अटल जी साहित्यकार बनना चाहते थे
   दिनांक 28-दिसंबर-2018
             - शिव कुमार                                
शिवकुमार करीब 50 साल सहयोगी के रूप में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ रहे। इस लंबे समय के दौरान उन्होंने अटलजी को जैसा देखा, जैसा जाना उसके आधार पर प्रस्तुत है उनका संस्मरणात्मक आलेख
 
अटल बिहारी वाजपेयी के साथ श्री शिवकुमार  
मैं संघ का स्वयंसेवक हूं, जनसंघ का भी कार्यकर्ता था, तो इस नाते कार्यक्रमों में अटल जी से मुलाकात होती रहती थी। 1957 में पहली बार मुझे उनके साथ जुड़ने का अवसर मिला।
दीनदयाल जी की हत्या के बाद ऐसा लगा कि अटल जी अकेले रहते हैं, किसी को उनके साथ रहना चाहिए। मैंने इस संबंध में उनसे प्रार्थना की। उन्होंने बहुत मना किया। एक मार्मिक बात कही, ''शिव कुमार जी, आप तो परिवार वाले हो। वकालत करते हो और मेरी पार्टी ऐसी नहीं है जो आपको कुछ दे सके या मैं कुछ दे सकूं।'' मैंने कहा, ''मैं जब आपके पास आऊंगा तो अपने सारे पुल तोड़कर आऊंगा। कोई जिम्मेदारी नहीं है मेरे पास। अगर आप सकुशल रहे तो भारतीय जनसंघ फलेगी-फूलेगी और मेरे जैसे करोड़ों लोगों का परिवार अपने आप पल जाएगा। मैं न आप से पद मांगूगा और न ही पैसा।'' अटल जी ने कहा, ''अगर आपकी ऐसी दृढ़ इच्छा है तो चलिए, लग जाइए हमारे साथ।''
इस तरह 1965 से अटल जी के साथ मेरा सफर शुरू हुआ और इस बात का संतोष है कि आखिरी समय भी उनके साथ था। सच कहूं तो अटल जी एक बेहतरीन इनसान थे, जो रिश्ते निभाते थे। इसलिए 50 साल तक साथ निभ गया। मुझे उनका भरपूर स्नेह मिला मिला। राजनीति की राहों पर अटलजी बिंदास चले। वे कवि भी थे, और राजनेता भी। उन्हें भारत रत्न मिला, पर कोई भी पद या पुरस्कार अटल जी से बड़ा नहीं है। वे जिस पद पर बैठे उस पद की गरिमा बढ़ गई। उनमें एक अच्छा गुण था यह भी था कि वे धैर्य से सुनते थे। अगर कोई मिलने आया और उनके पास समय रहा तो उसकी पूरी बात सुनते थे। जब तक कि सामने वाला संतुष्ट न हो जाए, तब तक वे नहीं हटते थे और कोशिश करते थे कि उसकी मदद कर सकें। वे प्रयत्नशील थे। धैर्यवान थे। कम बोलते थे। अटल जी कहा करते थे, ''बोलने के लिए जिह्वा चाहिए और चुप रहने के लिए विवेक। जिसकी नीति ठीक है, जिसकी नीयत ठीक है, उसकी नियति मदद करती है।''
सबको साथ लेकर चलने के पक्षधर, कुशल प्रशासक, छोटे से छोटे कार्यकर्ता की व्यथा सुनने वाले और कुशल पत्रकार ही नहीं, वे सर्वश्रेष्ठ सांसद, विपक्ष के सर्वमान्य नेता थे। सत्ता के उच्च सिंहासन पर पहुंचकर भी अटल जी का यह कहना, ''हे प्रभु! मुझे इतनी ऊंचाई मत देना कि गैरों को गले न लगा सकूं, इतनी रुखाई मत देना...,'' इसलिए मेरी नजर में तो वे राजनीति में ध्रुवतारे की तरह थे। जहां तक राजनीति का सवाल है तो अटल जी की राजनीति और आज की राजनीति में काफी अंतर है। जनसंघ के जमाने में उम्मीदवार ढूंढने पड़ते थे। अब उम्मीदवार टिकट के लिए मारे-मारे फिरते हैं। अटल जी के लिए राजनीति सेवा थी, पेशा नहीं। इसलिए मैंने उन्हें हमेशा राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों पर चिंतन करते देखा-सुना। राष्ट्रीय मुद्दों पर उनका चिंतन वृहद रूप में रहता। निकट की, दूर की सब बातों को सोचते-समझते थे। एक बात और, वे यदि किसी भी बात से असहमत होते थे, तो कहते जरूर थे। लेकिन अंत में जो सबकी राय होती थी, उसे मान लिया करते थे। यही वजह है कई बार कई मुद्दों पर उनकी राय पार्टी से अलग मीडिया में आती थी तो उसके पीछे पार्टी या विचार का विरोध नहीं होता था, बल्कि उनकी निजी राय होती थी। लेकिन सार्वजनिक रूप से उनकी वही राय होती थी जो पार्टी की राय होती थी।
