अयोध्या ही श्रीराम का जन्मस्थान पर विरोधी कुतर्क के आधार पर नकारते हैं
   दिनांक 06-दिसंबर-2018
                                                                                                                                                   - संध्या जैन                     
इस समय अयोध्या में जिस स्थान पर रामलला विराजमान हैं, वही श्रीराम का जन्मस्थान है। इसके हजारों साक्ष्य हैं, इतिहास भी साक्षी है। लेकिन राम विरोधी लोग उन साक्ष्यों को कुतर्क के आधार पर नकारते रहे हैं। लेकिन पुरातत्व विभाग के अनेक साक्ष्य ऐसे हैं जो झुठलाए नहीं जा सकते
 भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण की देखरेख में अयोध्या की विवादित भूमि के नीचे हुई खुदाई में मिले मंदिर के स्तंभ और मूर्तियां
6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में वह विवादास्पद ढांचा ढह गया था, जिसके बारे में सदियों से हिंदुओं का कहना था कि उनके सर्वाधिक पूज्य मंदिर को गिराकर उसे खड़ा किया गया था। इस घटना ने जहां हिंदुओं के आत्म-निश्चय को दुर्बल करने वाले मनोवैज्ञानिक अवरोधों को दूर किया, वहीं अबूझ सवालों की गुत्थियों को सुलझाने की कड़ियां भी परोस दीं। यही नहीं, इसने पहली बार इस तथ्य के ठोस साक्ष्य प्रदान किए कि बाबरी ढांचे की दीवारों के बीच एक प्राचीन मंदिर का अस्तित्व था।
पहले भी जोसेफ टिफेंथलर जैसे विदेशी यात्रियों ने बाबरी ढांचे की दीवारों में 14 काले पत्थर के खंभों पर गढ़े हुए हिंदुओं के पवित्र प्रतीकों का शिल्प देखा था। 1992 में नए पुरातात्विक प्रमाण मिले जब जून के महीने में बाबरी ढांचे के सामने अधिग्रहित 2़ 77 एकड़ भूमि के एक पुराने गड्ढे में मूर्तिकला और स्थापत्य के 40 से अधिक भग्नावशेष मिले। उस भूमि को फैजाबाद के जिलाधिकारी आऱ एऩ श्रीवास्तव की देखरेख में समतल किया जा रहा था।
बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के इतिहासकार आऱ एस़ शर्मा, डी़ एऩ झा, अथर अली और सूरजभान ने अवशेषों को ‘साक्ष्यात्मक प्रमाण’ नहीं माना था, क्योंकि उनके अनुसार, ‘‘ये अलग-अलग स्थानों और इतिहास के भिन्न-भिन्न कालखंडों से संबंधित थे।’’ पुरातत्वविद् एस़ पी. गुप्ता का कहना था कि पुराकालिक अवशेष एक प्राचीन गड्ढे में मिले थे, जिसे 16वीं शताब्दी में बंद कर दिया गया था।
धीरे-धीरे ढांचे के नीचे मंदिर के अस्तित्व के साक्ष्य सामने आने लगे। राज्य सरकार द्वारा जब अधिग्रहित भूमि समतल कराई जा रही थी तो लगभग 12 फीट गहरा एक हिस्सा सामने आया। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक डॉ. के़ एम़ श्रीवास्तव और डॉ. एस़ पी. गुप्ता ने इसकी जांच की तो वहां उत्तर-दक्षिणी भाग में प्राचीन र्इंटों की कई परतों की चूने और पत्थर से बनी दीवार दिखी। उसके नीचे एक और दीवार थी, जिसका फर्श अलग तरीके का था। ये चिह्न किसी विशाल दीवार के नष्ट होने को इंगित करते हैं। पुरातत्व विभाग, उत्तर प्रदेश के निदेशक डॉ. राकेश तिवारी ने खुदाई के दौरान मिली हिंदू मंदिर से संबंधित 263 कलाकृतियों की एक सूची इलाहाबाद उच्च न्यायालय को सौंपी।
