केरल/ रपट : सिंगूर की सीखभूली माकपा
   दिनांक २६-मार्च-२०१८
इन दिनों केरल के किसान अपने खेतों को बचाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। हैरानी बात है कि इन आंदोलनकारियों में शामिल किसान माकपा के कार्यकर्ता हैं। इनका कहना है कि माकपा अब सिंगूर और नंदीग्राम जैसी घटना केरल में दोहराना चाहती है, जो उसके लिए घातक  हो सकती है  
14 मार्च वह दिन है जिसे माकपा कभी नहीं भूल सकती, क्योंकि 2007 में इसी दिन नंदीग्राम में हुई खूनी झड़प के परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल में पार्टी को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। फिर भी, केरल का माकपा नेतृत्व, खासकर वामपंथियों के गढ़ कन्नूर में पुलिस के साथ मिलकर वही हरकत दोहरा रहा है और पार्टी कार्यकर्ता आंदोलनरत किसानों के तंबुओं को तहस-नहस कर रहे हैं। किसान कुप्पहम-कुट्टिकोल राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए तालीपरंबार के किज्हत्तूर में 250 एकड़ धान के खेत की भूमि के अधिग्रहण के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं। आंदोलन कर रहे सभी ग्रामीण माकपा से जुड़े हैं। इसके बावजूद माकपा के कार्यकर्ता आंदोलनकारियों के तंबुओं पर आग लगा रहे हैं। लेकिन माकपा के जिला सचिव पी. जयराजन इस बात से इनकार कर रहे हैं। उनका कहना है झूठा आरोप लगाया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों से परेशान होकर गुस्साई जनता ने उनके तंबुओं को जलाया है, लेकिन ग्रामीणों के अनुसार सत्य कुछ और ही है। केरल में सत्ता चला रही माकपा के सामने ग्रामीणों की ओर से किया जा रहा प्रदर्शन गंभीर हालात पैदा कर रहा है। यह आंदोलन राजमार्ग के निर्माण के खिलाफ है जो किसानों के धान के खेतों के बीच से गुजरने वाला है।
इस संघर्ष की शुरुआत एक साल पहले हुई थी वह भी किज्हत्तूर में, जहां सभी पंचायतों पर माकपा का ही शासन है। साफ है कि प्रदर्शनकारियों के समूह में माकपा के कार्यकर्ता ही मौजूद थे। इसका सबूत इस बात से मिलता है कि पार्टी ने तत्काल निर्णय लेकर 12 लोगों की प्राथमिक सदस्यता रद्द कर दी है। पयन्नूर और तालीपरम्बास, जो केरल के मुख्यमंत्री  पिनरई विजयन के साथ-साथ पार्टी के राज्य सचिव और पोलित ब्यूरो सदस्य कोडियारी बालाकृष्णन के गृह जिले हैं, जैसे मजबूत गढ़ में ऐसी स्थिति का उभरना पार्टी के लिए भारी उलझन का सबब है। ऐसे माहौल में पार्टी के प्रभाव वाले क्षेत्र में पार्टी सदस्यों का संघर्ष सवाल खड़ा करता है और आशंका पैदा करता है कि अगर पार्टी ने सही कदम नहीं उठाया तो कहीं एक और सिंगुर या नंदीग्राम न भड़क उठे।  
पार्टी और राज्य सरकार इस बात पर अड़ी थी कि राष्ट्रीय राजमार्ग को चौड़ा करने के लिए कुप्पम-कुट्टिकल बाईपास के लिए 250 एकड़ धान के खेतों का अधिग्रहण किया जाएगा। इस मुद्दे पर गांव वालों ने ‘व्यलक्किली’ के नाम से एक समूह बनाया, जिसमें ज्यादातर युवा और महिलाएं शामिल हैं। उसी के बैनर तले वे भूख हड़ताल पर बैठ गए।
इसके बाद राज्य के मंत्री जी. सुधाकरण  ने व्यलक्किली के साथ एक बैठक की और उन्हें आश्वासन दिया कि सरकार धान के खेतों के रास्ते से होने वाली निर्माण योजना रोक देगी। इससे पहले, बाईपास के लिए सर्वेक्षण कर नक्शा तैयार कर लिया गया था और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया सुचारू रूप से आगे बढ़ रही थी। जब पिनरई की सरकार सत्ता में आई, तब निर्माण कार्य को गति देने के लिए सितंबर, 2016 में कन्नूर में पार्टी की बैठक बुलाई। सभी पार्टी नेताओं ने सड़क के नक्शे पर सहमति