घाटी में आम लोगों को मुखबिरी के नाम पर बर्बरता से मार रहे आतंकी
   दिनांक 04-दिसंबर-2018
यह पहला मौका नहीं जब घाटी में आतंकियों ने मुखबिर के नाम पर आम नागरिकों का रक्तपात किया हो। इससे पहले वे लोकतंत्र के सिपाहियों, पत्रकारों,पुलिसकर्मियों और नेताओं की हत्या कर अपने हाथ खून से रंगते रहे हैं। लेकिन आतंकियों और पत्थरबाजों की मौत पर आंसू बहाने वाले राजनीतिक दल और अलगाववादी ताकतें आम नागरिकों की मौत पर खामोश हैं
 नदीम मंजूर डार के शव को देख बिलखती उसकी बहन।
आंखों से झरते आंसू, रुंधा हुआ गला और अपने भाई नदीम मंजूर डार के गोलियों से छलनी शव को एकटक देखते हुए नाजिया (परिवर्तित नाम) कहती हैं, ‘‘हमारे भाई की क्या खता थी, जो उसे इस कदर मारा। कौन हैं वे जालिम? ...जिन जल्लादों ने भी उसे मारा, खुदा उन्हें कभी माफ नहीं करेगा, उनको अपने किए की सजा मिलकर रहेगी।’’
दरअसल, पिछले दिनों दक्षिण कश्मीर के शोपियां में आतंकियों ने बर्बरता की सीमाएं पार करते हुए दो निर्दोष युवाओं को मौत के घाट उतार दिया था। हिज्बुल मुजाहिदीन के कुछ आतंकियों ने मुखबिरी के शक में 11वीं के छात्र नदीम मंजूर डार को सफानगरी से रात को पहले अगवा किया, फिर अनजान जगह ले जाकर उसका शरीर छलनी कर दिया। इस साल 16 नवंबर को शोपियां-पुलवामा सीमा पर नदीम का गोलियों से छलनी शव पाया गया। आतंकियों ने आम नागरिकों में खौफ पैदा करने के लिए आईएसआईएस की तर्ज पर इसका वीडियो भी बनाया। हिज्बुल के दुर्दांत आतंकी रियाज नायकू की ओर से जारी एक वीडियो में उसने नदीम की हत्या की जिम्मेदारी लेते हुए कश्मीरियों को धमकाया है। उसने कहा कि जो भी मुखबिरी करेगा, उसका यही हाल होगा। इसलिए सुरक्षाबलों से दूर रहो।
इसी तरह, आतंकियों ने 17 नवंबर को भी शोपियां के सैदपोरा के पाईन गांव से शाहिद अहमद गनी, फारूख अहमद एवं मीमंदर से हाकिब जाविद और ईशफाक अहमद सहित कुलगाम के 19 वर्षीय हुजैफ अशरफ को अगवा कर लिया। आतंकियों ने शाम तक बाकी युवकों को तो छोड़ दिया लेकिन हुजैफ की गला रेत कर हत्या कर दी। उसके शव को हरमार्इं गांव के एक बगीचे से बरामद किया गया। इस पूरे घटनाक्रम पर राज्य के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘‘घाटी में आतंकी संगठन पहले भी आम नागरिकों की पिटाई या उनसे पूछताछ के वीडियो जारी करते रहे हैं, लेकिन किसी नागरिक को गोलियों से छलनी करने का क्रूर वीडियो पहली बार जारी किया गया है। जहां तक मेरा मानना है, आतंकी इस तरह की घटना को अंजाम देकर आम नागरिकों के मन में खौफ भरने का तो काम कर ही रहे हैं, साथ ही वे इसके माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का अहसास करा रहे हैं।’’
आखिर क्यों मारा नदीम को ?
