पाकिस्तान में हिंदू संस्कृति मिटाने की साजिश
   दिनांक 07-दिसंबर-2018
 - मलिक असगर हाशमी          
पाकिस्तान ऐतिहासिक मंदिरों को देश की धरोहर न मानकर उन्हें मिटाने पर आमादा है, जिसके कारण उनके बचे-खुचे अवशेष भी मिटने के कगार पर हैं। अकेले लाहौर में ही पिछले कुछ वर्षों में एक हजार मंदिर नेस्तनाबूद कर दिए गए
कराची के मनोरा में एक हजार साल पुराने प्रसिद्ध श्री वरुणदेव मंदिर के एक हिस्से को शौचालय में बदल दिया गया है  
भगवान और साधक की आवाज मुझे याद आती है
यहां का खालीपन सहन नहीं होता, मुझे मारता है, कष्टप्रद है
आत्मा को किसने जीवन और आनंद दिया?
निस्वार्थ लोग चले गए हैं
योग गायब हो गया,
उन्हें याद कर पूरी रात सो नहीं पाता हूं
जिन्हें खोजा और सम्मान दिया,
गायब हो गए हैं, कभी वापस नहीं आने के लिए
जुल्म की दास्तान
यह कविता पाकिस्तान के सिंध प्रांत के चर्चित कालजयी सूफी-कवि शाह अब्दुल लतीफ भटाई की है। उन्होंने यह सूबे के लाकी शहर से किर्धर पर्वत तक 60 किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैली पर्वतमाला और प्राकृतिक झील के इर्दगिर्द फैले शिवालयोंं की निशानियां मिटने पर अपनी पीड़ा व्यक्त करने के लिए लिखी थी। फ्रांसीसी शोधकर्ता मिशेल बोइविन अपनी पुस्तक ‘सिंध: थ्रू हिस्ट्री एवं रिप्रेजेंटेशंस’ में लाकी के बारे में लिखते हैं कि पाकिस्तान के सिंध प्रांत का यह पूरा क्षेत्र कभी शिवमय हुआ करता था। बलूचिस्तान के हिंगलाज माता मंदिर तक तीर्थयात्रा करने वाले इधर से गुजरते समय में इस इलाके में अपना काफी समय ध्यान, साधना और पूजा-पाठ में बिताते थे। पहाड़ों की गुफाओं में शिवभक्त साधु-संतों का डेरा हुआ करता था। चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांत के अनुसार, सातवीं शताब्दी में लाकी में 273 मंदिर थे, जिनमें से 235 केवल पशुपति और शिव जी के थे। 19 वीं शताब्दी में इसे दुनिया के नक्शे पर लाने वाले ब्रिटिश विद्वान और यात्री रिचर्ड बर्टन की मानें तो पूरे विश्व में लाकी इकलौता स्थान था जहां इतनी बड़ी संख्या में शिवालय हुआ करते थे। मगर यह सब इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गया है। अब तक की पाकिस्तान सरकारों की गलत नीतियों और बहुसंख्यकों की दुर्भावना के कारण लाकी के अधिकतर शिवालय एवं गुफाएं अवशेष में बदल चुके हैं। यहां तक पहुंचने का इकलौता रास्ता भी जर्जर और खतरनाक है। थोड़ी सी असावधानी किसी को मौत के मुंह में पहुंचा सकती है।
पाकिस्तान के ऐतिहासिक मंदिरों पर शोध करने वाली पत्रकार रीमा अब्बासी की मानें तो मंदिरोंं को देश की धरोहर न मानकर इसे संकीर्णता से देखने के चलते इनके बचे-खुचे अवशेष भी मिटने के कगार पर हैं। पाकिस्तन के संवदेनशील प्रांतों खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में अब गिनती के मंदिर और धर्मस्थल बचे हैं। लाहौर में केवल दो मंदिर हैं जिनमें से एक का कपाट बंद रहता है। रीमा अब्बासी के शोध से खुलासा हुआ कि लाहौर में पिछले कुछ वर्षों में एक हजार मंदिर धराशायी कर दिए गए हैं।
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिन्दुओं को तरह-तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है। पहले उनका जबरन कन्वर्जन करते थे और अब संपत्तियां छीन कर उन्हें बेघर किया जा रहा है। हिन्दू धर्म स्थलों के नामोनिशान मिटाए जा रहे हैं। 
पाकिस्तान में कई मंदिरों का रास्ता ही बंद कर दिया गया है। यानी मंदिर में कोई जाना भी चाहे तो नहीं जा सकता। पाकिस्तान सरकार की अदूरदर्शिता के कारण यह नौबत आई है। भारत-पाक बंटवारे के बाद भारत जाने वाले हिदुआें की संपत्ति दस हजार रुपए की कीमत में देने की योजना 1961 में लागू किए जाने पर हिदुआेंं के धर्मस्थलों को तो इससे अलग रखा गया मगर योजना में त्रुटि के चलते इसके आसपास की हिंदुओं की तमाम संपत्तियां दस-दस हजार रुपए में आवंटित कर दी गर्इं। इसके बाद हिदुआेंं के धर्मस्थलोंं के करीब मकान, गोदाम बना दिए गए, पर वहां जाने का रास्ता नहीं छोड़ा गया। रास्ता बंद कर देने से रावलपिंडी के पुराना बाजार स्थित 1929 में निर्मित यमुना देवी मंदिर में श्रद्धालु अनाज की बोरियों पर चढ़कर मंदिर की छत से अंदर जाते हैं। बीबीसी उर्दू की पत्रकार रहीं नुखबत मलिक के मुताबिक, सबसे पहले ऐसा एक मामला 2015 में तब प्रकाश में आया जब खैबर पख्तूनख्वा के कर्क जिले के गांव टेरी स्थित हिंदुओं के परमश्रद्धेय परमहंस महाराज की समाधि के चारों ओर मकान बनाकर वहां पहुुंचने का रास्ता अवरुद्ध कर दिया गया। समाधि में एक कृष्ण मंदिर था, उसे तोड़ कर इमारत खड़ी कर दी गई। समाधि के इर्द-गिर्द मकान बनाने वालों में एक मुफ्ती इफ्तिखारुद्दीन का कहना है कि पाकिस्तान सरकार की 1961 की योजना के तहत जमीन खरीदकर उसने यहां 1998 में मकान बनाया है। 