमल सूरि की ‘पउम चरिउ’ शामिल है। तीसरी प्रमुख जैन कृति ‘उत्तरापुर’ है जिसे गुणभद्र ने संस्कृत में रचा थी। ये सभी वाल्मीकि कृत कथा पर आधारित थीं।
संस्कृत, अपभ्रंश और प्राकृत में रामकथा के कई अन्य जैन संस्करण हैं। जैन साहित्य के अनुसार, ‘‘रावण को लक्ष्मण ने मारा था, क्योंकि राम एक परम आत्मा थे, जिन्होंने अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर ली थी और मनुष्य के रूप में यह उनका आखिरी जन्म था और वह किसी का वध नहीं करना चाहते थे।’’
मध्यकालीन युग
मध्यकालीन युग के भयावह अनुभवों ने मध्य भारत में राधा-कृष्ण जैसे कोमल भाव प्रवण पात्रों की रचना की। लेकिन हिंदू बुद्धिजीवियों ने हिंदू समुदाय की ऊर्जस्व जुझारू भावना के प्रतीक के रूप में हमेशा राम का आह्वान किया। माधवाचार्य आनंदतीर्थ (जिनका जीवनकाल अनुमानत: 1199-1278 या 1238-1317 ईस्वीं के बीच है) ने महाभारत-तात्पर्य-निर्णय में रामायण की कहानी में सात अध्याय जोड़े और बदरीकाश्रम से दक्षिण तक विजय पताका लहराने वाले विश्व विजेता दिग्विजय राम की छवि प्रस्तुत की। 1293 ईस्वीं के एक तेलुगू अभिलेख के अनुसार, ‘‘उनके उत्तराधिकारी शिष्य नरहरी तीर्थ ने, जो संभवत: श्रीकुरमन तालुका के शासक नरसिम्हा थे, गंजम जिले में चिकाकोल के पास श्रीकुरमन के वैष्णव मंदिर में राम, सीता और लक्ष्मण की मूर्तियों की स्थापना की।’’ 13वीं सदी में रामचंद्र के मंत्री हेमाद्री पंडित, जो देवगिरि के यादव राजा थे, ने एक धर्मनिबंध या आचार संहिता निर्धारित की जिसमें राम को अवतार के रूप में पूजने की विधि दी गई थी। चौदहवीं शताब्दी में रामानंद ने रामानंदी संप्रदाय की नींव रखी, जिसने हिंदू धर्म और हिंदी साहित्य के विकास में प्रमुख भूमिका निभाई। इसमें महिलाओं और पिछड़ी जातियों के लोगों को शामिल किया गया, जिसने गंगा घाटी के सामाजिक वातावरण में थोड़ी सुगबुगाहट पैदा की। उनके शिष्यों में कुछ ब्राह्मणों और जाट राजा धन्ना के अलावा एक कसाई सेन, एक चर्मकार रायदास और एक जुलाहे कबीर शामिल थे। ये सब कई लोगों को हिंदू धर्म में वापस लेकर आए जिन्हें जबरदस्ती मुसलमान बना दिया गया था। तुलसीदास के रामचरितमानस के पहले रामानंद का रामरक्षास्तोत्र ही हिंदी में लिखी एकमात्र कृति थी। रामकथा का मंचन प्राचीनकाल से होता रहा है जिसका पहला संदर्भ ‘हरिवंशम्’ में मिलता है।
देश के कई हिस्सों, विशेष रूप से बनारस में रामलीला समारोह के दौरान रामचरितमानस का मंचन किया जाता रहा है।
 
 राजा रवि वर्मा द्वारा बनाए इस तैल चित्र में श्रीराम को स्वयंवर में धनुष तोड़ते हुए दिखाया गया है।
संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं में रामायण
वामपंथी बुद्धिजीवी यह दावा करते रहे हैं कि रामायण की लोकप्रियता को 19वीं शताब्दी के दौरान आडंबरपूर्ण विचारधारा के वशीभूत होकर बहुत प्रचारित किया गया। लेकिन सचाई यह है कि संस्कृत समेत तमाम क्षेत्रीय भाषाओं में रामकथा तो बहुत पहले से प्रचलित थी और यह सिलसिला मध्यकालीन और आधुनिक युग में भी जारी था।