दरअसल, 11वीं के छात्र नदीम मंजूर डार की मौत के पीछे की वजह 6 नवंबर को उसके घर के पास हुई एक मुठभेड़ थी, जिसमें दो आतंकी—इदरीस और आमिर मारे गए थे। आतंकियों को लगता है कि नदीम ने ही सैन्यबलों को दोनों की मौजूदगी की सूचना दी, जिसके बाद यह कार्रवाई संभव हो पाई। खुद आतंकी रियाज नायकू वीडियो में कह रहा है कि हमारे सदस्यों ने इस घटना की जांच की और पाया कि नदीम ने ही मुखबिरी की थी, जिसके बाद उसे मारा है। हालांकि नदीम को जानने वाले इस बात को सिरे से नकारते हैं।
 
 कुलगाम के हुजैफ अशरफ की आतंकियों ने गला रेत कर हत्या कर दी
कश्मीरियों के दुश्मन बनते आतंकी
दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले की रहवासी सायमा का बचपन और पढ़ाई-लिखाई आतंक के माहौल में ही हुई है। इसलिए उनके लिए आतंकी घटनाएं और हत्याएं कोई नई बात नहीं। लेकिन शोपियां की घटना से वे दुखी हैं। पेशे से अधिवक्ता सायमा कहती हैं,‘‘जिस तरह से आतंकियों ने दो निर्दोष लड़कों को बेरहमी से मारा, उससे इलाके में काफी गुस्सा है। कोई भी मजहब इस तरह की हत्या को सही नहीं ठहरा सकता। इस घटना से एक बात साफ है कि आतंकी कश्मीरियों के ही दुश्मन बन बैठे हैं।’’ वहीं शोपियां की ही रहने वाली मुदस्सर कहती हैं,‘‘मेरा परिवार तो खुद इसका भुक्तभोगी है। आतंकियों ने मेरे चचरे भाई जो कि अध्यापक थे, को पहले अगवा किया, फिर उनकी गला रेतकर हत्या कर दी थी। इसलिए मैं इस दुख को बड़े अच्छे से समझती हूं। किसी भी व्यक्ति को शक के आधार पर मार देना, कहीं से भी ठीक नहीं है।’’ ऐसे ही पुलवामा की सामाजिक कार्यकर्ता बेनिश कहती हैं,‘‘आतंकी गतिविधियों के कारण यहां आम नागरिकों का जीना दुश्वार हो गया है। पहले तो यह पुलिस और सेना को ही निशाना बनाते थे लेकिन अब आम नागरिकों के ही खून के प्यासे हो गए हैं। 11वीं कक्षा के नदीम की हत्या पर आतंकी संगठन कोई भी सफाई क्यों न दें, लेकिन उन्होंने एक निर्दोष को बेरहमी से मारा है। घाटी के लोग इसे स्वीकार नहीं करेंगे। यकीनन खुदा उन्हें इसकी सजा जरूर देगा।’’ श्रीनगर की वरिष्ठ अधिवक्ता नाजनीन (परिवर्तित नाम) कहती हैं,‘‘इस घटना ने इनसानियत को शर्मसार किया है। आम कश्मीरियों को मारकर आतंकी अपने ताबूत में आखिरी कील ठोक रहे हैं।’’
ताबड़तोड़ कार्रवाई से बौखलाहट
घाटी के कुछ वरिष्ठ पत्रकार मानते हैं कि यह सुरक्षाबलों द्वारा चलाए जा रहे ‘आॅपरेशन आॅल आउट’ का परिणाम है कि आतंकियों की कमर टूट चुकी है। आए दिन कोई न कोई आतंकी मुठभेड़ में मारा जाता है। इससे बौखलाए दहशतगर्द अपनी उपस्थिति दिखाने के लिए आसान लक्ष्य को निशाना बना रहे हैं। इस मामले में घाटी के वरिष्ठ पत्रकार एवं कश्मीर इमेजिज के संपादक बशीर मंजर ने कहा, ‘‘मुखबिरी के नाम पर आतंकी 90 के दशक से लोगों को मारते आ रहे हैं। उस समय जब आम नागरिकों की हत्याएं ज्यादा हुर्इं तो लोगों ने इसका पुरजोर विरोध किया था। इसी तरह अगर अब भी आतंकी घाटी के लोगों का खून बहाते रहे तो जनता का विरोध होगा और यह उन्हें बहुत भारी पड़ेगा, वे चाहे कितनी ही बंदूकों की धमकी क्यों न दें।’’ एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा,‘‘कोई भी तबका इस तरह की निर्मम हत्या को जायज नहीं ठहरा सकता। नदीम की हत्या का वीडियो जिसने भी देखा, उसमें अकेले नदीम के घर-परिवार, गांव-मोहल्ले के ही लोग नहीं, बल्कि घाटीभर के लोग इस घटना से आक्रोशित दिखे हैं। ये सभी लोग आतंकियों के आका से सवाल कर रहे हैं कि अगर हमारे नाम पर जिहाद कर रहे हो तो फिर हमें क्यों मार रहे हो?’’ वे सुरक्षाबलों की ताबड़तोड़ कार्रवाइयों पर कहते हैं,‘‘यह बिल्कुल सही है कि सुरक्षाबलों के आक्रामक रवैये से कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता, जब घाटी में आतंकी न मारे जाते हों। निश्चित ही इस रवैये से वे हताशा से भर गए हैं, क्योंकि जिनको वे तैयार करते हैं, सुरक्षाबल उन्हें ढेर कर देते हैं। ऐसे में खौफ बनाए रखने के लिए वे आसान शिकार को निशाना बना रहे हैं।’’ हालांकि आतंकरोधी अभियानों में मिलती सफलता को देखकर सुरक्षा एजेंसियों ने पहले ही इस तरह की घटनाएं बढ़ने का अंदेशा जता दिया था। यही वजह है कि राज्य में पिछले वर्ष की तुलना में इस साल निहत्थे सुरक्षाकर्मियों एवं आम नागरिकों पर आतंकियों के हमले बढ़े हैं। कुछ समय पहले राज्य के एडीजीपी कानून-व्यवस्था मुनीर खान ने इस तरह की घटनाओं को केन्द्र में रखते हुए श्रीनगर में मीडिया से कहा था कि सहज रूप से मिल रही गुप्त सूचनाओं के चलते आतंकियों के खिलाफ चल रहे अभियान में सफलता मिल रही है। यह सब आम नागरिकों की वजह से ही है, क्योंकि वे अब आतंकवाद के खिलाफ हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो रहे हैं। यही वजह है कि आतंकी हताशा में आम नागरिकों को निशाना बना रहे हैं।
 बारामूला में आतंकियों के हाथों मारे गए आसिफ, हसीब और मोहम्मद असगर
नागरिकों की मौत पर चुप्पी क्यों?
आश्चर्य है कि आम कश्मीरियों के दम पर दशकों से सियासी रोटियां सेंक रहे अलगाववादी नेता आतंकियों द्वारा बेरहमी से मारे गए युवकों की नृशंस हत्या पर खामोश दिखाई दिये। ये वही लोग हैं जो आतंकियों के मरने के कुछ पल बाद ही शोक सभा करके घाटी बंद कराने का आह्वान करते हैं। लेकिन जब आतंकियों द्वारा निर्दोष युवकों की हत्या की जाती है तो इनके मुंह से दो लफ्ज तक नहीं फूटते। राज्य की मुख्यमंत्री रहीं महबूबा मुफ्ती भी घटना के दो दिन बाद तक कुछ नहीं बोलीं। जब लोगों ने सवाल उठाया तो उनका एक ट्वीट आया जिसमें उन्होंने इस घटना को बर्बरतापूर्ण बताया है। इस मामले में श्रीनगर की रहने वाली भारतीय जनता पार्टी, महिला मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य नीलम गास ने कहा, ‘‘आम लोगों के नाम पर सियासत करने वाले अलगाववादी नेता और राज्य के प्रमुख दल आम कश्मीरियों की मौत पर दो शब्द तक नहीं बोलते, उनके घर जाना तो दूर की बात है, जबकि यही लोग आतंकियों के मरने पर उनके जनाजे में शामिल होने पर उतारू रहते हैं। क्या आम नागरिकों की मौत उनके लिए कोई मायने नहीं रखती?’’