1929 में परमहंस के स्वर्गवास के बाद तकरीबन प्रत्येक वर्ष देश-दुनिया के हिंदू मतावलंबी उनकी समाधि का दर्शन करने आया करते थे। मगर रास्ता बंद होने से उनका यहां आना कम हो गया। पाकिस्तान हिंदू परिषद के अध्यक्ष एवं नेशनल असेंबली के सदस्य रहे डॉक्टर रमेश वांकोआनी ने इस मसले को सर्वोच्च न्यायालय और तमाम बड़े राजनेताओं के दरबार में उठाया, पर कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। पाकिस्तान हिंदू काउंसिल का दावा है कि देश में ऐसे 1400 मंदिर और धर्मस्थल हैं जहां तक पहुंचना अब संभव नहीं। इनके रास्ते बंद कर वहां गोदाम या पशु बाड़ा बना दिया गया है। पाकिस्तान के अखबार ‘डेली टाइम्स’ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कराची के मनोरा स्थित एक हजार साल पुराने प्रसिद्ध श्री वरुण देव मंदिर के एक हिस्से को शौचालय में बदल दिया गया है। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप मेंं यह इकलौता और अतिप्राचीन मंदिर है। मगर इसकी दशा अब बेहद खराब है। पहले यहां प्रत्येक वर्ष ‘लाल सार्इं वरुणदेव उत्सव’ मनाया जाता था। कई वर्षों से यह भी बंद है। पंजाब के चकवाल शहर से 30 किलोमीटर दूर कटासराज गांव के प्रसिद्ध शिव मंदिर के साथ भी यही कुछ हुआ। इसके इर्द-गिर्द के सारे भूखंड पर सीमेंट फैक्ट्रियों ने कब्जा कर लिया। साथ ही मंदिर के सामने की प्राकृतिक झील से पानी निकाल कर वे फैक्ट्रियों में इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके कारण झील सूखने के कगार पर है। हिंदू मतावलंबियोंं की ओर से इसके खिलाफ पाकिस्तान सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर करने पर इस वर्ष मई में झील के पानी के दोहन पर रोक लगाकर सीमेंट फैक्ट्रियों के लिए पंजाब सरकार को वैकल्पिक व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए थे। मगर न्यायालय के आदेश का अनुपालन नहीं हुआ।
न्यायालय की ओर से 10 जुलाई को इसको लेकर फिर सख्त निर्देश दिए गए हैं। बावजूद इसके स्थिति यथावत है। पाकिस्तान वक्फ बोर्ड के पुजारी रहे जयराम कहते हैं कि 1971 में सरकार ने ऐसी नीतियां अपनार्इं कि देश से हिंदू संस्कृति ही मिट गई। अब यहां न शास्त्र पढ़ाये जाते हैं और न ही यहां कोई संस्कृत पढ़ाने वाला बचा है। वर्षों पूर्व सिंध प्रांत के स्कूलों में हिंदी अध्यापक नियुक्त करने की मांग उठाई गई थी, जिस पर आज तक अमल नहीं हुआ है।
पाकिस्तान के 10 ऐतिहासिक मंदिर
तमाम दिक्कतों के बावजूद पाकिस्तान में अभी भी कई ऐतिहासिक मंदिर बचे हुए हैं। यह देश कभी आर्यों की प्राचीन भूमि हुआ करता था। सिंधु नदी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान में बहता है। भारतीय संस्कृति और सभ्यता का उत्थान सिंधु, सरस्वती और गंगा नदी के किनारे ही हुआ। सिंधु के बगैर हिन्दू संस्कृति अधूरी मानी जाती है। पाकिस्तान में हड़प्पा और मोहन जोदड़ो के प्राचीन नगर के अवशेष भी हैं। विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय पाकिस्तान में ही स्थित है। बंटवारे के बाद पाकिस्तान में भारी संख्या में मंदिर ध्वस्त कर दिए गए थे। बड़ी तादाद में प्राचीन मंदिरों को अयोध्या आंदोलन के दौरान भी नुक्सान पहुंचाया गया। इसके बावजूद आज भी वहां कई ऐतिहासिक एवं प्राचीन मंदिर मौजूद हैं। यह बात है कि उनमें से अधिकांश उपेक्षा का शिकार होने के कारण जर्जर हो चुके हैं। आइए आपको रू-ब-रू कराएं पाकिस्तान के ऐसे ही दस चर्चित मंदिरों से।
हिंगलाज शक्तिपीठ: कराची के बाड़ीकलां में माता का मंदिर सुरम्य पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है। ये पहाड़ियां पाकिस्तान द्वारा जबरन कब्जाए गए बलूचिस्तान में हिंगोल नदी के समीप हिंगलाज क्षेत्र में स्थित हैं। यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में एक है। यहां माता सती का सिर गिरा था।
 
