बीएचयू  : साजिश हुई उजागर
   दिनांक 19-मार्च-2018

 
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश वी.के.दीक्षित की अध्यक्षता में गठित समिति ने सितंबर, 2017 को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर में घटी घटना को न केवल सुनियोजित साजिश करार दिया बल्कि स्पष्ट किया कि अराजक तत्वों ने छात्र/छात्राओं   के धरना-प्रदर्शन की आड़ में बाहरी लोगों के साथ मिलकर विश्वविद्यालय की गरिमा एवं तत्कालीन कुलपति की छवि को धूमिल करने का प्रयत्न किया

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में गत 21 सितंबर, 2017 को एक छात्रा के साथ छेड़छाड़ की घटना घटती है। विवि. प्रशासन तत्काल घटना का संज्ञान लेता है। खुद कुलपति गिरीश चन्द्र त्रिपाठी छात्राओं से मिल कर अप्रिय घटना पर न केवल खेद व्यक्त करते हैं बल्कि छात्राओं को आश्वस्त करते हैं कि परिसर में भविष्य में ऐसी घटना न घटने पाए, उसके लिए विवि. प्रशासन उचित कदम उठाएगा। इसके बाद मामला शांत हो जाता है। लेकिन 22 सितंबर की सुबह सिंह द्वार पर विवि. की छात्राएं जुटती हैं और छेड़छाड़ की घटना का विरोध करती हैं। दोपहर होते-होते यह आन्दोलन अराजक तत्वों एवं वामपंथी संगठनों (स्टूडेंट फॉर चेंज, आइसा, आंबेडकर बिग्रेड, संदीप पांडेय मंडली, भगत सिंह मोर्चा, ज्वाइंट एक्शन कमेटी) के हाथों में जा चुका होता है। उसके बाद यह वामपंथी खेमा साजिश के तहत न केवल परिसर को अशांत करता है बल्कि विश्वविद्यालय की गरिमा एवं तत्कालीन कुलपति की छवि को धूमिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। आग में घी डालने के लिए पहले से तैयार सेकुलर मीडिया वामपंथी खेमे को संबल देते हुए विवि. प्रशासन और कुलपति के खिलाफ ऐसा माहौल बनाता है जिससे एकबारगी किसी को भी यकीन हो जाए कि छेड़छाड़ की घटना पर विवि. प्रशासन ने तत्काल कोई कड़ा कदम नहीं उठाया। लिहाजा 23 सितंबर तक विवि. को विद्वेषी राजनीति का अखाड़ा बना दिया जाता है। लेकिन पाञ्चजन्य ने 31 दिसंबर, 2017 के अंक में ‘नाहक विवाद’ शीर्षक से रिपोर्ट छापकर तथ्यों के साथ न केवल अराजक तत्वों की कारगुजारियों की परतें उघाड़ीं बल्कि छेड़छाड़ की घटना के बाद कैसे विवि. और कुलपति को अस्थिर करने की साजिशें रची गर्इं, उसको भी क्रमवार उजागर किया।

 अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) वी.के दीक्षित की अध्यक्षता वाली समिति ने भी पाञ्चजन्य की रिपोर्ट पर मुहर लगा दी है। विश्वस्त सूत्रों और मीडिया रपटों की मानें तो समिति ने विवि. प्रशासन को जो रिपोर्ट सौंपी उसमें स्पष्ट किया है कि कुछ लोगों ने छात्र/ छात्राओं के धरना प्रदर्शन-आंदोलन की आड़ में बाहरी लोगों के साथ मिलकर विवि. की गरिमा एवं तत्कालीन कुलपति की छवि को धूमिल करने का प्रयत्न किया। जबकि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा पीड़ित छात्रा के साथ हुई छेड़खानी की घटना के संज्ञान में आते ही अविलंब कार्रवाई की गई।
सुनियोजित साजिश
