‘कल्याण’ पत्रिका से संबंधित रपट‘कल्याण’ को निशाना बनाने का कारण?
   दिनांक 12-मार्च-2018


 
अक्षय मुकुल की चर्चित पुस्तक इस कारण विवादों मेें है क्योंकि इसमें उल्लेखित कई तथ्य वास्तविकता से दूर और विवादित हैं। पूरे प्रकरण और संदर्भों को सामने रखती विशेष रिपोेर्ट

 क्या महात्मा गांधी के देहांत पर ‘कल्याण’ में श्रद्धांजलि प्रकाशित हुई थी? इस प्रश्न से जुड़े अब दो तरह के उत्तर मौजूद हैं। पाठकों की जानकारी के लिए बता दें कि ‘कल्याण’ गीता प्रेस (गोरखपुर) द्वारा प्रकाशित एक मासिक हिंदी पत्रिका है, जिसमें मुख्य रूप से धर्म, संस्कृति और अध्यात्म केंद्रित आलेख प्रकाशित होते हैं। अक्षय मुकुल ने गीता प्रेस पर लिखी अपनी किताब ‘गीता प्रेस एंड द मेकिंग आॅफ हिंदू इंडिया’ (हार्पर कॉलिंस इंडिया, 2015) में बताया है कि गांधी जी की मृत्यु पर ‘कल्याण’ में कोई चर्चा नहीं हुई थी। वे लिखते हैं, ‘‘गांधी की हत्या पर गीता प्रेस ने एक सुविचारित चुप्पी साधे रखी...‘कल्याण’ के फरवरी और मार्च, 1948 के अंक में गांधी की कोई चर्चा क्यों नहीं हुई?’’(पृ. 58)

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों पाञ्चजन्य के दो अंकों (26 मार्च, 2017 और 11 फरवरी, 2018) में डॉ. संतोष कुमार तिवारी के दो लेख प्रकाशित हुए हैं। इन दोनों लेखों में मुकुल की बातों को निराधार ठहराने वाले तथ्यों के साथ इस मामले का पूर्ण सत्य सामने रखा गया है। 11 फरवरी, 2018 के अंक में प्रकाशित लेख में कहा गया है, ‘‘महात्मा गांधी की हत्या के दिन शाम तक ‘कल्याण’ की अधिकांश प्रतियां भेजी जा चुकी थीं। बाकी जो प्रतियां बची थीं उनके प्रारंभ में ही महात्मा गांधी के बारे में तीन पृष्ठ चिपका कर उन्हें पाठकों को भेजा गया था। इन तीन पृष्ठों में से पहले पृष्ठ पर बापू की तस्वीर थी।’’

इस तरह मुकुल की एक पत्रकार वाली परिसीमा उन्हें इतिहास की पेचदार प्रक्रिया को समझने से रोक देती है। गांधी की हत्या जैसी गंभीर घटना के बाद कई लोग गिरफ्तार हुए थे। तो क्या हर गिरफ्तार व्यक्ति को गांधी के प्रति द्वेष भाव रखने का दोषी और हत्या का षड्यंत्रकारी माना जा सकता है? मुकुल, हनुमान प्रसाद पोद्दार और गीता प्रेस की ‘सुविचारित चुप्पी’ को रेखांकित करके अपनी किताब में यही संकेत देते जान पड़ते हैं, लेकिन यह एक तथ्यात्मक भ्रम है।

पक्षांतर और पूर्ण तथ्य

मुकुल अपने पक्ष में कहते हैं, ‘‘मेरी पुस्तक में यह भी बताया गया है कि कल्याण के अप्रैल, 1948 के अंक में गांधी के ऊपर एक आलेख था। जहां तक फरवरी, 1948 के अंक की बची हुई प्रतियों पर अलग से तीन पृष्ठ चस्पां करने का दावा किया गया है, तो मैंने ऐसा कोई अंक नहीं देखा। मेरे पास अभी भी कल्याण के 1948 वाले सारे अंक मौजूद हैं और मैं उन्हें जरूरत पड़ने पर साझा करने को तैयार हूं।’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘जैसा कि पाञ्चजन्य के लेख में कहा गया है कि कुछ अंक गांधी से संबंधित उन तीन पृष्ठों के बगैर वितरित हुए तो संभव है कि लाखों पाठकों ने उसे नहीं देखा होगा। इसमें तथ्यात्मक त्रुटि कहां है? मैंने जो लिखा है, उस पर कायम हूं।’’ तो क्या मुकुल यह कह रहे हैं कि किसी स्रोत की जानकारी न होने से उसे नदारद मान लिया जाए?