कटासराज का शिव मंदिर: पंजाब प्रांत के जिला चकवाल शहर के दक्षिण में कोहिस्तान नामक पर्वत श्रृंखला में महाभारतकालीन कटासराज नाम का एक गांव है। इस गांव में एक विशाल परिसर है जिसमें राम, हनुमान और शिव मंदिर स्थित हैं। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार शिवजी की अर्धांगिनी सती के देह त्यागने से उन्होंने इतना विलाप किया कि उनके आंसू रुके नहीं और उन्हीं आंसुओं से दो तालाब बन गए, जिनमें एक राजस्थान के पुष्कर में है और दूसरा यहां कटास में है।
नृसिंह मंदिर:भक्त प्रह्लाद ने भगवान नृसिंह के सम्मान में एक मंदिर बनवाया था, जो वर्तमान में पाकिस्तान स्थित पंजाब के मुल्तान शहर में है। इसे प्राचीनकाल में ‘श्रीहरि के भक्त प्रह्लाद का मंदिर’ के रूप में जाना जाता था। इस मंदिर का नाम प्रह्लादपुरी मंदिर है। मुल्तान के विश्वप्रसिद्ध किले के अंदर स्थित यह मंदिर किसी जमाने में मुल्तान शहर की पहचान हुआ करता था।
 