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि विवि. में 22-23 सिंतबर को घटी घटनाएं पूर्णत: किसी विशेष उद्देश्य से सुनियोजित थीं। उस अवधि में वाराणसी के सांसद एवं प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी, राज्य के मुख्यमंत्री एवं राज्यपाल के अलावा देशभर का मीडिया जमा था। इस मौके का लाभ उठाकर कुछ लोगों ने विवि. की छवि को धूमिल करने हेतु बाहरी लोगों के साथ मिलकर शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन में सम्मिलित होकर घटनाक्रम को अपने निहित स्वार्थ एवं उद्देश्यों से दूसरी दिशा में मोड़ दिया। उसी में असामाजिक तत्व, राजनीतिक दलों के लोगों ने मिलकर छात्र-छात्राओं को उकसाया ताकि प्रदर्शन को गलत दिशा में भटकाया जा सके। इसमें बाहरी लोगों में आम आदमी पार्टी के संजय सिंह,आईसा नेता सुनील यादव एवं    जेएनयू के पूर्व छात्र मृत्युजंय सिंह      समेत अनेक अराजक एवं असामाजिक तत्वों ने अपने संबोधनों के जरिए छात्र-छात्राओं को उत्तेजित किया।
प्रशासन की कार्यशैली पर उठाए सवाल
वी.के दीक्षित समिति ने स्पष्ट किया है कि उक्त घटना में पीड़ित छात्रा ने लंका थाने में शिकायत की लेकिन इतने संवेदनशील मसले पर पुलिस की ओर से तत्काल कोई कार्रवाई न करने से मामले ने तूल पकड़ा। क्योंकि अगर रात में ही प्रशासन सतर्क होकर आवश्यक कार्रवाई करके छात्राओं को उनकी सुरक्षा के संबंध में आश्वस्त करता तो छात्राएं संतुष्ट हो सकती थीं। जांच समिति ने जहां जिला प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं तो वहीं घटना के वक्त कमिश्नर नितिन गोकर्ण ने बीएचयू प्रशासन को पूरी घटना के लिए दोषी माना था। ऐसे में अब सवाल उठता है कि कमिश्नर ने किन तथ्यों के आधार पर विवि. प्रशासन को तत्काल दोषी मान लिया था? या फिर कमिश्नर ने अपने सिर से समस्या उतारने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन को दोषी ठहराकर इतिश्री कर दी? इस पूरे मामले पर कमिश्नर नितिन गोकर्ण से बात करने की कोशिश की गई लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी। जबकि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी न्यायिक जांच पर कहते हैं,‘‘अभी मैंने रिपोर्ट देखी नहीं है, इसलिए उस पर टिप्पणी करना मेरे लिए संभव नहीं है। पर इतना जरूर कहूंगा कि काशी में जो भी निष्पक्ष व्यक्ति हैं वे सभी जानते थे कि सुनियोजित साजिश के तहत विवि. और कुलपति को बदनाम करने का कुचक्र रचा गया। यह मैं ऐसे नहीं बोल रहा हूं, इसके पूरे प्रमाण मेरे पास हैं।’’ वे कहते हैं,‘‘जिस दिन प्रधानमंत्री का काशी में दौरा होता है। उस दिन ही शाम को ऐसी घटना घटती है। मैं यह मानता हूं कि ऐसी घटना दुर्भाग्यपूर्ण थी। मैंने तत्काल वे सभी प्रयास किए जो विवि. प्रशासन को करने चाहिए। एक घंटे के अंदर हमारे सुरक्षा अधिकारी ने रिपोर्ट थाने में भेजी। लेकिन रिपोर्ट दर्ज करने में हीलाहवाली की गई। अगर तत्काल प्राथमिकी दर्ज कर ली होती तो घटना इतना बड़ा रूप नहीं लेती। मैं यह बात पहले दिन से कह रहा हूं। इसके अलावा दूसरे दिन चीफ प्रॉक्टर और रजिस्ट्रार ने पत्र लिखा कि इस आंदोलन में बाहरी और हथियार लिये लोग देखे गए हैं, जो इस आंदोलन को हिंसक रूप दे सकते हैं। यहां कोई पुलिस का बंदोबस्त नहीं है। इसलिए तत्काल यहां पुलिस की व्यवस्था करें। लेकिन इसके बाद भी कोई नहीं आया। जबकि एक प्रशिक्षु आईएएस ईशा ने आंदोलन को और भड़काया। साथ ही हमारे अध्यापकों को डराया और बेइज्जत किया।
