कोमल हृदय वाले अटल जी के इरादे भी उनकी तरह ही अटल थे
   दिनांक 25-दिसंबर-2018
-बलबीर पुंज                        
अटल जी की गिनती उन जन नायकों में होती है जो देश के आम जनमानस को बखूबी पहचानते हुए भावुक हृदय से उनके हित की चिंता करते थे, पर मौका पड़ने पर लौहपुरुष सी दृढ़ता भी दिखाते थे
पूर्व प्रधानमंत्री, जननायक और कुशल राजनीतिज्ञ दिवंगत श्री अटल बिहारी वाजपेयी से मेरा निजी परिचय 1980 के दशक में हुआ था। उस कालखंड में वे 1984 के आठवें लोकसभा चुनाव में हार गए थे, बाद में वे राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए। तभी से मुझे उनका स्नेह और आशीर्वाद प्राप्त होता रहा था। अटलजी न केवल आयु में मुझसे लगभग 25 वर्ष बड़े थे, बल्कि जीवन के कई आयामों में श्रेष्ठ थे। वे असाधारण बौद्धिक क्षमता,उच्च राजनीतिक व्यक्तित्व और प्रखर वक्ता आदि गुणों के धनी थे। मैं उस कालखंड में दिल्ली स्थित एक अंग्रेजी दैनिक का साधारण पत्रकार हुआ करता था-इतने भारी अंतर के बावजूद वे मुझसे मित्रवत और स्नेहपूर्ण व्यवहार रखते थे।
वाजपेयी जी की राजनीतिक-कूटनीतिक दक्षता, दूरदर्शिता, वाक्पटुता, बौद्धिकता, पत्रकारिता और कुशल नेतृत्व से संबंधित अनेक प्रसंग सार्वजनिक हैं। 1984 को छोड़कर 48 वर्षों के सार्वजनिक जीवन में 2005 में राजनीति से संन्यास लेने तक अटलजी लोकसभा या राज्यसभा में सांसद रहे। इस दौरान उन्होंने संसद की गरिमा को न केवल ध्यान में रखा, अपितु उसे निरन्तर बढ़ाया भी। निर्विवाद रूप से उनका जीवन वर्तमान समय के युवा और महत्वाकांक्षी राजनेताओं के लिए आदर्श है। वे संभवत: ऐसे एकमात्र भारतीय जननायक रहे, जिन्हें तीन बार देश का प्रधानमंत्री बनने और संन्यास लेने से पूर्व देश के अन्य14 प्रधानमंत्रियों (कार्यकारी प्रधानमंत्री सहित) के साथ अपना संसदीय जीवन साझा करने तथा देश के विकास में योगदान देने का गौरव प्राप्त हुआ था।
25 दिसम्बर, 1924 को शिन्दे की छावनी, ग्वलियर में जन्मे अटलजी छात्र जीवन में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे, जिसका एकमात्र उद्देश्य मातृभूमि की निस्स्वार्थ सेवा करना रहा है। इसी भावना के साथ आज भी देशभर में संघ के लाखों-करोड़ों स्वयंसेवक सक्रिय हैं। जिस राष्ट्रवादी विचारधारा के गर्भ से वर्ष 1951 में भारतीय जनसंघ के रूप में फूटी कोपल 1980 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रूप में विशाल वटवृक्ष बन चुकी थी। आज भाजपा जिस शिखर पर विद्यमान है, उसकी नींव रखने वालों में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, बलराज मधोक, नानाजी देशमुख, सुन्दर सिंह भण्डारी, प्रेमनाथ डोगरा, कुशाभाऊ ठाकरे, भैरोंसिंह शेखावत, आचार्य डी.पी. घोष, पीताम्बर दास, ए. रामाराव, बच्छ राज व्यास आदि के साथ अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी का भी नाम सदा जुड़ा रहेगा।
यूं तो अटल बिहारी वाजपेयी 1947 में पहली बार सांसद बने, किन्तु 1952 में वे लखनऊ (मध्य) से लोकसभा का उपचुनाव भारतीय जनसंघ प्रत्याशी के रूप में लड़ चुके थे, जहां उन्हें हार तो मिली, किन्तु सम्मानजनक 28 प्रतिश्त मत प्राप्त हुए। 1957 में जब दूसरी लोकसभा का चुनाव हुआ, तब भारत जैसे विशाल देश में भारतीय जनसंघ के पास अच्छे उम्मीदवारों का अकाल था। तब पार्टी ने युवा और ओजस्वी अटलजी को तीन स्थानों-लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से खड़ा किया। मथुरा में तो उनकी जमानत ही जब्त हो गई। केवल बलरामपुर में अटलजी कांग्रेस के हैदर हुसैन को 10,000 मतों से पराजित करने में सफल हुए।