पंचमुखी हनुमान मंदिर:कराची के इस 1500 साल पुराने पंचमुखी हनुमान मंदिर में लोग आज भी जाते हैं। नागरपारकर के इस्लामकोट में पाकिस्तान का यह इकलौता ऐतिहासिक राम मंदिर है। एक और पंचमुखी हनुमान मंदिर कराची के शॉल्जर बाजार में बना है। यहां पंचमुखी हनुमान की अद्भुत मूर्ति है।
   
गोरखनाथ मंदिर: पाकिस्तान के पेशावर में गोरखनाथ मंदिर है। यह मंदिर 160 साल पुराना है। मंदिर बंटवारे के बाद से बंद पड़ा था, लेकिन पेशावार हाईकोर्ट के आदेश पर नवंबर 2011 में इसे दोबारा खोला गया।
 
गौरी मंदिर:यह सिन्ध प्रांत के थारपारकर जिले में है। पाकिस्तान के इस जिले में अधिकतर वनवासी हैं जिन्हें थारी हिन्दू कहा जाता है। मध्यकाल में बने इस मंदिर में हिन्दू और जैन धर्म के अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियां रखी हुई हैं।
 
मरी इंडस मंदिर: पंजाब के कालाबाग में स्थित यह मंदिर मरी नामक जगह पर है, जो कभी गांधार प्रदेश का हिस्सा था। चीनी यात्री ह्वेनसांग की पुस्तक में भी मरी का जिक्र है। 5वीं सदी में बना यह मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से अद्भुत है।
 
 श्री वरुणदेव मंदिर: 1,000 साल पुराने इस अनोखे मंदिर को 1947 में बंटवारे के बाद भू-माफियाओं ने अपने कब्जे में ले लिया था। 2007 में पाकिस्तान हिन्दू काउंसिल (पीएचसी) ने इस बंद पड़े क्षतिग्रस्त मंदिर को फिर से तैयार करने का फैसला किया। जून 2007 में इसका नियंत्रण पीएचसी को मिल गया, लेकिन अभी भी इसकी देखरेख नहीं हो रही है।
 
स्वामीनारायण मंदिर: स्वामीनारायण मंदिर सिंध प्रांत में कराची के एमए जिन्ना रोड पर स्थित है। मंदिर की धर्मशाला में ठहरने की भी व्यवस्था है। इस मंदिर के बारे में चर्चा है कि यहां हिन्दुओं के साथ मुस्लिम भी मत्था टेकने आते हैं।
 
साधु बेला मंदिर, सक्कर: 8 वें गद्दीनशीन बाबा बनखंडी महाराज के देहावसान के बाद संत हरनामदास ने 1889 में इस मंदिर का निर्माण कराया। सिन्ध प्रांत के सुक्कुर में बाबा बनखंडी महाराज 1823 में आए थे। उन्होंने मेनाक पर्वत को एक मंदिर के लिए चुना।
 
राम मंदिर, सैदपुर:पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में पुराने समय में मंदिर हुआ करते थे। एक सैयदपुर, दूसरा रावल धाम और तीसरा गोलरा के मशहूर दारगढ़ के पास। सैयदपुर गांव में स्थित राम मंदिर राजा मानसिंह के समय में 1580 में बनवाया गया था।
 
 
(लेखक हिन्दी पायनियर (हरियाणा संस्करण) के संपादक हैं।)