कुशल संपादक भी थे अटल जी
   दिनांक 29-दिसंबर-2018
 -  राज कुमार शर्मा                             
अटल जी कवि ही नहीं बल्कि एक कुशल संपादक भी थे, उनका लेखकीय मन हमेशा कुछ लिखने या संपादित करने को तैयार रहता था। वे कुछ नया खोज ही लेते थे और फिर उस पर चर्चा करते थे
बात 1983 की है। 'पाञ्चजन्य' के रानी झांसी रोड स्थित कार्यालय के प्रबंधन विभाग में फोन की घंटी बजी। फोन करने वाले ने संपादकीय विभाग से बात करने के लिए संपर्क किया था। फोन श्री अटल बिहारी वाजपेयी के निवास से था। उस समय 'पाञ्चजन्य' के संपादक (स्व.) श्री भानुप्रताप शुक्ल थे, जो कार्यालय से जा चुके थे। मैं संपादकीय विभाग के केबिन से उठकर फोन सुनने गया। उधर से अटल जी के सहायक श्री शिव कुमार की आवाज आई 'अटल जी बात करेंगे।' यह सुनकर एक नए-नए उपसंपादक की हालत क्या हो सकती है, वैसी ही हालत मेरी थी। रोमांच भी कि अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता का फोन, मगर घबराहट भी कि पता नहीं क्या हुआ। खैर, जैसे ही फोन का रिसीवर कान से सटाया, आवाज सुनाई दी- ''संपादक जी, मैं एक पत्र भेज रहा हूं। कृपया उसे प्रकाशित करें। 'रविवार' (पत्रिका) ने एक मनगढ़ंत रिपोर्ट प्रकाशित की है उसी संदर्भ में है।'' मैंने जवाब दिया- ''संपादक जी तो कार्यालय में नहीं हैं। मैं राजकुमार शर्मा बोल रहा हूं। अवश्य ही प्रकाशित करेंगे।'' इसके बाद अटल जी का चिर-परिचित अंदाज- ''धन्यवाद शर्मा जी।''
कालखंड कोई भी रहा हो, मगर अटल जी का व्यक्तित्व काफी ऊंचा था। मैंने यह बात भानु जी को बताई। उन्होंने तपाक से कहा- ''पत्र की बजाय अगर 'पाञ्चजन्य' को साक्षात्कार दें तो अच्छा रहेगा।'' बहरहाल, अटल जी के तीन पृष्ठ वाले संपादक के नाम पत्र (रविवार हेतु) की प्रति 'पाञ्चजन्य' कार्यालय पहुंच चुकी थी। मेरे जैसे नए-नए पत्रकार के लिए बड़ी दुविधा कि एक एक तरफ अटल जी जैसा कद्दावर नेता और दूसरी तरफ वरिष्ठतम संपादक भानु जी। हालांकि दोनों समकालीन प्रचारक थे और उत्तर प्रदेश में साथ-साथ काम कर चुके थे। संपादक के रूप में भानु जी का मत था कि किसी दूसरे समाचारपत्र के खंडन को छापने की बजाय अटल जी साक्षात्कार के माध्यम से अगर अपनी बात रख दें।
उस समय भारतीय जनता पार्टी बनी ही थी और मीडिया में उसे ज्यादा महत्व नहीं मिलता था। अक्सर अनेक पत्र-पत्रिकाओं में ऐसे संपादकों का प्रभुत्व था, जो संघ की विचारधारा के विरोधी थे और भाजपा-संघ विरोधी समाचार व रपट प्रकाशित करते रहते थे। अस्तु, मुझे यह जिम्मेदारी दी गई कि मैं अटल जी को साक्षात्कार देने के लिए राजी करूं। मगर अटल जी साक्षात्कार देने में संकोच कर रहे थे। इस सिलसिले में मेरा कई बार अटल जी के तत्कालीन निवास 6, रायसीना रोड या पार्टी कार्यालय 11, अशोक रोड जाना हुआ, पर साक्षात्कार न हो पाया। भाजपा द्वारा गांधीवादी समाजवाद को अपनाने के कारण अनेक वर्गों में यह धारणा बन गई थी कि पार्टी अपने मूल से कुछ दूर हो रही है। तब 10, राजेंद्र प्रसाद रोड स्थित बंगले में संघ से राजनीतिक क्षेत्र में गए प्रचारक जैसे सुंदर सिंह भंडारी, जगदीश प्रसाद माथुर, प्यारेलाल खंडेलवाल, कैलाशपति मिश्र रहा करते थे। 11, अशोक रोड पर तत्कालीन कार्यालय मंत्री (स्व.) कृष्ण लाल शर्मा रहते थे। शाम को सभी 11, अशोक रोड पर मिलते, बैठकें होती, गपशप होती।
 
