ईरान में धार्मिक स्वतंत्रता की बढ़ती माँग

 

ईरान में सरकार ने 29 महिलाओं को सिर का हिजाब फेंकने के लिए गिरफ्तार किया है। वहाँ सार्वजनिक रूप से महिलाओं का अपना सिर न ढँकना एक अपराध है। लेकिन बड़ी संख्या में महिलाएं इस का प्रतिरोध कर रही हैं। वे इसे साफ तौर पर उन के ‘जीवन में मजहब का अनुचित दखल’ कह कर विरोध कर रही हैं। यह एक बड़ी बात है। वस्तुतः, यह केवल हिजाब का विरोध ही नहीं, बल्कि आम तौर पर मजहबी दबदबे का विरोध है। हाल में ईरान में उठे सरकार विरोधी आंदोलन में एक अनोखी बात देखी गई। आंदोलनकारी लोग केवल सत्ताधारियों के प्रति ही आक्रोश नहीं प्रकट कर रहे थे। वे इस्लामी वैचारिक, मजहबी तानाशाही के खिलाफ भी खुल कर बोल रहे थे। उन का आक्रोश केवल आर्थिक, राजनीतिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध नहीं बल्कि सामाजिक, वैचारिक स्वतंत्रता के लिए भी था।

हालाँकि, ईरान के लिए यह बिलकुल नयी बात नहीं है। चाहे सोशल मीडिया के कारण इस बार सारी दुनिया ने यह देखा। सच यह है कि ईरान में लंबे समय से इस्लामी मतवाद को चुनौती मिली रही है। इस हद तक, कि बौद्धिक, उच्च वर्गीय तबका इस्लामी कायदों, प्रतीकों का प्रदर्शन करने वाले लोगों को पिछड़ा, मंदमति समझता था। यह तो 1979 में अयातुल्ला खुमैनी की इस्लामी क्रांति का दबदबा था, जिस से यह बातें कुछ समय के लिए दब गई। लेकिन खत्म नहीं हुई।

यह आम ईरानी लोगों के रहन-सहन, पहनावे और सामाजिक व्यवहार में आज भी स्पष्ट है। उस में प्रत्यक्षतः कोई इस्लामी झलक नहीं दिखती। यह केवल ऊपरी बात नहीं है। तमाम मुस्लिम देशों में ईरान और मिस्त्र में ही सर्वाधिक उदार लेखक, कवि, आदि होते रहे हैं। कारण, इन देशों की विशिष्ट प्राचीन सभ्यता है, जो इस्लाम के पहले विश्व-प्रसिद्ध थी। इस्लामी अधीनता में आने के बाद भी इन देशों की वह बौद्धिक, सांस्कृतिक, ज्ञान-परंपरा समूल नष्ट नहीं हुई। किसी न किसी रूप में उस की अंतर्धारा वहाँ बनी रही। वहाँ के प्रबुद्ध लोग समझे बिना नहीं रह सकते थे कि इस्लाम के पहले और बाद में उन के देश-समाज में किस प्रकार के परिवर्तन हुए। उन्हें क्या मिला और क्या छिना।

इसीलिए, आधुनिक नवजागरण के बाद जब यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान और उद्योग की उन्नति दुनिया में फैलने लगी तो ईरान में भी अपने मूल सांस्कृतिक, दार्शनिक स्त्रोतों को जानने-समझने की उत्सुकता बढ़ी। यूरोप में ग्रीक चिंतन के प्रति नया आदर जगा था और प्लेटो, अरस्तू, आदि ईसा-पूर्व महान चिंतकों के प्रति गहरी रुचि पैदा हुई।

