हमारा संविधान और इसके निर्माताओं की भावना
   दिनांक 04-दिसंबर-2018

संविधान की मूल प्रति में अंकित श्रीराम—जानकी का चित्र 
26 नवंबर और 6 दिसंबर— दो ऐसी तिथियां हैं जिनसे भारतीय इतिहास की चार महत्वपूर्ण घटनाएं जुड़ती हैं। 26 नवंबर संविधान दिवस है तो मुंबई हमले की तारीख भी।
6 दिसंबर जहां अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि स्थल से विवादित ढांचा गिराए जाने का दिन है तो बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर का परिनिर्वाण दिवस भी।  संयोग कहें या कुछ और, लेकिन इन चार घटनाओं में सिर्फ इतिहास की राख नहीं है बल्कि इसमें दबे कुछ सुलगते सवाल भी हैं:
— हमारा संविधान कैसा है?
— क्या यह इस देश को पूरी सुरक्षा देता है?
— अयोध्या जैसा मुद्दा हमारे लोकतंत्र और संविधान में क्या अहमियत रखता है? किसी के मन में यह जिज्ञासा भी उठ सकती है कि इस देश-समाज की आस्था, इसके इतिहास, गौरव बिंदुओं और इनके प्रति राष्ट्रीय दृष्टि को लेकर हमारे महापुरुषों के मन में क्या सोच थी। ऐसा हर प्रश्न और जिज्ञासा समाधान के योग्य है।
हम कह सकते हैं कि हमारा संविधान वैसा है जैसा हमारे संविधान निर्माताओं का मन था। कमियां निकालने, छिद्रान्वेषण करने वाले तर्क कितने ही हों, किन्तु इसके बरअक्स सत्य यह है कि समय-समय पर इस देश के महापुरुष भारत के बारे में अपनी उस संकल्पना को व्यक्त करते रहे हैं जो इसकी संस्कृति में निहित है। दुनिया के राजनैतिक नक्शे पर ‘इंडिया’ भले 1947 से नजर आता हो परंतु सांस्कृतिक भारत की बात इस देश के मनीषी ही नहीं, पूरी दुनिया सदियों से कर रही है। खुद बाबासाहेब ने अपने एक आलेख में भारत का वर्णन एक ऐसे देश के रूप में किया है जिसके उत्तर में विशाल पर्वतमालाएं हैं और दक्षिण में अनंत जलराशि, एक ऐसा देश जो ऊपरी तौर पर वानस्पतिक, जैवीय और सामाजिक विविधता से भरा है, किन्तु जिसका मूल ‘एकात्मता’ (यूनिटी फंडामेंटल) है। सो हम कह सकते हैं कि हमारे संविधान में भी विविधता को साधने-सहेजने वाली उसी ‘हिन्दू’ सांस्कृतिक दृष्टि का विस्तार मिलता है। यह सोच एक ही व्यक्ति, इकलौती एकपक्षीय किताब या एक ही देवता (या शक्ति केंद्र) जैसी कठोर, निर्मम और रूढ़ सोच से अलग और वास्तव में प्रगतिशील है।
रहा सवाल संविधान द्वारा देश की रक्षा और अयोध्या जैसे मुद्दे की अहमियत का तो इसका उत्तर साफ है।
संविधान सभा की चर्चाओं के सार में आप यह बात पाएंगे कि कोई नीति-नियम, निर्देश या अधिकार अपने आप में सीमित होता है, क्योंकि इसका परिणाम इसे अपनाने, मानने वालों की भावना पर निर्भर करता है। और यही कारण है कि बिना कर्तव्य के हर अधिकार विकलांग ही होता है। सो, यह बात हमारे संविधान पर भी लागू होती है।
कसाब और उसके साथी अगर मुंबई पर हमले के लिए चढ़ आए तो इसके पीछे संवैधानिक व्यवस्था के सुराखों से ज्यादा, चौकसी में अव्यवस्था और देशघाती तत्वों की सक्रियता पर आंखें मूंदे रखने की प्रवृत्ति जिम्मेदार है।
हमारा संविधान पर्याप्त विस्तृत, अति स्पष्ट और सुधारों के लिए लचीला है। इन विशेषताओं के कारण इसे विश्व के शीर्ष उत्तम संविधानों में गिना जाता है। किन्तु साथ ही यह भी सच है कि देश की रक्षा-सुरक्षा केवल संविधान नहीं, इसे लागू करने, अपनाने वालों की भावना पर निर्भर करती है। देश की संस्कृति और इसकी स्वतंत्रता की रक्षा और संविधान निर्माताओं की सोच बाबासाहेब के उद्धरणों में बार-बार झलकती है।
संविधान सभा में दिया गया उनका भाषण स्वतंत्रता की गारंटी के प्रश्न पर सांस्कृतिक संदर्भों से भरा है। उन्होंने कहा था, ‘‘यह देश आगे गुलाम नहीं होगा, इसकी क्या गारंटी है? हमको आगे पराधीनता का मुंह नहीं देखना पड़ेगा इसकी क्या गारंटी है? यह देश जब पराधीन हुआ उसे हमें ध्यान में रखना चाहिए। जब ‘दाहिर’ आक्रमणकारियों से लड़ रहा था तो उसी की सेना के लोग मीर कासिम की सेना से जाकर मिल गए। पृथ्वीराज चौहान जब मोहम्मद गौरी से लड़ रहा था तो उसी के लोग जाकर मोहम्मद गौरी के साथ मिल गए। जब यह देश अंग्रेजों से लड़ रहा था तो इस देश के लोग अंग्रेजों से जाकर मिल गए...’’
संविधान सभा में बाबासाहेब का यह अंतिम भाषण है। देशभक्ति का आह्वान करता और ऐतिहासिक गद्दारियों की खबर लेता। इस बार (हो सके तो छह दिसंबर को ही) हम सभी को इसे पढ़ना चाहिए।
पुनश्च: भारतीय संविधान के बारे में यह बात कम ही लोग जानते हैं कि यह विश्व का सबसे विस्तृत संविधान है और इसकी मूल प्रति हस्तलिखित है। इसे श्री श्याम बिहारी रायजादा ने लिखा था। और तो और, इस संविधान में श्री राम और जानकी के चित्र भी हैं जो बाद में प्रकाशित होने वाली प्रतियों से हटा दिए गए। राम और अयोध्या जैसे सांस्कृतिक प्रश्न पर और कोई शंका हो तो यह भी जान लीजिए कि गुजरात के सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण प्रधानमंत्री नेहरू की हिचकिचाहट के बावजूद सरदार पटेल की पहल से हुआ था। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद मंदिर के गर्भगृह में प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल हुए थे। सनद रहे कि बाबासाहेब, राजेंद्र बाबू और सरदार पटेल इस देश की संविधान सभा के सदस्य थे।