मैंने यह बात कमिश्नर और जिलाधिकारी से कही। लेकिन कुछ नहीं हुआ। जब 23 सिंतबर को आंदोलन हिंसक हुआ और पेट्रोल बम चलने लगे तब, फिर रजिस्ट्रार ने प्रशासन को पत्र लिखा कि विवि. प्रशासन ने जैसी आशंका व्यक्त की थी वैसा ही हो रहा है और अभी भी कोई पुलिसकर्मी नहीं है।  इसके बाद पुलिस आई तो लेकिन उसमें एक भी महिला पुलिसकर्मी नहीं थी। ऐसे में प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठता है कि जब प्रशासन को पता था कि यह आंदोलन लड़कियों का है तो वह महिला पुलिसकर्मियों को क्यों नहीं लाया? उसके बाद लड़कियों पर प्रशासन द्वारा बल प्रयोग किसके आदेश पर किया गया? कुल मिलाकर यही वे घटनाएं रहीं, जिन्होंने आग में घी डालने का काम किया और दोषी विवि. प्रशासन को ठहराया।’’  गौरतलब है कि परिसर में आगजनी, पथराव और तोड़फोड़ के बाद 1 हजार अज्ञात छात्रों के खिलाफ केस दर्ज करने की बात कही गई थी। दोषी छात्रों को चिह्नित करने की जिम्मेदारी एसएसपी आर.के. भारद्वाज ने अपराध शाखा को सौंपी थी लेकिन 5 महीने बाद भी अपराध शाखा सिर्फ बयान दर्ज कर पाई है। अब तक इस मामले में एक भी छात्र को ना तो चिह्नित किया गया और ना ही प्राथमिकी दर्ज हुई। मामले पर पुलिस अधीक्षक (अपराध) ज्ञानेन्द्र नाथ प्रसाद का कहना है कि घटना की जांच की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद ही कार्रवाई होगी।
क्या कहते हैं विवि. से जुड़े लोग
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विधि अधिकारी डॉ. अभय पांडेय न्यायिक जांच पर कहते हैं,‘‘23 सितंबर को परिसर में जो घटना घटित हुई वह सौ फीसद साजिश थी, क्योंकि विवि. प्रशासन ने अपनी समुचित भूमिका निभाई थी जबकि जिला प्रशासन के लचर रवैये के चलते इस घटना ने बड़ा रूप लिया। कुलपति ने तत्काल छात्राओं को बुलाकर बात की, पीड़ित लड़की से बात की और वे सब कार्रवाई से संतुष्ट हो गई थीं। लेकिन कुछ अराजक लोग, जिनकी सुनियोजित साजिश थी कि प्रधानमंत्री शहर में हैं, ऐसे में माहौल को हिंसक किया जाए और उन्होंने वही किया।’’ प्रो. साकेत कुशवाहा ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कुलपति रहे हैं। वे इस मामले पर कहते हैं,‘‘उस दिन परिसर में जो हुआ वह निंदनीय था। किसी भी शिक्षण संस्थान में इस तरह का कार्य उसकी छवि को धूमिल करने का काम करता है। लेकिन जिस तरह सीधे तौर से कुलपति को जिम्मेदार माना गया वह मुझे न्यायसंगत नजर नहीं आता। इस घटना को जानबूझकर बड़ा रूप दिया गया, जिससे विवि. में अस्थिरता जैसा माहौल तैयार हो गया।’’
तीन दशक से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जुड़े प्रो. मंजीत चतुर्वेदी सामाजिक विज्ञान संकाय के डीन रहे हैं। वे कहते हैं,‘‘जांच समिति की अध्यक्षता कर रहे सेवानिवृत्त न्यायाधीश वी.के. दीक्षित को कानूनी पेशे का 4 दशक से भी ज्यादा का अनुभव है। यकीनन ऐसी समिति साक्ष्यों के आधार पर अपनी रिपोर्ट लिखती हैं। यह स्वतंत्र, वैधानिक और निष्पक्ष रूप से अपना काम करती है। वैसे इस रिपोर्ट को अभी किसी ने देखा नहीं है। लेकिन मीडिया के जरिए रिपोर्ट के जो अंश और निष्कर्ष सामने आ रहे हैं वे बिल्कुल सच हैं।’’
बहरहाल, सितंबर, 2017 की घटना के बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को अस्थिर करने की जो साजिश रची गई वह निहित स्वार्थी, राष्ट्रविरोधी वामपंथी साजिश का हिस्साभर थी। न्यायमूर्ति वी.के. दीक्षित जांच समिति ने विवि. में घटी घटना के सच को सामने लाकर वामपंथी और अराजक खेमे की साजिश को उजागर कर दिया है।