ज्ञातव्य है कि एक शोधार्थी रजनीश कुमार चतुर्वेदी ने भी 2006 में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ (वाराणसी) में जमा किए गए अपने शोध प्रबंध में अक्षय मुकुल वाली ही गलती की थी। उन्होंने भी कल्याण की वही प्रति देखी थी जो श्रद्धांजलि छपने से पहले वितरित हो चुकी थी। लेकिन रजनीश बताते हैं, ‘‘जब बाद में मुझे श्रद्धांजलि वाले पृष्ठ गोरखपुर की गीता वाटिका में देखने को मिले तो मैंने शोध प्रबंध की व्यक्तिगत प्रति में सुधार किया।’’ रजनीश के शोध प्रबंध का विषय ‘पत्रकारिता के क्षेत्र में धार्मिक पत्रिका कल्याण का योगदान’ था।

डॉ. तिवारी के लेख में पोद्दार और गांधी के आत्मीय संबंधों के ब्योरे पर मुकुल ने कहा, ‘‘मेरी पुस्तक में बॉम्बे के दिनों से ही गांधी और पोद्दार के संबंधों पर विस्तार से चर्चा की गई है। साथ ही यह भी दर्शाया है कि अनुसूचित जातियों के मंदिर प्रवेश के मुद्दे के बाद यह संबंध कैसे बिगड़ता रहा। पुस्तक में इसे समग्रता से बताया गया है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘पाञ्चजन्य के आलेख में जो भी बातें कही गई हैं, चाहे वह, विज्ञापन न लेने की बात हो, पुस्तक समीक्षा न करना हो, या गोरखपुर जेल में देवदास गांधी की देखभाल हो, इन सब पर मेरी पुस्तक में विस्तार से चर्चा हुई है। लेखक ने मेरी पुस्तक से ये बातें ली हैं और अब वे संसार को शिक्षित कर रहे हैं। यह हास्यास्पद है।’’

डॉ. तिवारी ने यह बात रेखांकित की है कि वे इन तथ्यों को अपनी खोज नहीं बता रहे हैं। ये जानकारियां और पुस्तकों में भी उपलब्ध हैं। उन्होंने इन तथ्यों को ठीक तरह से संदर्भित करने की ओर इशारा किया है। लेकिन मुकुल अपनी विवेचना पर अड़े हुए हैं। उन्होंने प्रतिवादी स्वर में पूछा, ‘‘क्या पाञ्चजन्य में प्रकाशित आलेख के लेखक यह समझा सकते हैं कि गांधी की हत्या के बाद हनुमान प्रसाद पोद्दार और जयदयाल गोयंदका को क्यों पकड़ा गया था? दोनों को रिहा करवाने के लिए बद्रीदास गोयनका द्वारा जी. डी. बिड़ला को लिखे गए पत्र को कैसे देखा जाए। इस पत्र को मेधा कुदैस्या द्वारा लिखी गई जी.डी. बिड़ला की जीवनी में पाया जा सकता है।’’

उल्लेखनीय है कि डॉ. तिवारी इन प्रश्नों का उत्तर पहले ही दे चुके हैं। अपने लेख ‘गीता प्रेस को बदनाम करने की कोशिश’ में उन्होंने सवाल खड़े किए थे, ‘‘विवेचित पुस्तक में यह नहीं बताया गया है कि उन्हें किस तारीख को गिरफ्तार किया गया? कब रिहा किया गया? उन्हें किस जेल में रखा गया था?’’(देखें, पाञ्चजन्य, 26 मार्च, 2017)

