चीन-अमेरिका का ध्यान सिर्फ अपने फायदे पर
   दिनांक १३-अप्रैल-२०१८
 
आलोक पुराणिक
कारोबार युद्ध छिड़ने की प्रक्रिया चल निकली है। चीन और अमेरिका ने ताल ठोक दी है। अमेरिका ने यह उठाया है कि स्टील पर आयात शुल्क बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया और अल्युमिनियम पर आयात शुल्क दस प्रतिशत कर दिया। बदले में चीन ने भी तमाम अमेरिकी आइटमों पर कर ठोंकने की तैयारी कर ली।
भारत के हित
चीन अमेरिका व्यापार युद्ध से भारत के लिए कोई बड़ी समस्या नहीं उभरनी है। इस की वजह यह है कि अमेरिका के कुल स्टील आयात में भारत में का हिस्सा करीब 2.4 प्रतिशत का है और अल्यूमिनियम के कुल अमेरिकी आयात में भारत की हिस्सेदारी करीब दो प्रतिशत की है। इतनी कम हिस्सेदारी को लेकर बहुत परेशानी
ट्रंप की घरेलू मुसीबतें
चीन के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा 2017 में 375 अरब डालर का हो गया, इसके पहले साल यह 347 अरब डालर का था। कोई देश किसी देश से माल खऱीदता है यानी आयात करता है और उसे माल बेचता है यानी निर्यात करता है। निर्यात और आयात की रकम के बीच के फर्क को व्यापार घाटा कहते हैं। अमेरिका चीन को माल बेच कम पाता है और उससे खऱीदता ज्यादा है। बेचने और खऱीदने का फर्क करीब 375 अरब डालर का है। इस घाटे का मतलब यह हुआ कि चीनी आइटम अमेरिका में धूम मचा रहे हैं और अमेरिकी आइटमों को चीन में खास जगह नहीं मिल पा रही है। अमेरिका की बड़ी फर्मों ने तमाम आइटम चीन में बनाना शुरु कर दिया है, क्योंकि वहां बनाना सस्ता पड़ता है। अमेरिका में खऱीदे गये तमाम आइटमों को उलट पलटकर देखें, तो वहां मेड इन चाइना लिखा मिलता है। कोई आइटम अगर चीन में बन रहा है, तो जाहिर है, उससे रोजगार भी चीनी लोगों को मिलेगा। रोजगार का मसला ट्रंप ने अपने चुनावों में बड़ा बना कर पेश किया था। ट्रंप ने साफ किया था कि अमेरिकन कंपनियों को रोजगार अवसरों को देश से बाहर ले जाने की इजाजत नहीं दी जायेगी।
भारत की भूमिका
ट्रंप भारत पर भी बरसे हैं इस बात के लिए कि भारत में अमेरिकन मोटरसाइकिल हार्ले डेविडसन पर पहले 100 प्रतिशत आयात शुल्क था, वह यह गिरकर 75 प्रतिशत किया गया। फिर इसे पचास प्रतिशत लाने की बात रखी गयी। ट्रंप इससे भी नाराज हैं। वह कहते हैं कि जब भारतीय मोटरसाइकिलें अमेरिका में बिना किसी आयात शुल्क के आती हैं तो फिर अमेरिकन मोटरसाइकिलों पर भारत में इतना कर क्यों लगाया जाता है। ट्रंप ने अपने एक ट्वीट में कहा कि जो देश हमारे उत्पाद पर पचास प्रतिशत का टैक्स लगायेगा, हम भी उस पर पचास प्रतिशत का टैक्स लगा देंगे। हमारे 800 अरब डालर के व्यापार घाटे से निपटने का हमारे पास यही उपाय है, कोई चारा नहीं है। ट्रंप की यह नाराजगी निश्चय ही उनके अमेरिकन मतदाताओं को खुश करती है। अमेरिकन राष्ट्रपति को अपने अमेरिकन मतदाताओं का ख्याल रखना पड़ता है। पर कंपनियों को अपने मुनाफे का ध्यान रखना पड़ता है। उनके लिए चीन, भारत में माल बनाना ज्यादा सस्ता पड़ता है। पर ट्रंप इस सस्ते माल को महंगा कर देंगे अमेरिका में, तो एक उद्देश्य में तो वह सफल हो जायेंगे। वह अपने अमेरिकन मतदाताओं को यह समझा पायेंगे कि उन्होने अमेरिका के हितों को सबसे ऊपर रखा है।
