‘‘शबरीमला में मैदाने-जंग जैसे हालात बना दिए हैं पिनरई सरकार ने’’
   दिनांक 07-दिसंबर-2018
शबरीमला को लेकर जबसे सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया है, तबसे केरल के ही नहीं, दुनिया भर के आस्था-केन्द्र भगवान अयप्पा के इस मंदिर को राज्य की मार्क्सवादी सरकार ने राजनीति और हिन्दुओं के प्रति वामपंथी दुर्भावना का अखाड़ा बना दिया है। केन्द्रीय पर्यटन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) कन्ननथानम जोसफ अल्फॉन्स पिछले दिनों शबरीमला में थे। वहां उन्होंने केरल सरकार की इस तीर्थ के प्रति उदासीनता, हिन्दू धर्म के प्रति अजीब सी नफरत के चलते जो दमनकारी रूप देखा, उस सबका खुलासा पाञ्चजन्य के सहयोगी संपादक आलोक गोस्वामी से विस्तृत बातचीत में किया। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश
पिछले दिनों आप केरल में थे, शबरीमला भी गए थे। वहां इन दिनों जिस प्रकार का माहौल है और राज्य सरकार श्रद्धालुओं के साथ जैसा बर्ताव कर रही है, उस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
मुझे लगता है वहां माकपा और मुख्यमंत्री पिनरई विजयन स्टालिन युग की सरकार चला रहे हैं। आप इसे ‘गवर्नेंस’ कहें या ‘नॉन गवर्नेंस’, पर वहां ऐसा ही देखने में आता है। मुझे लगता है, उनका मकसद बहुत साफ है। वे धर्म, आस्था, और धार्मिक अनुष्ठानों को तहस-नहस करना चाहते हैं। वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि कोई श्रद्धालु शबरीमला के आस-पास भी न पहुंच पाए। इसीलिए उन्होंने वहां इतनी बाधाएं खड़ी कर दी हैं कि कोई शबरीमला तक पहुंचने के लिए भी दस बार सोचे। मैं वहां गया था, और वहां मैं जितने भी लोगों से मिला, सबका एक ही सवाल था कि, पिनरई सरकार हमारे लिए भगवान अयप्पा के दर्शन करना इतना मुश्किल क्यों बना रही है? उन्होंने कहा कि हम पहले जब भी शबरीमला आए हैं तब हमें बड़े अच्छे दर्शन हुए, हर चीज की सुविधा मिली और हम बड़े संतुष्ट होकर लौटे, पर इस बार ऐसा नहीं है, क्यों? आखिर पिनरई सरकार ऐसा कर क्यों रही है? मैं सब देख-सुनकर बहुत दुखी हुआ, समझ नहीं आया कि श्रद्धालुओं को क्या जवाब दूं! क्योंकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि राज्य सरकार ने आज वहां हर चीज में बाधाएं खड़ी कर दी हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा का कोई इंतजाम नहीं है, कोई चीज व्यवस्थित नहीं है।
आपने कहा, बाधाएं हैं, चीजें व्यवस्थित नहीं हैं। कुछ उदाहरण दें !
श्रद्धालु परंपरानुसार जिस कपड़े की पोटली में भगवान को अर्पित करने के लिए प्रसादम् लेकर जाते हैं यानी इरुमुटि, उसे पुलिस वाले जबरन छीन लेते हैं। मंदिर तक जाने वाले रास्ते पर पानी भर दिया जाता है, जिससे महिलाओं, पुरुषों, बच्चों को मंदिर तक जाने में भारी मुसीबत का सामना करना पड़े। मंदिर के आस-पास श्रद्धालुओं के सुस्ताने, आराम करने, कुछ पल ठहरने के जो स्थान हैं, उन्हें ध्वस्त कर दिया गया है, जिससे देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालु अपनी थकान न मिटा सकें। आप कल्पना कीजिए, सैकड़ों मील से आने वाले श्रद्धालुओं को थोड़ा आराम न मिले तो कैसा कष्ट होता होगा। इतना ही नहीं, भगवान का नाम जपने वाले भक्तों को गिरफ्तार कर लिया गया। नाम-जप की यह परंपरा वहां सदियों से रही है।
यह किसी लोकतांत्रिक सरकार का नहीं, बल्कि लोक-विरोधी सरकार का कदम लगता है!
