अयोध्या 6 दिसंबर: भारतीय इतिहास के लिए गौरव का दिन
   दिनांक 06-दिसंबर-2018
    - डॉ. चंद्रप्रकाश सिंह                 
1528 में आक्रांता मीरबाकी ने श्रीराम के जन्म स्थान को ध्वस्त किया। यह राष्ट्र की चेतना पर प्रहार था। जब राष्ट्र स्वतंत्र हुआ तो उसका प्राथमिक लक्ष्य इन राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीकों को पुन: प्रतिष्ठित करना होना चाहिए था, परन्तु ऐसा नहीं हुआ। लेकिन एक राष्ट्र की जीवंत चेतना को बहुत दिनों तक नहीं दबाया जा सकता। 6 दिसम्बर, 1992 को इस राष्ट्रीय चेतना ने हूंकार भरी और यह कलंकित ढांचा ध्वस्त हो गया
6 दिसम्बर 1992 को केवल इसलिए नहीं स्मरण रखा जाएगा कि मन्दिर तोड़कर बनाए गए ढांचे को ढहा दिया गया अपितु इस घटना का दूरगामी महत्व है। एक ऐसा राष्ट्र जो विगत 800 वर्षों से निरन्तर आक्रमण पर आक्रमण झेलता रहा। उसके धार्मिक केन्द्रों को ध्वस्त कर दिया गया। सांस्कृतिक जीवन मूल्यों को नष्ट-भ्रष्ट करने की कोशिश की गई। राष्ट्र के स्वाभिमान का मान मर्दन करने के लिए आस्था केन्द्रों पर प्रहार हुए।
राष्ट्र नायक मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जन्म स्थान पर स्थापित मन्दिर को तोड़ने का कुकृत्य भी राष्ट्र को अपमानित कर पददलित करने का प्रयास था। देश के कोने-कोने में मन्दिर व अन्य आस्था के केन्द्रों को तोड़ा गया। धर्मच्युत करने के बर्बर प्रयत्न हुए, किन्तु भारत ने साहस के साथ इन सबका सामना किया। इस्लामी शासकों के बर्बर कुकुृत्यों के होते हुए भी भारत का हिन्दू समाज अपने धर्म, संस्कृति एवं परम्परा के लिए सदैव संघर्षशील रहा। इस्लाम और ईसाइयत के क्रूर एवं बर्बर आक्रमणों के सामने विश्व की अनेक सभ्यताएं ध्वस्त हो गईं। आज उनका कोई नाम लेवा तक नहीं है। न आज यूनान की बौद्धिकता का कोई उत्तराधिकारी है और न ही रोम के विशाल साम्राज्य का। केवल मिस्र की महान सभ्यता के अवशेष पीरामिडों में संरक्षित हैं। बेबीलोन और मैसोपोटामियां की सभ्यताएं रेगिस्तानों में धंस गईं। जरथुस्त का पारस हवा के झोके की तरह उड़ गया, परन्तु भारत अपनी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति के साथ आज भी चट्टान की तरह खड़ा है।
भारत न कभी झुका और न ही डिगा सदैव संघर्ष करता रहा। राज्य पराजित हुए लेकिन संस्कृति कभी पराजित नहीं हुई। आक्रमणकारियों ने मानसिक भय उत्पन्न करने के लिए बाहृय प्रतीकों, आस्था केंद्रों एवं पूजा स्थलों को तोड़ा, लेकिन भारत का समाज अपने आस्था केन्द्रों को एक क्षण के लिए भी नहीं भूला। मन्दिर तोड़े गए फिर वहीं नए मन्दिर खड़े कर दिए गए। अयोध्या, मथुरा हो या काशी सभी स्थानों पर हिन्दू समाज सदैव संघर्षशील रहा। वह इन स्थानों को एक क्षण के लिए भी नहीं भूला।