रामायण के विभिन्न संस्करण उत्तर प्रदेश, पूर्वी भारत (बिहार, बंगाल, असम, मणिपुर, ओडिशा), दक्षिण भारत (आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक), पश्चिम भारत (महाराष्ट्र, गुजरात) से लेकर पंजाब और कश्मीर तक मिलते हैं।
भित्तिचित्रों में विद्यमान प्रमाण
राम ने मूर्तिकारों और कलाकारों को भी प्रेरित किया था। ईसा पूर्व काल की मूर्तियों में रामायण के विभिन्न दृश्यों का चित्रण मिलता है। बाद में पूरी कथा मंदिरों की दीवारों पर चित्रित की गई। जैसे-जैसे रामायण की लोकप्रयिता बढ़ी, शिल्पकार राम, सीता, लक्ष्मण और उनकी सेवा में तत्पर हनुमान की मूर्तियां बनाने लगे।
शिल्प में मिले प्रमाण
कौशाम्बी में मिले ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के टेराकोटा में रावण द्वारा सीताहरण का चित्रण है, जिसमें सीता इस आशा से अपने आभूषण गिराती जा रही हैं कि उनकी मदद से कोई उन्हें ढूंढ लेगा।
मथुरा में कुषाण काल के पत्थर के एक खंभे पर दशरथ को पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराने वाले ऋषि श्रृंगी की कहानी का चित्रण मिलता है। इस खंभे को मथुरा में पुरातत्व सर्वेक्षण संग्रहालय में रखा गया है। गोंडा के कच्ची कुटि और बहराइच से मिले पांचवीं शताब्दी के टेराकोटा पैनलों में एक बंदर को दोनों हाथों से गदा घुमाते हुए तलवार थामे एक योद्धा पर हमला करते दिखाया गया है। इनमें हनुमान की अन्य पराक्रम कथाओं और लक्ष्मण से प्रेम का अनुनय करती शूर्पणखा को भी दिखाया गया है। मथुरा में मिले गुप्तकाल के एक पैनल में रावण को कैलाश की चोटी झकझोरते दिखाया गया है जिसका वर्णन उत्तरकांड में मिलता है। गुप्तकाल के विभिन्न पत्थरों और टेराकोटा पैनलों में रामायण के कई दृश्य चित्रित किए गए हैं- जैसे सीता-हरण के बाद आगे की योजनाओं पर विचार-विमर्श करते राम और लक्ष्मण, एक विशालकाय व्यक्ति को भिक्षा देती एक स्त्री जो स्पष्ट तौर पर बदले वेश में रावण ही है। झांसी जिले के देवगढ़ के प्रसिद्ध गुप्तकालीन दशावतार मंदिर (छठी शताब्दी) के अवेशेषों में राम और कृष्ण की कथाओं को संजोए पत्थरों के पैनल मिले हैं।
बिहार की कलाओं में रामायण का पहला चित्रण नवादा के उत्तर-पूर्व स्थित अफसद के सातवीं शताब्दी के मंदिर में मिलता है। एक शिलालेख में राजा आदित्यसेन और उनकी मां द्वारा विष्णु मंदिर के निर्माण का उल्लेख है और मंदिर के स्तंभ-आधार पर किए गए प्लास्टर पर रामायण की विभिन्न घटनाओं को उकेरा गया है। पहली बार, यहां राम के गंगा पार करने से लेकर चित्रकूट में भरत से मिलने तक की विभिन्न घटनाओं का चित्रण दिखाई देता है।
नालंदा के अन्य मंदिरों में पंचवटी में राम और सीता, अहिल्या का मनुष्य रूप में वापस लौटने समेत, रामायण की विभिन्न घटनाओं का वर्णन मिलता है।
इसी तरह की मूर्तिकला बंगाल (बांग्लादेश समेत), त्रिपुरा, ओडिशा, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, महाराष्टÑ, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा के मंदिरों में भी मौजूद है।
पुरालेखीय साक्ष्य
