मंदिर को ध्वस्त कर बनाया गया था ढांचा, मुसलमानों को छोड़ देना चाहिए दावा
   दिनांक 06-दिसंबर-2018
                - के.के. मोहम्मद                            
मुसलमानों को इस तथ्य का भान होना चाहिए कि श्रीराम जन्मभूमि हिंदुओं के लिए वैसे ही महत्वपूर्ण है जैसे मक्का और मदीना मुसलमानों के लिए। हिन्दुओं के लिए इस पवित्रतम स्थान पर मुसलमानों को अपना दावा छोड़ देना चाहिए |
अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण के लिए विहिप और शिवसेना जैसे संगठनों के अभियान के साथ ही अयोध्या मुद्दा एक बार फिर देशव्यापी चर्चा के केंद्र में है। इस समय देश के मुसलमानों के सामने एक शानदार अवसर है जब वे हिंदू भाइयों के साथ समझदारी दिखाते हुए विवादित स्थान को पूरी तरह से उन्हें सौंप कर भव्य मंदिर निर्माण में मदद कर सकते हैं। देश के मुसलमानों के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि क्या वे इतिहास बनाएंगे? यकीनन यह सत्य है कि इतिहास बार-बार अवसर नहीं देता। सौभाग्य से, इतिहास ने उन्हें एक और मौका दिया है। कुछ स्वयंभू मार्क्सवादी इतिहासकारों की बातों के चक्कर में पड़े बगैर उन्हें इस मौके का फायदा उठाना चाहिए। यहां कुरआन की उस आयत को याद करना ठीक होगा कि ‘अल्लाह उन लोगों के हालात कभी नहीं बदलता जो खुद को बदलने की कोशिश नहीं करते।’ (कुरआन 13: 11)
इस्लाम के शुरुआती दिनों में पैगम्बर मुहम्मद ने हुदैबिया (628 ई.) की संधि के माध्यम से मक्का में अपने प्रतिद्वंद्वियों के साथ इस तरह के कई समझौते किए थे। इस सोचे-समझे कदम से उन्होंने आए दिन के संघर्षों से पीछा छुड़ाया था।
यह ऐतिहासिक तथ्य है कि मध्यकाल में जब मुस्लिम भारत आए तो कई मंदिरों को नष्ट कर उन्हें मस्जिदों में बदल दिया गया था। अगर कोई इस बात का सत्यापन चाहता है, तो वह कुतुब मीनार के पास कुव्वत उल इस्लाम और काशी में ज्ञानवापी मस्जिद को इसके साक्ष्य के रूप में देख सकता है। इस बात का कोई अर्थ नहीं है कि इन स्थानों पर हुए बदलावों को नकार दिया जाए या यह कहते हुए न्यायसंगत बताने की कोशिश की जाए कि यह तोड़फोड़ आक्रांताओं के मजहबी उत्साह के कारण नहीं हुई थी बल्कि इसलिए हुई थी कि ये मंदिर सोने-चांदी के भंडार थे। एक तथ्य यह भी है कि इन ऐतिहासिक गलतियों के लिए आज का मुसलमान जिम्मेदार नहीं है। उन पर संदेह केवल तब किया जाता है जब वे इस प्रकार के किसी भी अन्यायकारी कार्य को उचित ठहराते हैं। एक सच्चा मुसलमान बखूबी जानता है कि दूसरे की बलात कब्जाई जमीन पर इबादत करना अल्लाह को बिल्कुल मंजूर नहीं है।
मैंने प्रो. बी.बी. लाल के अधीन वर्ष 1976-77 में अयोध्या में हुए पुरातात्विक उत्खननों में भाग लिया। दूसरा उत्खनन डॉ. बी.आर. मणि के निरीक्षण में किया गया था। इन दोनों उत्खननों ने निर्विवाद रूप से सिद्ध कर दिया है कि आज जहां रामलला विराजे हैं वहां ढांचे से पहले एक मंदिर था। ढांचे के निर्माण में इस्तेमाल किए गए मंदिर के खंभे, खंभों के नीचे बना ईंट का आधार, अमालका, परनाली और विभिन्न देवी-देवताओं, मानवों और पशुओं की आकृतियों वाली टेराकोटा मूर्तियां यह स्पष्ट बयां करती हैं कि वहां ढांचे से पहले एक हिंदू मंदिर था। उत्खनन में 12वीं शताब्दी की 20 पंक्तियों का शिलालेख भी मिला था। इसी तरह बहुत से साक्ष्य उपलब्ध हैं यह साबित करने के लिए कि पहले वहां पर मंदिर था।
विवादित स्थल के उत्खनन में मिले मंदिर के साक्ष्य 
भविष्य में किसी प्रकार के विवाद से बचने के लिए वहां हुआ सम्पूर्ण उत्खनन कार्य भारत के पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग की सीधी निगरानी में किया गया था। इसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के अधिकारी शामिल थे। इसके अतिरिक्त पूरे उत्खनन कार्य का पर्यवेक्षण आल इंडिया सुन्नी वक्फ बोर्ड और विश्व हिंदू परिषद द्वारा नामित विषय विशेषज्ञों की उपस्थिति में अदालत के एक न्यायिक अधिकारी द्वारा किया गया था। भविष्य की किसी जटिलता से बचने के लिए खुदाई का काम कर रहे श्रमिकों में भी मुस्लिम-हिंदू अनुपात बनाए रखा गया था। क्या मुसलमानों को ऐसे निष्पक्ष उत्खनन के परिणामों पर संदेह होना चाहिए?