बहरहाल, खुद को घाटी के लोगों का हमदर्द बताने वाले आतंकियों की असलियत धीरे-धीरे सामने आ रही है। वे जिन कश्मीरियों को अपना हमदर्द बताते नहीं थकते, उन्हें ही मौत के घाट उतार रहे हैं। अकेले दो साल में इन आततायियों ने एक दर्जन से अधिक आम नागरिकों की मुखबिरी के नाम पर हत्या कर दी है। ऐसे में उनके इस दुर्दांत चेहरे को देखकर कश्मीर का अवाम यह मानने को मजबूर है कि वे किसी के हमदर्द नहीं हैं। लेकिन देखने वाली बात यह होगी कि कश्मीरी अवाम कब इन घटनाओं से आक्रोशित होकर, दुत्कार कर उनके खिलाफ हल्ला बोलेगा।
कौन है रियाज नायकू
निर्दोष आम नागरिकों की हत्या में शामिल घाटी का दुर्दांत आतंकी रियाज नायकू एक बार फिर सुर्खियों में है। नायकू साल 2016 में आतंकी बुरहान वानी के खात्मे के बाद एजेंसियों की निगाह में प्रमुखता से आया। उस पर पुलिसकर्मियों के अपहरण और हत्या का आरोप है। 12 लाख का इनामी नायकू कश्मीर के अवंतिपुरा का रहने वाला है। सुरक्षा एजेंसियों ने उसे वांछित आतंकियों की सूची में ए++ की श्रेणी में रखा है। पिछले साल आतंकी सब्जार बट की हत्या के बाद उसे घाटी में हिज्बुल मुजाहिदद्ीन की कमान मिली थी। सुरक्षा एजेंसियों ने कई बार उसे घेरा, लेकिन वह भागने में कामयाब रहा।
 
रियाज नायकू बन्दुक थामे हुए  
आतंकी पहले भी बना चुके हैं आम नागरिकों को निशाना
30 अप्रैल,2018 को लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने बारामूला के ओल्ड टाउन क्षेत्र में तीन स्थानीय युवकों की अंधाधुंध गोलियां मारकर हत्या कर दी। मारे गए तीनों युवक आसिफ अहमद शेख, हसीब अहमद शेख और मोहम्मद असगर दोस्त थे।
अप्रैल, 2018 को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में आतंकियों ने गुलाम नबी पटेल नामक राजनीतिक कार्यकर्ता की हत्या की। इसमें उनके सुरक्षाकर्मी भी घायल हुए।
 
14 जून, 2018 को श्रीनगर में राइजिंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी की आतंकियों ने निर्ममता से हत्या की।
जून,2017 में पिछले दिनों घाटी के कुलगाम के कीलम में आतंकियों ने एक आम नागरिक की हत्या कर दी।
अगस्त, 2018 में पुलवामा में आतंकियों ने मुर्रान गांव के फार्मासिस्ट गुलजार अहमद को अगवा कर हत्या कर दी।
12 नवंबर, 2018 को दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के दकसुम क्षेत्र के दीसु इलाके में 30 वर्षीय अब्दुल गनी मीर के शव को उनकेघर में रहस्यमय परिस्थितियों में बरामद किया गया।
चार वर्ष में घाटी में मारे गए आतंकी :
वर्ष 2015 - 113
वर्ष 2016 - 165
वर्ष 2017 - 218
नवम्बर 2018 तक - 217
लोकतंत्र के सिपाहियों को भी बनाते रहे हैं निशाना
घाटी में जो भी मुख्यधारा से जुड़कर शांति और विकास की बात करता है, उसे मार दिया जाता है। सिर्फ आम नागरिकों को ही नहीं, सरपंचों को भी आतंकियों ने मौत के घाट उतारा है। कुछ समय पहले दुर्दांत आतंकी रियाज नायकू ने घाटी में पंचायत चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को धमकी देते हुए कहा था कि जो भी उम्मीदवार चुनाव लड़ेगा, उसे घर से घसीटकर उसकी आंखों में तेजाब डाल दिया जाएगा। लेकिन घाटी के लोगों ने इस बार आतंकियों की गीदड़ भभकी को ठेंगा दिखाते हुए 713 सरपंच और 2383 पंच के पदों के लिए नामांकन भरा।
जिला पंचायत पूर्व सरपंच आतंकवादियों ने की हत्या
1.  बारामूला पट्टन गुलाम मोहम्मद यतू सितंबर, 2012
2.  बारामूला रोपोरा मो. साफी ताली सितंबर, 2012
3.  बारामूला गोरीपोरा हबीबुल्ला मीर जनवरी, 2013
4.  बारामूला कलंतरा जाविद अहमद फरवरी, 2013
5.  बारामूला हैगाम गुलाम मोहम्मद बेदर दिसंबर, 2014
6.  बारामूला बोमई गुलाम अहमद बट दिसंबर, 2014
7.  बारामूला ओंबर्न मोहम्मद दिलावर फरवरी, 2016
8.  पुलवामा लेडरमर गुलाम मो. लोन अप्रैल, 2013
9.  पुलवामा टोकिना-1 मो. अमीन पंडित अप्रैल, 2014
10. पुलवामा काकपोरा बी फैयाज अहमद डार मार्च, 2017
11. पुलवामा मरबाल फैयाज बट अक्तूबर, 2016
12. पुलवामा बांटगुंड गुलाम नबी मीर अप्रैल, 2014
13. शोपियां चाकोरा मो. मकबूल टखोर अप्रैल, 2015
14.  शोपियां पन्नू मो. मकबूल जुलाई, 2015
15.  शोपियां नाजनीनपुरा मो. सुल्तान बट नवम्बर, 2014
16.  कुलगाम रामपोरा गुलाम मो. डार फरवरी, 2012