जताई और 140 परिवारों को दूसरे स्थान पर जाने का निर्देश दिया गया। लेकिन अचानक अगस्त में अधिकारियों ने बाईपास के नए नक्शे के लिए फिर से एक सर्वेक्षण शुरू कर दिया, ताकि ग्रामीण परिवारों को विस्थापन से बचाया जा सके। अधिकारियों की दलील थी कि नए नक्शे  के तहत सिर्फ 40 परिवारों को ही विस्थापित करने की जरूरत होगी, क्योंकि इसके अनुसार अब सड़क धान के खेतों से होकर गुजरेगी। व्यलक्किली की कार्य परिषद के नेता एन. बैजू कहते हैं,   ‘‘किज्हत्तूर एक कृषि प्रधान गांव है और धान के खेत इसकी जीवनरेखा हैं। स्थानीय लोगों को संदेह है कि निहित स्वार्थ के तहत चंद लोगों ने बाईपास के मूल नक्शे को बदलने के लिए माकपा और सरकार    पर दबाव डाला है।’’
किज्हत्तूर में भड़के विरोध ने माकपा नेतृत्व को हैरत में डाल दिया है, क्योंकि गांव के कार्यकर्ताओं इससे पहले कभी पार्टी की नीतियों को चुनौती नहीं दी थी। लोग नए नक्शे के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, जो उनके धान के खेतों का काल बन कर खड़ा है।   
10 सितंबर, 2016 को माकपा कार्यकर्ता सुरेश ने भूख हड़ताल शुरू की, जिसमें करीब 30 लोग और जुड़ गए। 12 दिन के बाद जब सुरेश को अस्पताल में भर्ती कराया गया, तब 68 वर्षीय कृषि मजदूर नामब्रदथ जानकी भी भूख हड़ताल में शामिल हो गए और माकपा को अपने पहले के फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया। गौरतलब है कि सुरेश माकपा के शाखा सचिव थे, साथ ही  डीवाईएफआई के ग्राम सचिव भी थे, जो माकपा का बहुत महत्वपूर्ण पद माना    जाता है।
इस बीच, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष कुम्मरनम राजशेखरन ने प्रदर्शन स्थल का दौरा किया और सहायता का आश्वासन दिया। माकपा को महसूस हुआ कि बात बहुत बिगड़ गई है, लिहाजा पार्टी के गढ़ में पार्टी की प्रतिष्ठा बचाने के उद्देश्य से प्रदर्शनकारियों के साथ बातचीत शुरू करने का फैसला लिया गया। हालांकि, माकपा नेतृत्व खासकर कन्नूर में पार्टी जिला सचिव पी. जयराजन के अक्खड़ तेवर ने स्थिति को नियंत्रण से बाहर कर दिया है। जिन कार्यकर्ताओं का निष्कासन हुआ, वे बाहर जाकर आंदोलन की चिंगारी को और उकसाने लगे। जवाब में पार्टी और पुलिस को आंदोलनकारियों के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी। एक तरफ पुलिस प्रदर्शन कर रहे गांव वालों को गिरफ्तार कर रही थी, दूसरी तरफ माकपा कार्यकर्ता उनके तंबुओं को जलाकर उनके अवशेष पास की नदी में बहा रहे थे। माकपा नेता गंगाधरन, जिनकी अगुवाई में तोड़फोड़ का तांडव हुआ, को व्यलक्किली ने ‘रीयल एस्टेट एजेंट’ का नाम दिया है। आंदोलनकारी महसूस करते हैं कि माकपा नेतृत्व भू-माफिया के हाथों की कठपुतली बन गया है। इसी कारण से भावी पीढ़ियों की भलाई और 250 एकड़ धान के खेतों को बचाने के लिए किए जा रहे आंदोलन का कोई असर नहीं हो रहा। आंदोलनकारी नेताओं का कहना है कि ऐसा लगता है कि माकपा नेता मूर्खों की नगरी में रह रहे हैं। पहाड़ियों को तोड़कर लाई जा रही मिट्टी से धान के खेतों को पाटकर इनमें 11.5 फुट ऊंची शानदार सड़क बनाने के क्रम में वे जल स्रोतों को जानते-बूझते खत्म करते जा रहे हैं। ये गतिविधियां विनाश को बुलावा दे रही हैं। धान के खेत तो बर्बाद हो ही रहे हैं, मिट्टी के लिए पहाड़ियां भी खत्म होती जा रही हैं। इस कारण ग्रामीण भड़के हुए हैं।
अब वक्त ही बताएगा कि माकपा इस मामले से कैसे निपटती है।   
  ‘‘भू-माफिया की गिरफ्त में  माकपा’’:  सुरेश किज्हत्तूर
‘व्यलक्किली’ आंदोलन के नेता सुरेश किज्हत्तूर से हुई बातचीत के संपादित अंश प्रस्तुत हैं-

  इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

हम सभी माकपा के कार्यकर्ता हैं और हम किसी को भी जमीन से जबरन बेदखल किए जाने के खिलाफ हैं। इसके साथ ही, इस क्षेत्र में पार्टी ने जो अक्खड़ रवैया अपना रखा है, उससे भी हमारा विरोध है।

 ...तो क्या आप विकास के  विरोधी हैं?

बिल्कुल नहीं। हम सड़क बनाने का स्वागत करते हैं। केरल शास्त्र साहित्य परिषद, जो पार्टी से ही जुड़ी हुई संस्था है, ने सुझाव दिया है कि धान के खेत को नष्ट करके सड़क बनाने और मिट्टी के लिए पहाड़ को तोड़ने से बेहतर है कि वहां फ्लाईओवर बना दिया जाए। लेकिन माकपा के नेताओं ने इसे नहीं माना क्योंकि पार्टी पर भू-माफिया का कब्जा है।  अगर फ्लाईओवर बनाने की बात मान ली गई होती, तो माफिया के मंसूबे पूरे नहीं होते।

  14 मार्च, 2018 को क्या हुआ था?

तालीपरम्बास के उप पुलिस अधीक्षक वेणुगोपाल के नेतृत्व में बड़ी संख्या में पुलिस आंदोलन स्थल पर आई और जगह को खाली करने को कहा। और जब हमने मिट्टी तेल उड़ेलकर आत्मदाह करने की कोशिश की तो पुलिस वाले ढीले पड़ गए। लेकिन तभी पुलिस के साथ आए पार्टी नेताओं ने दबाव डाला और पुलिस ने हम लोगों को जबरदस्ती वहां से हटा दिया। जब पुलिस वाले हमें वहां से हटा रहे थे, तब पार्टी के कुछ नेता और कार्यकर्ता हमारे धरनास्थल को आग लगा रहे थे। 27 मार्च से      दोबारा आंदोलन शुरू करने का फैसला किया है।   क्या आपको लगता है कि सरकार नंदीग्राम जैसे कठोर कदम उठाएगी?
अगर वे लोग वैसा कुछ करने का फैसला करते हैं तो इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता। पार्टी के लिए इसके नतीजे भयावह होंगे। केरल में माकपा पहले से ही जमीनी वास्तविकताओं से दूर हो चुकी है और नेता पैसे के दिखावे में उलझकर रह गए हैं। मैं कामना करता हूं कि पार्टी नेतृत्व को कुछ बुद्धि आए  और वे आंदोलनकारी किसानों की बात मान लें।
 ‘ ‘अमीरों की पार्टी बन चुकी है माकपा’’ : के.के. रीमा
के.के. रीमा माकपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता रहे स्व. टी.पी. चंद्रशेखरन की पत्नी हैं। चंद्रशेखरन अपनी खरी बातों के लिए जाने जाते थे। कहा जाता है कि माकपा के लोगों ने ही उनकी हत्या कर दी थी। इन दिनों के.के. रीमा आर.एम.पी. की नेता हैं। वर्तमान आंदोलन के संदर्भ में उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश प्रस्तुत हैं-

इन दिनों माकपा और उसके पुराने कार्यकर्ताओं के बीच जंग छिड़ी हुई है। इस पर आपकी क्या राय है?

आज माकपा अमीरों की पार्टी बनकर रह गई है। यह अपनी विचारधारा और राजनीतिक तार्किकता से पूरी तरह दूर हो चुकी है। अब यह धनाढ्य वर्ग के लिए सोचने वाली एक पार्टी बन गई है। आम आदमी क्या चाहता है, उसका लक्ष्य क्या है जैसी जमीनी वास्तविकताओं से इसका वास्ता नहीं रहा। रियल एस्टेट से जुड़े लोग बड़ी संख्या में पार्टी में शामिल हो रहे हैं और यही लोग अंतत: पार्टी की मौत का कारण बनेंगे।

क्या वर्तमान आंदोलन और आपके पति स्व. टी.पी. चंद्रशेखरन द्वारा पार्टी के गढ़ ऊंचियाम में छेड़े गए आंदोलन में कोई रिश्ता है?

वैसे, तो इन दोनों आंदोलनों में कोई रिश्ता नहीं। कामरेड चंद्रशेखरन कुछ स्थानीय मुद्दों को लेकर पार्टी के ढांचे के भीतर ही लड़ाई लड़ रहे थे। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने कुछ और ही मन बना रखा था और उन्होंने चंद्रशेखरन को रास्ते से ही हटाना बेहतर समझा। धारदार हथियार से बड़ी निर्ममता से उनकी हत्या कर दी गई। आज ऊंचियाम में माकपा को बड़ी ही मुश्किल स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।

    माकपा नेता कोडियरी बालाकृष्णन ने यह कहते हुए आपको पार्टी में शामिल होने का निमंत्रण दिया है कि चंद्रशेखरन कभी भी वाम ताकतों के खिलाफ नहीं थे। आपकी प्रतिक्रिया?

यह इस सदी का सबसे बड़ा मजाक कि है। जिस पार्टी ने मेरे पति की हत्या की, उसी का एक नेता आज मुझे अपनी पार्टी में शामिल होने को कह रहा है। आप माकपा और इसके नेताओं में छाई हताशा साफ को देख सकते हैं।