मुस्लिमों को इस तथ्य का एहसास होना चाहिए कि श्रीराम जन्मभूमि हिंदुओं के लिए वैसे ही महत्वपूर्ण है जैसे मक्का और मदीना मुसलमानों के लिए हैं। क्या मुसलमानों ने कभी सोचा है कि उनके दोनों पवित्र स्थानों पर अन्य समुदायों का कब्जा हो जाने और उनकी पूजा-पद्धतियों से पूजा शुरू होने की स्थिति में मुस्लिमों की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया क्या होगी? हिंदू भी वैसे ही मनोवैज्ञानिक संकट से गुजर रहे हैं और वह भी एक ऐसे देश में जहां वे बहुमत में हैं। मुसलमानों के लिए यह जगह न तो मुहम्मद से जुड़ी है और न ही किसी खलीफा या अजमेर के ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती या निजामुद्दीन औलिया से। उनके लिए यह जगह बाबर नाम के एक शासक से जुड़ी हुई है। अपने समुदाय के हित में वे ऐसे ढांचे पर अपना दावा क्यों नहीं छोड़ते? खासकर जब हुदैबिया की संधि उनके सामने है, जिसे किसी और ने नहीं, खुद पैगम्बर ने किया था।
दुनिया में कहीं और इस तरह का एक भी उदाहरण नहीं होगा जहां बहुमत में होने के बावजूद वह समुदाय मंदिर के निर्माण के लिए अभी भी न्यायिक फैसले की प्रतीक्षा कर रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पाकिस्तान के उलट भारत एक पंथनिरपेक्ष देश है। मुसलमानों को यह भी याद रखना चाहिए कि भारत पंथनिरपेक्ष देश सिर्फ इसलिए है क्योंकि यहां हिंदू बहुसंख्यक है। मैंने बहुत से मुसलमानों से सवाल किया है कि अगर यह एक मुस्लिम-बहुल देश होता तो यह पंथनिरपेक्ष देश होता या नहीं? मुस्लिमों को इस तथ्य का एहसास होना चाहिए और उन्हें आत्मनिरीक्षण करते हुए जिम्मेदार अल्पसंख्यकों की तरह आचरण करना चाहिए और मंदिर के निर्माण के लिए आगे आना चाहिए। मुझे यकीन है कि इस ऐतिहासिक कदम से मुस्लिम समुदाय की कई समस्याएं अपने आप समाप्त हो जाएंगी।
भारत के कई हिस्सों में, मुसलमानों की हालत बेहद खराब है। बाबरी मुद्दे ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अविश्वास पैदा करने और उन्हें हमेशा के लिए पिछड़ा बनाए रखने में भारी योगदान किया है। अयोध्या मसले का निपटारा उन्हें पीड़ित करने वाले कई रोगों का खात्मा कर देगा। तर्कसंगत रूप से भारत के सबसे प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों में से एक अबुल हसन अली नदवी ने अयोध्या मुद्दे पर इस तरह के एक सर्वमान्य समझौते के लिए अपने स्तर से सर्वोत्तम प्रयास किए थे, लेकिन उसे किसी तार्किक निष्कर्ष तक नहीं ले जाया जा सका। क्योंकि मुस्लिम नेतृत्व ने बड़े पैमाने पर उनके प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया। खुशी की बात है कि वसीम रिजवी की अध्यक्षता वाला शिया वक्फ बोर्ड खुले तौर पर मंदिर के निर्माण के लिए आगे आ गया है।
मुस्लिम समुदाय बार-बार यह तर्क दोहराता है कि यदि मुसलमानों ने ढांचे पर अपना दावा छोड़ दिया तो इससे उत्साहित हिंदू संगठन ऐसी 3000 जगहों की सूची पेश करते हुए उन्हें कब्जा छोड़ने के लिए कहेंगे। मैं समुदाय की इस चिंता से पूरी तरह वाकिफ हूं। लेकिन आज हमारे पास संसद द्वारा पारित एक ‘पूजास्थल अधिनियम, 1991’ है जो 15 अगस्त, 1947 के बाद किसी पूजास्थल के रूपांतरण को प्रतिबंधित करता है। केवल अयोध्या मसला इसमें शामिल नहीं है। मुसलमानों के लिए इससे अच्छा आश्वासन और क्या होगा।
इस स्थिति की गंभीरता और तात्कालिकता को समझते हुए, मैं आशा करता हूं और सुन्नी मुस्लिमों के नेतृत्व से बारम्बार प्रार्थना करता हूं कि, वे हुदैबिया संधि में मुहम्मद के दिखाये रास्ते का अनुसरण करते हुए विवादित स्थान को पूरी तरह हिंदू समुदाय को सौंपकर अयोध्या विवाद को समाप्त करें।
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के क्षेत्रीय निदेशक रहे हैं)