आपातकाल अटल जी के राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में एक मील का पत्थर साबित हुआ। 1975-77 के दौरान अन्य नेताओं के साथ उन्हें भी गिरफ्तार किया गया। 1977 में आपातकाल खत्म होने के बाद भारतीय जनसंघ का जनता पार्टी में विलय कर दिया गया। इसी साल आम चुनाव में लोगों ने कांग्रेस के खिलाफ मतदान किया और जनता पार्टी की सरकार बनी। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। इस सरकार में अटल जी 1977 से 1979 तक विदेश मंत्री रहे और दुनिया में भारत की नई छवि बनाई। 4 अक्तूबर, 1977 को पहली बार उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी में प्रभावशाली भाषण दिया। उन्होंने ऐसा उस समय किया, जब कोई सोच नहीं सकता था कि देश के बाहर हिन्दी में बात की जा सकती है। इसके बाद अटल जी दुनिया भर के बुद्धिजीवियों के बीच चर्चा में आए। उस भाषण को आज भी याद किया जाता है। मैं मानता हूं कि राजनीति में अटल जी दूसरों से अलग इसलिए बने, क्योंकि उन्हें हार को भी सहज भाव से लेना आता था। उन्होंने राजनीति हार-जीत के लिए नहीं, बल्कि विचार के लिए की। उन्हें मालूम रहता था कि वह चुनाव हारेंगे, पार्टी चुनाव हारेगी। किंतु कभी हार से विचलित नहीं हुए, निराश नहीं हुए।
बात 1985 की है, जब ग्वालियर से अटल जी चुनाव हार गए थे। तब दिल्ली हवाई अड्डे पर उनका स्वागत करने के लिए कोई कार्यकर्ता नहीं पहुंचा था। वे बाहर आए तो कुछ पत्रकारों ने उन्हें घेर लिया और कहा कि आप तो बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे। पार्टी की हालत ऐसी कैसे हो गई? उन्होंने कहा, ''देखिए, राजीव गांधी जितना ऊपर उठ सकते थे, उठ गए। हम जितना नीचे गिर सकते थे, गिर गए। अब हमारी बारी है ऊपर उठने की।'' यह कहते हुए वे गाड़ी में बैठे और बोले, ''महेश, बंगाली मार्केट ले चलो। गोलगप्पे खाएंगे।'' अटलजी का जीवन ऐसी सादगी वाली घटनाओं से भरा पड़ा है, जो यह दिखाता है कि वे कितने बड़े दिल के थे। अटल जी एक बार बेंगलुरु से आने वाले थे। उन दिनों बेंगलुरु से फ्लाइट देर से आती थी। मैं पार्टी कार्यकर्ता के साथ फिल्म देखने चला गया। फिल्म लंबी निकली और फ्लाइट समय से आ गई। मैं हवाई अड्डा पहुंचा और देखा कि आने वाले यात्रियों की सूची में अटल जी का नाम भी था। अब मेरे लिए 15 किलोमीटर का सफर 1500 किलोमीटर का हो गया। मुझे लगा आज बहुत गुस्सा होंगे, लेकिन उन्हें बताया कि फिल्म देखने चला गया था इसलिए देर हो गई तो अटल जी ने कहा थोड़ा रुक जाते तो मैं भी फिल्म देखने साथ चलता था।
एक बार अटल जी ने कहा था कि वह राजनीति में नहीं आना चाहते थे, बल्कि साहित्यकार बनना चाहते थे। वे 'पाञ्चजन्य' और 'राष्ट्रधर्म' के संपादक भी रहे। उन्हें कविता के साथ लिखने-पढ़ने का उन्हें बहुत शौक था। कारण, उनके पिताजी भी कवि थे और कविता लेखन का गुण उन्हें विरासत में मिला था। उनका अधिकांश लेखन प्रवास के दौरान होता था। जहां कागज का टुकड़ा मिला, उसी पर कुछ लिख लिया। अटल जी ने कविताएं कभी अपने लिए नहीं लिखीं। उनकी कविताएं समाज और पूरी मानवता के लिए होती हैं। वे अपने जन्मदिन वाले दिन एक कविता जरूर लिखते थे। असल में सरस्वती उनकी जिह्वा पर विराजमान थी। उनकी भाव-भंगिमा शब्द के अनुसार होती थी। उन्हें जानने के लिए उनकी कविताओं को पढ़ना पड़ेगा। अटल जी सभाओं में लोगों का चेहरा देखकर समझ जाते थे कि क्या वे सुनना चाहते हैं? विदेश नीति में उनकी विशेष दिलचस्पी थी और इस पर वे हिन्दी में बात करते थे। जहां तक खाने पीने का सवाल है, अटल जी मिठाइयों के शौकीन थे। वे कह कर मिठाई मंगवाते थे। जयपुर का कलाकंद और घेवर उन्हें बहुत पसंद था। उन्हें खाना बनाना, खाना और खिलाना, तीनों का शौक था। समग्रता में देखता हूं तो पाता हूं कि उनका जीवन राम का आदर्श, कृष्ण का सम्मोहन, विवेकानंद की ओजस्विता, बुद्ध का गांभीर्य और चाणक्य की नीति से परिपूर्ण था।
(मनोज वर्मा से बातचीत पर आधारित)