आप देखिए कि कैसे कोई सरकार श्रद्धालुओं से आतंकवादी जैसा व्यवहार कर रही है, उन पर दुर्भावना से ग्रस्त होकर ऐसी कड़ी धाराएं लगा रही है जिनमें जमानत नहीं हो सकती। जैसा मैंने कहा, यह स्टालिनवादी बर्ताव है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने तभी तो इसे ‘गुलाग’(पूर्व सोवियत संघ में तानाशाह स्टालिन के जमाने में लोगों से जबरन कठोर श्रम कराए जाने वाले शिविरों का संचालन करने वाली एजेंसी) की संज्ञा दी है। वे ऐसा कैसे कर सकते हैं?
आपको क्या लगता है, पिनरई सरकार ऐसा क्यों कर रही है?
राज्य सरकार का तर्क है कि वह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को कार्यान्वित कराने के लिए ऐसा कर रही है। जबकि असल में तो सर्वोच्च न्यायालय मामले की पुनर्समीक्षा कर रहा है। इस पर फैसला किसी भी पक्ष में जा सकता है। लेकिन राज्य सरकार का तर्क है कि अदालत के आदेश का पालन कराना उनका कर्तव्य है। यह कैसा तर्क है? इसके ठीक विपरीत कई उदाहरण हमारे सामने हैं।
वे कौन से उदाहरण हैं?
आॅर्थोडॉक्स चर्च बनाम जैकोबाइट चर्च का मामला है। उसमें बहुत साल पहले फैसला आया था। क्या माकपा वालों ने कभी उसे कार्यान्वित कराने की कोशिश की? नहीं, एक कदम भी नहीं बढ़े वे उस पर। क्या ये उनका दायित्व नहीं था? आखिर क्यों सिर्फ शबरीमला पर उनमें ये दायित्चबोध जाग उठा? ये उत्कट ‘कर्तव्यबोध’ हिन्दू समाज के मामले में ही क्यों जाग उठा? यह मेरी समझ से परे है।
वहां इस वक्त इतने पुलिस वाले तैनात हैं, कितने ही अवरोध हैं और चैकपोस्ट हैं। चप्पे-चप्पे पर पुलिस की तैनाती पर क्या कहेंगे? 
सही कहा आपने, वहां मैदाने-जंग जैसे हालात बना दिए हैं पिनरई सरकार ने। राज्य सरकार ने वहां ऐसे पुलिस अधिकारी तैनात किए हैं जो लोगों से, यहां तक कि केन्द्रीय मंत्रियों तक से बुरे तरीके से पेश आने में महारत रखते हैं। भारी पुलिसबल तैनात किया हुआ है। यह सब दुर्भाग्यपूर्ण है। आखिर क्यों वे तीर्थ के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के साथ ऐसा बर्ताव कर रहे हैं जैसे वे आपके दुश्मन हों! यह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। भगवान अयप्पन सिर्फ हिन्दुओं के देवता नहीं हैं, वह तो पूरे केरल के आस्था-केन्द्र हैं। पूरे केरल में उनके प्रति अगाध श्रद्धा है। केरल में कोई किसी भी मत-पंथ को मानता हो, भगवान अयप्पन में उसकी आस्था है।
क्या मुख्यमंत्री पिनरई विजयन इस तर्क पर श्रद्धालुओं के साथ ऐसा दुर्भावनापूर्ण व्यवहार कर सकते हैं कि वह अदालत के आदेश को लागू कर रहे हैं?
मुझे नहीं लगता, वह ऐसा कर सकते हैं। वहां 15,000 पुलिसकर्मियों को तैनात करने की क्या जरूरत है? वहां उन्हें धारा 144 लगाने की क्या जरूरत है जिससे लोग इकट्ठे न हो सकें, नाम-जप न कर सकें? ये सब बंदोबस्त किसलिए? क्या जरूरत है इसकी? यह गैरकानूनी है।
पिनरई विजयन के इन कदमों को क्या अदालत रोक नहीं सकती? केरल उच्च न्यायालय ने इस पर जो सख्त रवैया अपनाया है, उसे कैसे देखते हैं?
केरल उच्च न्यायालय के संज्ञान में ये सारी बातें लाई गई हैं और न्यायालय ने उनसे पूछा है, ये इतने पुलिसवाले क्यों तैनात किए गए हैं? लोगों के लिए दिक्कतें क्यों खड़ी की गई हैं? राज्य सरकार से पूछा गया है कि उसने आॅर्थोडॉक्स चर्च और शबरीमला मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश लागू कराने के लिए क्रमश: दो तरह के मापदण्ड क्यों अपनाए हैं? राज्य सरकार को इसका गंभीरता से जवाब देना चाहिए।
श्रद्धालुओं की मांग थी कि केरल सरकार सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की पुनर्समीक्षा के लिए याचिका दाखिल करे। लेकिन सरकार ने इस मांग को एक तरह से खारिज कर दिया। आपका क्या कहना है?