दिलचस्प बात यह है कि चुनाव लड़ने से पहले अटलजी बलरामपुर कभी गए ही नहीं थे। इसका उल्लेख करते हुए उन्होंने अपनी आत्मकथा 'मेरी संसदीय यात्रा' में लिखा है-''न मुझे उसके भूगोल का ज्ञान था, न इतिहास का। गोंडा से गोरखपुर के लिए जो छोटी लाइन जाती थी, बलरामपुर का स्टेश्न उसी पर स्थित था। रेलगाड़ी आधी रात को गोंडा से चलती और ब्रह्म मुहूर्त में बलरामपुर पहुंचती थी। मैं छोटी लाइन से सुपरिचित था। ग्वालियर और भिंड के बीच तो लाइन और भी छोटी थी। गाडि़यां आराम से चलती थीं और पहुंचने में काफी समय लेती थीं। मैं गोंडा से गाड़ी में चढ़ा और संकरी-सी बर्थ पर बिस्तर पर सो गया। आंख खुली तो देखा गाड़ी एक स्टेशन पर खड़ी हुई थी। खिड़की खोलकर बाहर देखा तो सैकड़ों कौए स्टेशन पर लगे पेड़ों पर कांव-कांव कर रहे थे। सारा आकाश उससे गूंज रहा था। मैंने पूछा, यह कौन सा स्टेशन है, तो उत्तर मिला, कौवापुर।''
दूसरी लोकसभा में अटलजी भारतीय जनसंघ के तीन अन्य सदस्यों के साथ पहली बार संसद पहुंचे थे, जिन्हें किसी भी प्रकार के कार्य का अनुभव नहीं था। संख्या कम होने के कारण अटलजी को अपने साथियों के साथ न केवल पीछे की बेंचों पर बैठना पड़ता था, अपितु सदन में अपनी बात रखने के लिए समय भी नहीं मिलता था। ऐसे में लोकसभा अध्यक्ष का ध्यान अपनी ओर खींचना टेढ़ी खीर बन गया था। एक बार संसद में बोलने का पर्याप्त समय नहीं मिलने के कारण अटलजी ने विरोध पर सदन का बहिष्कार कर दिया। फिर भी उन्हें बोलने का जितना भी समय मिलता, वे उसका पूरा लाभ उठाते।
उन दिनों अटलजी का प्रिय विषय था विदेश नीति। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ही विदेश मंत्रालय संभाल रहे थे। एक दिन प्रधानमंत्री की उपस्थिति में संसद में अटलजी को पहली बार विदेश नीति पर अपनी बात रखने का अवसर मिला। उनके विचारों से नेहरू काफी प्रभावित नजर आए। उनके उत्तर में नेहरू न केवल युवा अटलजी का उल्लेख किया, बल्कि उनकी प्रशंसा भी की। इस संबंध में देश के पूर्व उपप्रधानमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी अपनी आत्मकथा 'माय कंट्री, माय लाइफ' में लिखते हैं-''जब अटलजी बोल रहे थे, तब पीठासीन अधिकारी ने देखा कि पं. नेहरू उनके विचारों और वाक्पटुता से काफी प्रभावित हो रहे थे।''
 
अटलजी को भारत के संसदीय इतिहास का एक और गौरव प्राप्त हुआ। वह पहले सांसद थे, जिन्होंने भारतीय संसद में किसी विषय पर पहली बार सरकार से श्वेत-पत्र मांगा था।1962 में भारत पर चीनी आक्रमण, जिसमें देश को शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा था, को लेकर आडवाणी जी के वस्तुनिष्ठ अनुसंधान के साथ अटलजी ने संसद में नेहरू सरकार से श्वेत-पत्र मांगा, जिसे स्वीकार किया गया, साथ ही उस दौरान अटलजी ने जो भाषण दिया, वह अब तक के भारत के सर्वश्रेष्ठ संसदीय भाषणों में से एक है।