मुकुल पूछते हैं, ‘‘अगर पाञ्चजन्य में किया गया दावा सच है तो गीता प्रेस के संरक्षकों ने यह बात एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल को दिए गए अपने लंबे साक्षात्कार में क्यों नहीं उठाई, न ही आॅर्गनाइजर में की गई समीक्षा में यह बात आई है।’’ लेकिन क्या नई जानकारी को महज इसलिए नहीं जोड़ा जाए, क्योंकि वह पहले सामने नहीं आई? साफ है कि मुकुल के सवालों में तार्किकता की कमी है।

मध्य मार्ग

मुकुल यह मानने को तैयार नहीं लगते कि कई बार शोधकर्ता हर स्रोत की पहचान नहीं कर पाता। वह कई बार स्रोतों और दस्तावेजों को उनके ‘‘फेस-वैल्यू’’ पर लेने की भी गलती करता है। डॉ. संतोष तिवारी ने मुकुल पर कोई आक्रमण न करके एक ‘स्रोत आलोचना’ की है। उन्होंने यह इंगित किया है कि ‘कल्याण’ में गांधी को श्रद्धांजलि की कहानी मुकुल की जुबानी से आधी सुनाई गई है।

असल में ‘कल्याण’ में दो श्रद्धांजलियां प्रकाशित हुई थीं। एक में राघव दास ने गांधी की तुलना ग्रंथों में पढ़े गए संतों से की है। उन्होंने लिखा है, ‘‘ग्रंथों में संतों के वर्णन पढ़े थे। पर प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर इसी महान पुरुष के जीवन में हमें मिला। संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार ने अपने संदेश में लिखा था, ‘‘गांधी जी धर्म और जाति के भेद से ऊपर उठे हुए थे और सत्य एवं अहिंसा के सच्चे पुजारी थे’’

क्या मुकुल किसी प्रकार की अकादमिक और पत्रकारीय निष्ठा से खिलवाड़ करने के आरोपी हैं? किताब के लिए अलंकृत भाषा में मान-बड़ाई करने वाले इतिहासकार रामचंद्र गुहा और शाहिद अमीन से इस मामले पर जब टिप्पणी करने को कहा गया तो उन्होंने बात लेखक की ओर ही बढ़ा दी।

तो अब जबकि कल्याण का यह पूर्ण सत्य सामने आ चुका है, हमें मांग करनी चाहिए कि अक्षय मुकुल शोध की नैतिकता का ध्यान रखते हुए पुस्तक के आगामी संस्करण में अपने दावे को संपादित करें या उसी पृष्ठ पर फुटनोट लगाकर इस तथ्य को सामने रखें और पाञ्चजन्य के आलेख का आभार व्यक्तकरें। (लेखक आधुनिक इतिहास के अध्येता हैं)

दुष्प्रचार के सिवा कुछ नहीं

पाञ्चजन्य में प्रकाशित डॉ. संतोष कुमार तिवारी के दोनों लेखों में अक्षय मुकुल की किताब की अच्छी खबर ली गई है और तथ्यों के साथ किताब के कुछ अंशों का खंडन किया गया है। डॉ. तिवारी ने पुस्तक में प्रकाशित इस तथ्य को निराधार और झूठ सिद्ध किया है जिसमें यह लिखा है कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद कल्याण के संपादक आदरणीय हनुमान प्रसाद पोद्दार और गीता प्रेस के संस्थापक श्री जयदयाल गोयंदका को गिरफ्तार किया गया था। पुस्तक में दूसरा झूठ यह लिखा है कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद ‘कल्याण’ के अगले अंकों में उन पर कोई श्रद्धांजलि प्रकाशित नहीं की गई।

दोनों आरोप इतने गंभीर और असत्य हैं कि कोई भी लेखक बिना तथ्यों का पूरा पता लगाए पुस्तक में इसका उल्लेख कैसे कर सकता है? महात्मा गांधी और पोद्दार जी के संबंध कितने निकट के थे, इसको जाने बिना लिखना तो जान-बूझकर षड्यंत्र और दुष्प्रचार करना है। श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार ‘कल्याण’ के यशस्वी संपादक ही नहीं, अपितु भारतीय मनीषा के अनन्य उपासक, आध्यात्मिक चिंतक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उनका कर्मशील जीवन केवल साहित्य, संस्कृति और अध्यात्म के क्षेत्र तक सीमित नहीं था। देश के सभी धार्मिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक क्षेत्र के साधकों के बीच उनको गहरा सम्मान प्राप्त था। ‘कल्याण’ के माध्यम से उन्होंने नैतिकता और आस्तिकता की साधना की देशव्याापी चेतना जगाई थी।