प्राचीनकाल से रामकथा, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में जन-जन के हृदय में बसी रही है जिसके लिखित साक्ष्य बड़ी संख्या में मौजूद हैं। दूसरी शताब्दी से राम का उल्लेख महाकाव्य के नायक के रूप में होने लगा था और सत्तारूढ़ शासक उन्हें ही अपना आदर्श मानते रहे। सातवाहन राजा, वशिष्ठ-पुत्र पलुमवी (131-159 ईस्वीं) के 19वें राजवंशीय वर्ष के नासिक (महाराष्टÑ) गुफा शिलालेख में राजा के पिता गौतमी-पुत्र सतकर्णी (106-131 ईस्वीं) की प्रशंसा करते हुए उन्हें नभागा-नहुश-जनमेजय-सागर-ययाति-राम-अंबरीष-समान तेजस्वी बताया गया है। माना जाता है कि दूसरी शताब्दी तक महाकाव्य अपने अंतिम रूप में आ चुका था। राम राजाओं के लिए आदर्श के रूप में स्थापित हो चुके थे। हूणों को पराजित करने वाले गुप्त शासक स्कंदगुप्त ने स्वयं की तुलना राम से की थी। कई राजाओं ने राम के सूर्यवंश के वंशज होने का दावा किया और अपने शासनकाल की घटनाओं को रामायण में उल्लिखित प्रकरणों से मिलाने की कोशिश की। राजाओं ने अपने सैन्य विजय की तुलना रावण पर राम की विजय से की। बारहवीं शताब्दी में परंपरागत कथा की रचना (इन्वेंशन आॅफ ट्रेडिशन) हुई, जिसमें राजा स्वयं राम बनने लगे।
पांचवीं शताब्दी ईस्वीं में स्कंदगुप्त शासनकाल या उसके तुरंत बाद के कालखंड के एक प्राचीन शिलालेख में राम का उल्लेख मिलता है। इलाहाबाद जिले में गढ़वा के दशवतारा मंदिर के आधार स्तंभ पर संस्कृत में लिखा है कि वहां अनंतस्वामी के नाम से विष्णु की मूर्ति की स्थापना हुई थी और चित्रकूट स्वामी ने भगवान को इत्र, माला, अगरबत्ती इत्यादि उपलब्ध कराने के लिए दान किया था। यह राम के वनवास के दौरान बिताए प्रारंभिक दिनों का संकेत देता है। विक्रम वर्ष 1166 के गहड़Þवाल राजवंश के मदनपाल और गोविंदचंद्र के दान किए गए ताम्रपत्र में लिखा है कि गोविंदचंद्र ने मदनपाल के घर में जन्म लिया था जो दशरथ पुत्र राम की तरह यशस्वी हुए।
ताम्रपत्र पर सबूत
बाघ (धार जिले) के महाराजा भुलुद के ताम्रपत्र में बाली, नरका, नमुचि, अश्व केशि, कालिया नाग, दशवदन (रावण), कंस, चाणूर, अरिष्ट और शिशुपाल का दंभ तोड़ने वाले विष्णु के लिए बलि, चरू और सत्र जैसे धार्मिक कार्यों को संपन्न करने के लिए पांच गांवों का दान करने का उल्लेख है। विद्वानों ने इस शिलालेख को 366 ईस्वीं के दौरान गुप्त साम्राज्य के शासनकाल का बताया है।
1880 में अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा खोजा गया समुद्रगुप्त (चौथी शताब्दी) का शिलालेख सागर जिले में बीना के दक्षिण तट पर स्थित प्राचीन गांव एरिकीना के एक मंदिर का है। इस क्षतिग्रस्त शिलालेख पर लिखे संस्कृत श्लोक में राजा की शक्ति का वर्णन किया गया है जो पृथु, राघव और अन्य राजाओं से भी ज्यादा श्रेष्ठ था, जो यह दर्शाता है कि राम अन्य शासकों के लिए आदर्श प्रतीक बन गए थे।
  
देवगढ़ (उ.प्र.) के गुप्तकालीन मंदिर से मिला एक शिलापट, जिस पर (बाएं से) राम, सीता और लक्ष्मण के साथ-साथ दाईं ओर नीचे शूर्पणखा को दर्शाया गया है।
नौवीं से तेरहवीं सदी तक के ऐसे कई शिलालेख मिले हैं। रामगुप्त (जिसे चंद्रगुप्त द्वितीय ने अपदस्थ किया था) के बाद उत्तर भारत में राम का नाम लगाने वाले पहले राजा नागभट्ट के पुत्र रामभद्र थे, जिन्होंने नौवीं शताब्दी में गुर्जर प्रतिहार वंश को सशक्त किया। राजा भोज (9वीं शताब्दी) की ग्वालियर प्रशस्ति में दोनों का उल्लेख है।