अमेरिका बनाम चीन बनाम भारत-नये समीकरण
पूरे युद्ध में भारत को अपनी भूमिका तय कर लेनी चाहिए। अमेरिका और चीन विश्व व्यापार के हाथी हैं, भारत तो चींटी की भूमिका में है। निर्यात का भारतीय अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा रोल नहीं है और फिर अमेरिका के साथ भारत के हितों के झगड़े भी वैसे नहीं हैं, जैसे चीन के हैं। चीन के लगभग हर ट्रेडिंग पार्टनर के साथ यही झगड़ा है कि चीन माल बेचता ज्यादा है और खरीदता कम है। आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक 2016-17 में चीन के साथ व्यापार में भारत को 51अरब डालर का व्यापार घाटा हुआ था। यानी चीन से आइटम सस्ते ही आ रहे हैं। ये सस्ते तमाम उद्योगों को चौपट भी कर रहे हैं। चीन की कूटनीतिक कोशिश यही रहेगी कि भारत को अमेरिका के खिलाफ अपने साथ खड़ा कर ले। पर भारत के हित चीन के साथ एक हद तक ही हैं, आगे नहीं। अमेरिका के साथ भारत को मिल बैठकर मसले सुलझा लेने चाहिए। लड़ाई दो हाथियों के बीच हो जाये, तो चींटी किसी भी तरफ हो, मारी जाती है। भारतीय उद्योगपति भी सस्ता से सस्ता माल बनाकर अमेरिका और दूसरे देशों में निर्यात कैसे कर पायें, इस मसले पर गहराई से और लगातार चिंतन होना चाहिए।
भारत और चीन के कारोबारी रिश्ते भी हैं और रणनीतिक झगड़े भी हैं। अभी देखें भारत के क्रिकेट टूर्नामेंट आईपीएल का नान वाइवो आईपीएल है, वाईवी चीनी मोबाइल ब्रांड है। भारत के स्मार्ट फोन बाजार की सबसे बड़ी कंपनी अब एक चाइनीज कंपनी है-एमआई इसका बाजार शेयर भारतीय स्मार्ट फोन बाजार में करीब पच्चीस प्रतिशत है। चीन के हित भारत में हैं। भारत के हित में चीन में यूं हैं कि डोकलाम पर ज्यादा सरगर्मियां ना हों और न्यूक्लियर सप्लाई ग्रुप, जो विश्व का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक ग्रुप है, में चीन भारत के लिए रोड़ा न बने। न्यूक्लियर सप्लाई ग्रुप में भारत के जाने से एक अलग तरह के रणनीतिक लाभ भारत को मिलेंगे। पर चीन पाकिस्तान के साथ संबंधों के चलते भारत को इस समूह में आने नहीं दे रहा है। हाल के कुछ महीनों में चीन और भारत के संबंधों की गरमी कुछ कम हुई है। अगर न्यूक्लियर सप्लाई समूह में भारत के प्रवेश को चीन आसान बना देता है, तो यह भारत के हित में है। चीन और अमेरिका आपस में मारधाड़ करें, उनके मसले हैं। भारत के मसले अमेरिका के साथ बेहतर व्यापार के हैं, चीन के साथ सुरक्षा मसलों के साथ साथ बेहतर कारोबारी रिश्तों के भी है। अंतर्राष्ट्रीय डिप्लोमेसी में कोई किसी का नहीं है, सब अपने हितों के साथ खड़े हैं। इसलिए अपने हितों को सबसे ऊपर रखकर ही काम होना चाहिए।