देखिए, केरल देवासम बोर्ड इस मामले में गंभीर नहीं है। मैं कुछ दिन पहले पंबा और शबरीमला गया था। मुझे दुख हुआ यह देखकर कि वहां सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं था। वहां कितने ही स्थान, विश्रामालय आदि बाढ़ और चक्रवात से तबाह हो चुके थे। मैंने वहां कहा भी कि ये सब चीजें हमें युद्धस्तर पर दोबारा खड़ी करनी होंगी। लेकिन उन्होंने कुछ भी नहीं किया। न पंबा में, न निलक्कल में, जो अभी बेस स्टेशन है। पत्ता तक नहीं हिलाया उन्होंने। वे हिन्दू श्रद्धालुओं के लिए किसी भी तरह की सुविधा का इंतजाम करने को लेकर बिल्कुल भी गंभीर नहीं हैं।
केन्द्र से आपके पर्यटन मंत्रालय की तरफ से कुछ राशि दी गई थी इस काम के लिए। उसका क्या हुआ?
हमने पर्यटन मंत्रालय की तरफ से 100 करोड़ रुपए दिए थे, आधारभूत ढांचा तैयार करने के लिए। ये काम पंबा, निलक्कल और सन्निधानम् में किए जाने थे, श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए उन्हें व्यवस्थित करना था। उन्हें राशि की पहली किस्त जारी कर दी गई थी, उसका पूरा इस्तेमाल होने के बाद दूसरी किस्त दी जानी थी। लेकिन दूसरी किस्त हम नहीं दे पाए, क्योंकि राज्य सरकार ने पहली किस्त ही खर्च नहीं की।
कपाट खुलने के बाद दूसरे पंथ की कुछ नास्तिक के रूप में जानी जाने वाली महिलाओं ने जबरन मंदिर में जाने की कोशिश की। इसके पीछे उनकी क्या मंशा देखते हैं?
कुछ नहीं, सिर्फ अव्यवस्था फैलाना, मुश्किलें खड़ी करना। वे अपने चेहरे टेलीविजन पर देखने को उत्सुक थीं। आखिर जो पहले कभी शबरीमला नहीं गई, वह ऐसे वक्त में वहां क्यों जाना चाहेगी? मेरा कहना है कि पुनर्समीक्षा की याचिका सर्वोच्च न्यायालय के सामने है, जिसका एकाध महीने में फैसला आ जाएगा। तब तक कोई तूफान तो नहीं खड़ा हो जाएगा, क्यों न तब तक इंतजार किया जाए। इसके बाद जो फैसला आए वैसा करें। आखिर अब से पहले तो वे वहां कभी नहीं गई हैं न। इनमें से कुछ, जो खुद को ‘सेलेब्रिटी’ समझती हैं, उनका मकसद सिर्फ परेशानी खड़ी करना है। देखिए, मैं ईसाई मत का हूं, मत के अनुसार चलता हूं, शबरीमला भी जाता हूं, लेकिन जो दूसरे मत से है और अपने उस मत के रिवाजों पर भी नहीं चलता, वह अगर जबरन शबरीमला जाने की कोशिश करे तो साफ है, वह अड़चन पैदा करना चाहता है।
आने वाले दिनों में शबरीमला को लेकर क्या दृश्य देखते हैं?
इस प्रकरण ने माहौल बहुत खराब किया है। पर्यटन को इससे काफी नुकसान पहुंचा है। अब उतनी संख्या में लोग वहां नहीं जा रहे हैं। यह माहौल मेरे विभाग के लिए भी मुश्किलें खड़ी कर रहा है। पर्यटन कितने ही लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है, यह केरल राज्य के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत है। ‘गॉड्स ओन कंट्री’(भगवान की धरा) की छवि को धक्का पहुंचाया जा रहा है।
इन सब बाधाओं, दुरावस्थाओं के बाद भी बहुत बड़ी तादाद में श्रद्धालु शबरीमला पहुंचने को आतुर हैं। उनके लिए आपका क्या संदेश है?
मैं इतना ही कहूंंगा कि इन मुश्किलों का सामना करते हुए भी उन्हें भगवान के दर्शनों के लिए जाना चाहिए। यही तो आस्था है, और आस्था ही है जो मायने रखती है। छोटी-मोटी बाधाओं को पार करते हुए लोगों को पूरी श्रद्धा के साथ स्वामी अयप्पा के दर्शन को जाना चाहिए।