इस्लामी शासकों के बर्बर कुकुत्यों के होते हुए भी भारत का हिन्दू समाज अपने धर्म, संस्कृति एवं परम्परा के लिए सदैव संघर्षशील रहा। इस्लाम और ईसाइयत के क्रूर एवं बर्बर आक्रमणों के सामने विश्व की अनेक सभ्यताएं ध्वस्त हो गईं। आज उनका कोई नाम लेवा तक नहीं है, लेकिन भारत अपनी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति के साथ आज भी चट्टान की तरह खड़ा है 
भगवान श्रीराम के जन्मस्थान पर बने मन्दिर को बाबर के सेनापति मीरबाकी ने 1528 में तोड़कर ढांचा खड़ा कर दिया। हिन्दू समाज तब से लेकर आज तक 76 लड़ाईयां लड़ चुका है। चार लाख से अधिक लोग बलिदान हो चुके हैं लेकिन उस स्थान पर क्षण मात्र के लिए भी हिन्दू समाज ने अपना दावा नहीं छोड़ा। यह मात्र मन्दिर मस्जिद का विवाद नहीं है। यह राष्ट्र की अस्मिता का प्रश्न है। मजहबी पूजा स्थल के रूप में इस्लाम के लिए उस स्थान का कोई महत्व नहीं है और न ही मस्जिद इस्लाम का अनिवार्य अंग है, लेकिन भारत व हिन्दू समाज के लिए श्रीराम के जन्म स्थान का क्या महत्व है, यह भारतीय संस्कृति को जानने वाला कोई सामान्य व्यक्ति भी बता सकता है।
 
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भारत की राष्ट्रीय चेतना के संवाहक हैं। श्रीराम का चरित्र राष्ट्र के चरित्र का दर्पण है। श्रीराम के बिना भारत राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती। भारत के 130 करोड़ लोग यदि उस राष्ट्र के विराट का प्रतिनिधित्व करते हैं तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम इस राष्ट्र की उस चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो विराट को जागृत करती है। इसलिए राम हैं तो राष्ट्र है और राष्ट्र है तो राम हैं। भारत के लिए राम और राष्ट्र एक दूसरे के परस्पर पूरक हैं। अब आप यह समझ सकते हैं कि सन् 1528 में आक्रांता द्वारा श्रीराम के जन्म स्थान को ध्वस्त करने का क्यों प्रयत्न किया गया। यह राष्ट्र की चेतना पर प्रहार था। अत: जब राष्ट्र स्वतंत्र हुआ तो उसका प्राथमिक लक्ष्य इन राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीकों को पुन: प्रतिष्ठित करना होना चाहिए था, परन्तु ऐसा नहीं हुआ। लेकिन एक जीवंत राष्ट्र की चेतना को बहुत दिनों तक नहीं दबाया जा सकता। 6 दिसम्बर, 1992 को इस राष्ट्रीय चेतना ने हूंकार भरी और यह कलंकित ढांचा ध्वस्त हो गया।
श्रीराम जन्मभूमि का आन्दोलन वास्तविक अर्थों में एक राष्ट्रीय आंदोलन था, जिसमें भाषा, क्षेत्र, जाति आदि की सभी अड़चनों को तोड़कर समग्र भारत राष्ट्र खड़ा हो गया था। किसी भी राष्ट्र के लिए ऐसे अद्भुत क्षण बहुत ही कम आते हैं, जब समाज अपने स्वार्थ के लिए नहीं अपने आदर्श के लिए इस प्रकार खड़ा हुआ हो। यह भारत के इतिहास का स्वर्णिम दिवस है। इसे शौर्य दिवस, एकात्मता दिवस, राष्ट्रीय पुनर्जागरण दिवस या सांस्कृतिक स्वतंत्रता दिवस कुछ भी कहा जा सकता है, लेकिन यह भारत के इतिहास में एक गौरव का दिवस है।
(लेखक अंरुधती वशिष्ठ अनुसंधान पीठ, प्रयाग के संयोजक एवं दो दशक तक श्री अशोक सिंहल जी के निजी सचिव रहे हैं )