इस बीच, 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या का समाचार आया। अटल जी के निवास से फोन कर हमें सूचित किया गया। तब न तो इलेक्ट्रॉनिक चैनल थे, न सोशल मीडिया और न ही मोबाइल। श्रीमती गांधी की हत्या के बाद सिखों के कत्लेआम से पूरा देश दहल चुका था। अटल जी ने अपने निवास के बाहर टैक्सी स्टैण्ड के सिख चालकों को उग्र भीड़ से बचाया। इस कत्लेआम के बाद मुझे 'पाञ्चजन्य' के एक अंक में दिल्ली के दंगा पीडि़त क्षेत्रों तथा राहत शिविरों की रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। उस समय अटल जी ने भी उस अंक के लिए अनेक जानकारियां उपलब्ध कराईं। इसके तुरंत बाद लोकसभा चुनावों की घोषणा हो गई। तब उन्होंने 'पाञ्चजन्य' को साक्षात्कार देने के अनुरोध को सहज स्वीकार कर लिया।
इस तरह श्रीमती गांधी की मृत्यु के बाद उन्होंने साक्षात्कार दिया और लोकसभा चुनाव आते-आते 'पाञ्चजन्य' को एक लंबा साक्षात्कार देने को तैयार हुए और दिया भी। यह साक्षात्कार उन्हें इतना पसंद आया कि 1984 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान जब उनसे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं की ओर से साक्षात्कार के लिए समय मांगा जाता तो वे इसी साक्षात्कार को देते और कहते कि यही काफी है। भाजपा ने उस साक्षात्कार को गुजराती, मराठी, बांग्ला सहित कई क्षेत्रीय भाषाओं में पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया था। उस चुनाव में भाजपा को मात्र दो सीटें मिली थीं। आंध्र प्रदेश के झुनमनकोण्डा से सी. रंगा रेड्डी और गुजरात के मेहसाणा से डॉ. ए.के. पटेल सांसद चुने गए थे। गुजरात के मेहसाणा में चुनाव प्रचार के दौरान अटल जी पर लाठियों से हमला हुआ था और उनके सिर पर चोटें भी आई थीं। मैं एक बार फिर उनका साक्षात्कार लेने उनके घर पहुंचा। उस समय वे दूरदर्शन में अपना भाषण रिकॉर्ड करा कर ही आए थे। उन्होंने उस भाषण को ही साक्षात्कार के रूप में प्रकाशित करने का अनुरोध किया। मेरा अनुमान है कि 1983 से 1987 तक कम से कम उनके एक दर्जन से अधिक साक्षात्कार 'पाञ्चजन्य' में प्रकाशित हुए। ऐसा ही एक वीडियो कैसेट 1984 में पार्टी की हार के बाद बंगलौर (अब बेंगलुरु) में कार्यकर्ताओं के संबोधन का था। जब वह प्रकाशित हुआ तो उन्होंने विशेष रूप से धन्यवाद दिया।
'पाञ्चजन्य' से उनका लगाव अंत तक बना रहा। जब मुझे उनके साथ प्रधानमंत्री कार्यालय में काम करने का अवसर प्राप्त हुआ, तब कई बार 'पाञ्चजन्य' की चर्चा हो जाती थी। वे अपने व्यस्त समय में से कई बार अपने पुराने सहयोगियों की खोज-खबर लेने को कहते। इस कड़ी में 'पाञ्चजन्य' के पूर्व संपादक श्री महेंद्र कुलश्रेष्ठ का पता लगाने के कई प्रयास किए गए। कई बार उन्होंने पूर्व सहयोगियों को मिलने के लिए बुलाया भी। स्व. रामशंकर अग्निहोत्री भी उनसे मिलते रहते थे। स्व. दीनानाथ मिश्र और प्रो. देवेंद्र स्वरूप भी 'पाञ्चजन्य' में उनके सहयोगी रहे, जिनसे वे गपशप करते रहते थे। एक बार किसी कार्यक्रम के लिए उनका भाषण तैयार हो गया, लेकिन आयोजक ने उन्हें कुछ गलत जानकारी दी थी, जिसका पता उन्हें एक दिन पहले लगा। इस बात से वे क्षुब्ध थे। आयोजक के बारे में अतीत में उन्होंने जो प्रशंसा की थी, वह उस प्रारूप में थी। यह देखते ही अटल जी बिफर गए और उसे संशोधित करने को कहा। जब मैंने उनसे आग्रह किया कि वे 'पाञ्चजन्य' के संपादक रहे हैं यदि स्वयं कलम चलाएंगे तो अच्छा होगा और मैंने उन्हें कलम पकड़ा दी।
उन्होंने भाषण के शुरू की 13 पंक्तियों को जिस तरह दो पंक्तियों में संपादित किया, वह उनके कुशल संपादन की एक झलक मात्र थी। ऐसा करते समय उनके चेहरे पर जो संतोष का भाव दिखा, वह एक संपादक जैसा भाव था। उनका लेखकीय मन बार-बार कुछ लिखने को या संपादित करने को तैयार दिखता था। कई बार जब भाषण तैयार कर उन्हें दिए जाते तो वह ऐसा कोई न कोई शब्द या वाक्य ढूंढ लेते और चर्चा करते। तब उनके चेहरे पर लेखक भाव झलकता था। मुझे ऐसे अनेक क्षणों का साक्षी होने का सौभाग्य मिला।