6 दिसंबर, 1992 की घटना के बाद सैकड़ों वस्तुएं सामने आर्इं। ढांचा ढहाए जाने के एक महीने बाद जब स्थल केंद्र सरकार के नियंत्रण में था तो एक बैरीकेड बनाते समय भग्न मंदिर का 2़ 5 फीट फलक दिखाई दिया। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण खोज थी 5७2़ 25 फीट का एक शिलालेख, जो ढांचे की दीवार ढहने के दौरान गिरा था। पुरालेख और मुद्राशास्त्र के प्रसिद्ध विशेषज्ञ प्रोफेसर अजयमित्र शास्त्री ने कहा कि शिलालेख 11वीं शताब्दी ईसा पूर्व की शुद्ध और शास्त्रीय नागरी लिपि में उत्कीर्णित है, जिसमें अयोध्या के साकेत मंडल में सुनहरे गुंबद वाले विष्णु हरि के एक अद्वितीय मंदिर का उल्लेख है, जो पूर्व के अन्य राजाओं द्वारा निर्मित सभी मंदिरों में सबसे भव्य है। इसमें भगवान विष्णु (वामन अवतार के रूप में) द्वारा राजा बाली और दस मुख वाले व्यक्ति दशानन (रावण) का विनाश करने की बात वर्णित है।
भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के पुरालेख निदेशक प्रसिद्ध पुरालेखविद् डॉ. के़ वी़ रमेश ने शिलालेख की वैज्ञानिक जांच करने के बाद बताया कि 20 पंक्तियों का शिलालेख एक आयताकार पत्थर पर 115 से.मी.७55 से़ मी़ में उत्कीर्ण किया गया था, जो गिरने पर दो तिरछे टुकड़ों में टूट गया था; इसलिए लगभग हर पंक्ति में कुछ शब्द खो गए हैं। शुद्ध संस्कृत में लिखा गया यह शिलालेख 12वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य का बताया गया है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी गहड़वाल राजवंश के राजा गोविंदचंद्र के बारे में थी, जिन्होंने 1114 से 1155 ईस्वीं तक एक विशाल साम्राज्य पर शासन किया था। शिलालेख राज्य के प्रशासनिक विभाग साकेत मंडल का उल्लेख करता है। मंदिर मेघसूत ने बनवाया था, लेकिन शिलालेख उनके उत्तराधिकारी द्वारा उत्कीर्ण कराया गया था।
इस शिलालेख की 19-20 पंक्तियों में ‘पश्चायत’ शब्द का उल्लेख है। डॉ. रमेश ने इसका अनुवाद इस तरह किया है, ‘‘और अब शासक की उग्र सेना  पश्चिमी देशों (पश्चायत) के कारण पैदा भय का भी नाश करती है।’’ उन्होंने इसे मुसलमानों, विशेष रूप से गजनवियों का संदर्भ बताया है, जिन्होंने उस समय भारत पर आक्रमण किया था। लेकिन वामपंथी इतिहासकार प्रोफेसर इरफान हबीब ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा, ‘‘किसी भी शिलालेख या संस्कृत कथन में मुसलमानों और गजनवियों को ‘पश्चायत’ के नाम से उल्लेलख नहीं किया गया है। यह कन्नौज और बदायूं के राष्ट्रकूटों का संदर्भ हो सकता है, जो 12वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में गहड़वाल के पश्चिमी पड़ोसियों में से थे।’’
लेकिन वास्तविकता यह भी है कि गहड़वाल अपने शासनकाल की शुरुआत से ही हिंदू धर्म के सबसे बड़े रक्षकों में से थे। इस राजवंश के संस्थापक चंद्रदेव को ऐसे व्यक्ति के तौर पर वर्णित किया गया था, जो उस धर्म और वेदों की पुनर्स्थापना के लिए स्वयंभू के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुए थे जिन्हें विस्मृत कर दिया गया था। राजवंश के ताम्रपत्र पर अंकित लेखों में बताया गया है कि चंद्रदेव ने काशी, कुशिका या कान्यकुब्ज, उत्तरकौशल या अयोध्या और इंद्र या इंद्रस्थनीयक शहर की रक्षा की थी।
गहड़वालों ने तुर्कों के साथ बहादुरी से लड़ाई की थी। चंद्रदेव ने ‘तुरुष्कदण्ड’ नाम का एक विशेष कर लगाया था जिसका उद्देश्य युद्ध के लिए धन जुटाना था। उनके पोते गोविंदचंद्र का वर्णन ‘कृत्यकल्पतरू’के लेखक लक्ष्मीधर ने युद्ध में मारे गए वीर हमीरा के रूप में वर्णित किया था, जो एक मुसलमान सेना प्रमुख, संभवत: हजीब तुग तिगिन के संबंध में बताता है। वाराणसी के पास सारनाथ में एक शिलालेख में गोविंदचंद्र की रानी कुंवर देवी ने उनकी तुलना विष्णु से की है, जिन्होंने अपने राज्य की रक्षा करने के लिए पुनर्जन्म लिया- हरि (विष्णु), जिन्हें दुष्ट आक्रांता तुरुष्का से वाराणसी की रक्षा करने के लिए ‘हर’ (शिव) ने नियुक्त किया था, क्योंकि सिर्फ वही पृथ्वी की रक्षा करने में सक्षम थे, उन्होंने फिर जन्म लिया था और गोविंदचंद्र के रूप में प्रसिद्ध हुए - वाराणसीम् भुवन-रक्षाना-दक्षह दुस्तत तुरुस्का-सुभता-दवितम्  । लेकिन इरफान हबीब ने शिलालेख को खारिज करते हुए दावा किया, ‘‘उसे कहीं और से लाया गया था और सिर्फ इतना कहा कि साकेत के स्थानीय राजा ने विष्णु-हरि के लिए एक सुंदर मंदिर बनवाया था। यह मंदिर राम के जन्मस्थल पर नहीं बनाया गया था। शिलालेख में किसी भी मुस्लिम खतरे या मुसलमानों द्वारा नष्ट किए गए किसी भी पूर्व मंदिर का कोई संदर्भ नहीं दिया गया है।’’
                   अयोध्या में खुदाई से प्राप्त लगभग 1000 वर्ष पुराना संस्कृत में लिखा शिलालेख 
अंत में, उन्होंने जोर देकर कहा, ‘‘शिलालेख त्रेता-का-ठाकुर मंदिर स्थल का है, जिसकी खोज 19वीं शताब्दी के अंत में हुई थी, जो फैजाबाद संग्रहालय में रखा हुआ था (जिसे 1953 में लखनऊ संग्रहालय में स्थानांतरित कर दिया गया था) और उसे ही ध्वस्त ढांचे के पास गाड़ दिया गया था।’’ इस तरह की बात करने वाले हबीब ने यह स्पष्ट करने की जहमत नहीं उठाई कि जिस स्थल पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की नजर टिकी थी, वहां उसे जमीन में कैसे गाड़ा जा सकता था? यही नहीं, लखनऊ संग्रहालय ने भी पुष्टि की कि उसकी सारी संपत्ति उसके पास ही थी। हबीब के बताए त्रेता-का-ठाकुर शिलालेख में भी बीस पंक्तियां हैं, पर यह किसी राजा की चर्चा नहीं करता और उनके अनुसार, इसका ऊपरी दायां हिस्सा क्षतिग्रस्त है। लेकिन अयोध्या से प्राप्त शिलालेख का तो निचला दायां हिस्सा क्षतिग्रस्त है, अत: वह हबीब द्वारा वर्णित शिलालेख नहीं हो सकता।
हैरानी की बात है कि हबीब अपने ही तर्कों पर खरे नहीं उतरते। त्रेता-का-ठाकुर त्रेता युग के सर्वोच्च देवता श्रीराम का ही परिचय है। उनकी ओर से प्रस्तुत त्रेता-का-ठाकुर शिलालेख दरअसल पुरातत्वविद् एंटोन फ्यूहर ने त्रेता-का-ठाकुर मंदिर स्थल पर खड़े किए गए ढांचे के भग्नावशेषों के बीच खोजा था। हबीब इस तथ्य को मानते हैं। फिर उन्हें यह तथ्य स्वीकार करने से परहेज क्यों है कि विष्णु हरि शिलालेख बाबरी ढांचे की दीवारों के बीच पाया गया जिसे प्राचीनकाल में स्थित विष्णु हरि मंदिर पर खड़ा किया गया था? इलाहाबाद उच्च न्यायालय को मंदिर के पुराकालिक अवशेषों के सत्य को स्वीकार करने में 18 साल लग गए, जो 1992 के बाद ढहाए गए ढांचे के बीच से उभरने लगा था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बाद सरयू में न जाने कितना पानी बह गया, पर श्रीराम जन्मभूमि का मामला अभी तक अटका हुआ है। अब जो माहौल बन रहा है उसने उम्मीद जगा दी है कि जल्दी ही यह मामला निपट सकता है।
(लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं। यह आलेख मीनाक्षी जैन द्वारा लिखी पुस्तक ‘राम और अयोध्या’ (प्रकाशक : आर्यन बुक्स इंटरनेशनल, 2013) पर आधारित है)