ऐसे महामानव और उनकी साधना के जीवंत स्मारक ‘गीता प्रेस’ के विरुद्ध उनके निधन के 50 वर्ष बाद यह दुष्प्रचार आश्चर्यजनक है। -अच्युतानंद मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार  

पुरस्कार की गिरी प्रतिष्ठा

‘गीता प्रेस एंड द मेकिंग आॅफ हिंदू इंडिया’ के लेखक अक्षय मुकुल को रामनाथ गोयनका पुरस्कार मिल चुका है। इंडियन एक्सप्रेस समाचार पत्र समूह के संस्थापक स्व. रामनाथ गोयनका (1904-1991) का भारतीय पत्रकारिता में एक सम्मानित स्थान है। उन्हीं की स्मृति में यह पुरस्कार दिया जाता है। परंतु अब ऐसे बहुत लोग हैं, जो मानने लगे हैं कि ऐसी पुस्तक के लेखक को सम्मानित करने से गोयनका पुरस्कार की गरिमा गिरी है। गोयनका पुरस्कार की तरह ही पुलित्जर पुरस्कार अमेरिका में दिया जाता है। वर्ष 1981 में यह पुरस्कार ‘वाशिंग्टन पोस्ट’ की पत्रकार जेनेट लेसली कुक को उनके एक लेख पर दिया गया था। बाद में पता चला कि उनका लेख पूरी तरह आधारहीन है, तो हंगामा हुआ और कुक ने वह पुरस्कार वापस कर दिया। कुक को यह पुरस्कार देने की सिफारिश मशहूर पत्रकार बॉब वुडवर्ड ने की थी। वुडवर्ड उन दो पत्रकारों में से एक हैं, जिन्होंने अमेरिकी राष्टÑपति निक्सन के वाटरगेट कांड का भंडाफोड़ किया था और अंत में निक्सन को राष्टÑपति पद से इस्तीफा देना पड़ा था। कहने का मतलब यह है कि बड़े-बड़े लेखकों और पत्रकारों से भी सिफारिश करने में गलती हो सकती है।

इसी तरह 2017 में सिंगापुर की नानयांग टेक्नोलोजिकल यूनिवर्सिटी ने सबीरा बोनाला नामक महिला की पीएच़ डी़ डिग्री वापस ले ली थी, क्योंकि उसने अपने शोध में झूठे तथ्यों का इस्तेमाल किया था। इस मामले में कई और लोग भी फंसे थे। इसी प्रकार अमेरिका के ओहायो विश्वविद्यालय ने 2017 में जोडी व्हाइटकर की पीएच़ डी़ डिग्री वापस ले ली थी। मुझे नहीं मालूम कि हमारे देश में किसी की पीएच़ डी़ डिग्री वापस ली गई हो। शायद मुकुल के साथ भी ऐसा ही होगा, जबकि उन्होंने तथ्यों को जाने-परखे बिना लिखा है।

मुकुल के अतिरिक्त भी अनेक विद्वानों ने गीता प्रेस, ‘कल्याण’ और हनुमान प्रसाद पोद्दार पर लेखन और शोध किया है। वरिष्ठ पत्रकार और माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के पूर्व कुलपति अच्युतानंद मिश्र उनमें से एक हैं। उन्होंने पोद्दार जी के पत्रों का संपादन कर एक पुस्तक प्रकाशित की है। इसका शीर्षक है- ‘पत्रों में समय संस्कृति’। डॉ. रजनीश चतुर्वेदी ने भी इस विषय पर पीएच़ डी़ शोध प्रबंध लिखा है। इन सब विद्वानों ने मुकुल की किताब में लिखी गई बातों को नकारा है। -डॉ.संतोष कुमार तिवारी