रणनीतिक रूप से भाजपा ने 1984 के चुनाव में अटलजी को उनकी पुरानी सीट नई दिल्ली के बजाय ग्वालियर से चुनाव लड़वाया, जहां उनकी जीत सुनिश्चित मानी जा रही थी। किन्तु नामांकन के अंतिम दिन कांग्रेस ने वहां अपना प्रत्याशी बदलकर सिंधिया घराने के वंशज माधव राव सिंधिया को चुनाव में उतार दिया। अंतिम क्षणों में हुए इस परिवर्तन से अटलजी संभल नहीं पाए और अपने जीवन का दूसरा लोकसभा चुनाव हार गए। इससे पहले 1962 के तीसरे आम चुनाव में कांग्रेस द्वारा सांप्रदायिक दुष्प्रचार और चुनावी छल के कारण अटलजी बलरामपुर से हार गए थे, किन्तु उसी वर्ष भारतीय जनसंघ ने उत्तर प्रदेश से उन्हें राज्यसभा में भेजा। 1967 में वे बलरामपुर से पुन: विजयी रहे।
 
अटलजी एक भावुक और कवि हृदय व्यक्ति के रूप में विख्यात रहे। किन्तु उनमें एक लौहपुरुष भी छिपा था, जिसे देश ने कारगिल युद्ध के समय देखा था। यह बात नवंबर 1984 की है, जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में सिखों का नरसंहार हुआ था। उत्पातियों की भीड़ प्रेस क्लब के पास रायसीना रोड पर अटलजी के निवास के सामने स्थित टैक्सी स्टैंड को जलाने की कोशिश कर रही थी। उस समय अटलजी सांसद नहीं थे, लिहाजा उनके साथ एक ही सुरक्षाकर्मी मौजूद था, फिर भी वे अकेले ही उपद्रवियों से भिड़ गए। आवास के भीतर कर्मचारी द्वारा संसद मार्ग स्थित पुलिस थाने को सूचित करने और पुलिस बल के घटनास्थल पर पहुंचने में 15-20 मिनट का समय लग गया, तब तक अटलजी अकेले दंगाइयों को रोकते रहे। स्थिति तब तनावपूर्ण हो गई, जब उग्र भीड़ ने उन्हें भी नुकसान पहुंचाना चाहा, किन्तु उनकी हिम्मत देखकर उन्मादी लोग वहां से चलते बने। यह घटना अटलजी के अदम्य व्यक्तित्व की ही परिचायक है। 22 जनवरी, 1992 को एक व्यक्ति ने लखनऊ से दिल्ली की उड़ान भर रहे इंडियन एयरलाइंस के विमान को अगवा कर लिया। उस समय विमान में सवार 48 लोगों पर मौत मंडरा रही थी। उस कालखंड में उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन था। लखनऊ के सर्किट हाऊस में अटलजी ने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ भोजन करना शुरू ही किया था कि तभी तत्कालीन जिलाधिकारी मामले की सूचना ले वहां पहुंच गए। अधिकारी की बात सुनते ही अटलजी ने स्थिति की गंभीरता को समझा और खाना छोड़ तुरंत हवाई अड्डे के लिए रवाना हो गए।
विमान को अगवा कर लखनऊ की ओर रुख करने वाले अपहरणकर्ता ने जब अटलजी के समक्ष समर्पण की मांग रखी, तब सुरक्षा कारणों से उन्हें प्रशासनिक और सुरक्षा अधिकारियों ने सलाह दी कि वे अपहरणकर्ता के सामने न जाएं। किन्तु अटलजी उस सलाह ठुकराते हुए अकेले ही हवाई जहाज में चढ़ गए, जहां उस उग्रवादी ने उनके सम्मुख हथियार डाल दिए। ऐसे कितने राजनीतिज्ञ होंगे, जिन्होंने जनहित के लिए अपनी जान को जोखिम में डाला होगा? अटलजी के विशाल व्यक्तित्व में एक खास बात यह भी थी कि वे गंभीर से गंभीर विषय पर भी विनोदपूर्ण शैली में बातचीत करने की क्षमता रखते थे, जिसमें श्रोताओं को उनकी बात का मर्म भी समझ में आ जाता था और उनकी हंसी भी निकल जाती थी। मेरा मानना है कि विश्व में ऐसे कई युगपुरुषों का जन्म हुआ है,जिन्होंने अपने राष्ट्र और उसके कालचक्र पर अमिट छाप छोड़ी है। उन व्यक्तित्वों के स्वभाव और प्रकृति के कारण उस देश के न केवल राजनीतिक, अपितु नागरिक जीवन के विविध आयाम भी प्रभावित हुए हैं। अटलजी की गणना उसी श्रेणी में होती है। इस वर्ष 16 अगस्त को उनका देहावसान हुआ। आज भले ही अटलजी हमारे बीच नहीं हैं, किन्तु उनके आदर्श, उनकी चुटीली टिप्पणियां, उनका सरल परन्तु गरिमामय व्यवहार सबको सदा याद रहेगा।
(लेखक राज्यसभा के सांसद रहे हैं)