756 ईस्वीं में अरबों के विरुद्ध बड़ी जीत हासिल करने वाला यह राजवंश स्वयं को राम के भाई लक्ष्मण का वंशज बताता है, जिन्होंने राम के द्वारपाल के रूप में कार्य किया और दूसरों को प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी।
खजुराहो (1002 ईस्वीं) से मिले चंदेल राजा ढंगा के शिलालेख में उन्होंने अपने परदादा विजय के साहसिक कार्यों का गुणगान किया है, जिनका शासनकाल नौवीं शताब्दी में था। उन्होंने भारत और श्रीलंका के बीच नावों का एक पुल बनाया था जैसा कि प्राचीनकाल में राम ने पत्थरों से बनाया था। वर्तमान में छत्तीसगढ़ में कलचुरी-चेदी काल और परमार शासकों के कई शिलालेख आज भी दिखाई देते हैं।
इक्ष्वाकु के अभिलेख
आंध्र प्रदेश की नागार्जुनकोंडा घाटी (तीसरी शताब्दी) में इक्ष्वाकु वंश से जुड़े विजयपुरी में अभिलेख मिले हैं, जो प्राकृत में हैं। तेलुगू और संस्कृत भाषाओं में गुंटूर में विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय के समय के मंगलगिरि शिलालेखों में राम के लिए प्रधानमंत्री सल्वा तिम्मा द्वारा अर्पित अनुदान का उल्लेख मिलता है। गुंटूर में कोडंदरामस्वामी के मंदिर में कृष्णदेवराय के समय के एक राज्यपाल नदीन्दला गोप द्वारा इस राम मंदिर को बड़े उपहार भेंट करने का उल्लेख कोंडविदु के शिलालेख में मिलता है।
चूंकि राम ने अपने वनवास का एक बड़ा समय गोदावरी नदी के किनारे स्थित पंचवटी यानी वर्तमान नासिक जिले में बिताया, महाराष्ट्र के इस हिस्से में राम से जुड़े शिलालेखों की भरमार है। सीता का अपहरण यहीं से किया गया था। नासिक के गुफा शिलालेख सातवाहन राजा वशिष्ठ-पुत्र पलुमावी (131-159 ईस्वी) के शासनकाल के 19वें वर्ष के समय के हैं। प्राकृत भाषा के इन गद्य लेखों से यह बात स्पष्ट होती है कि दूसरी शताब्दी तक राम की पूजा बहुत लोकप्रिय हो चुकी थी।
तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल में रामकथा से जुड़े सैकड़ों ऐसे शिलालेख मिले हैं, जो चौथी शताब्दी के हैं। गुजरात, राजस्थान और हरियाणा में भी राम उतने ही लोकप्रिय थे।
इसी तरह असम में राम का प्राचीनतम उल्लेख ईसा पूर्व 600-650 में महान शासक भास्कर बर्मन के दूबी तामपत्रों में मिलता है। ओडिशा में महाभवगुप्त ययाती प्रथम (प्रारंभिक दसवीं शताब्दी) और महाशिवगुप्त ययाति (मध्य दसवीं शताब्दी) के वक्रतेंटुली और निबिन्ना राजपत्रों और ऐसे कई अभिलेखों में राम का उल्लेख मिलता है।
स्पष्ट है कि मध्यकाल के पहले से ही श्रीराम पूरे भारतवर्ष के आराध्य रहे और मध्यकाल में मानव सभ्यता के सामने जिस तरह की चुनौतियां थीं, उनमें एक आदर्श शासक, मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में श्रीराम की लोकप्रियता बहुत बढ़ गई थी।
(लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं। यह आलेख मीनाक्षी जैन द्वारा लिखी पुस्तक ‘राम और अयोध्या’ (प्रकाशक : आर्यन बुक्स इंटरनेशनल, 2013) पर आधारित है)