उसी तरह, ईरानियों ने भी ध्यान दिया कि इस्लाम-पूर्व फारसी सभ्यता महान थी। फलतः ईरानी लोगों में जरथुस्त के धर्म-दर्शन के प्रति उत्सुकता बढ़ी, जो इस्लाम से पहले फारस में प्रतिष्ठित था। इसी दर्शन को भारत में पारसी लोग मानते हैं, जो फारस पर इस्लामी आक्रमण के बाद भाग कर यहाँ आए थे और उस धर्म को बचा कर रखा। गत कुछ पीढ़ियों से ईरानी शिक्षित वर्ग में जरथुस्त दर्शन के प्रति आकर्षण इसलिए भी बढ़ा क्योंकि यह दिनो-दिन और स्पष्ट होने लगा कि इस्लामी मतवाद वैश्विक मनीषा की तुलना में कुछ जोड़ने के बदले केवल अन्य सभी ज्ञान, दर्शन के प्रति उदासीन या हिकारत रखता है। इसी कारण अनेक ईरानी बौद्धिक अपने देश को अरबी साम्राज्यवाद का शिकार समझते हैं, जिस ने एक महान और उन्नत देश, फारस, पर अधिकार कर इस की सभ्यता-संस्कृति को नष्ट किया। उस का सहज विकास बाधित किया। इस तरह, वे इस्लाम को एक बाहरी, थोपी गई चीज समझते हैं।

क्योंकि यह तो जगजाहिर इतिहास है कि सातवीं सदी में फारस पर आक्रमण के द्वारा ही वहाँ इस्लाम जमा। उसे फारसी लोगों ने स्वेच्छा से स्वीकार नहीं किया था। असंख्य जरथुस्त-पंथी वहाँ से भाग कर भारत, चीन और बाल्कन देशों में जाकर रहे। किन्तु उन में कुछ ईरान में भी रहते हुए सदियों तक प्रतिरोध करते रहे। पंद्रहवीं सदी तक भी ईरान उन की संख्या काफी थी, विशेषतः गीलान और मोजनदारान प्रांतों में। उन्होंने इस्लामी शासकों को जजिया टैक्स दिया और अपमानजक पहचान का पीला पट्टा पहना था। वैसे प्रतिरोधी लोग आज भी हैं। बल्कि, अब उन की संख्या कुछ बढ़ी ही है। खुमैनी सत्ता से पहले वे खुल कर नवरोज (पारसी नववर्ष) और वसंतोत्सव मनाते थे। अभी भी ईरान का आधिकारिक नववर्ष नौरोज से ही शुरू होता है।वस्तुतः 1970 के दशक तक ईरानियों के बीच प्राचीन जरथुस्त परंपरा की बात करना, उस पर गर्व करना, आदि बड़ी सामान्य बात थी। प्रवासी ईरानियों के अनुसार तब ईरान में बुर्का, आदि पहनने वाली स्त्री को अशिक्षित, गँवार, छोटे काम करने वाली नौकरानी, आदि जैसा समझा जाता था। वह भावना खुमैनी की इस्लामी क्रांति के तीन दशक बाद भी खत्म नहीं हुई है। अनेक शिक्षित ईरानी मानते थे कि इस्लाम से फारस को लाभ नहीं हुआ और वह भावना आज भी है। बल्कि अरबों के प्रति ईरानियों की स्थाई दुश्मनी में यह भाव भी है, जो गलती से इस्लाम के बदले अरबों को अपना शत्रु समझता है।

बहरहाल, ईरानियों में अपने मूल धर्म-दर्शन, जरथुस्त के विचारों के प्रति रुचि लेने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है। इसे वे अपनी सभ्यता की गौरवशाली थाती समझते हैं, जो इस्लाम से दौ हजार पहले उत्पन्न हुआ था। वहाँ इस्लाम छोड़ कर गुप्त रूप से पारसी धर्म में पुनरांतरण भी हो रहे हैं। यह नवयोत (नवजोत) संस्कार द्वारा होता है। अमेरिका और यूरोप में रहने वाले ईरानियों में यह अधिक खुले रूप में है, जिन के परिवारों में कई जरथुस्त धर्म-रीतियों का पालन होता है। प्रवासी ईरानियों के बीच जरथुस्त धर्म-दर्शन पर शोध, प्रकाशन करने वाले संगठन हैं। उन का ईरान में रहने वाले लोगों के साथ भी सक्रिय संपर्क है। गत चार-पाँच दशकों में दुनिया में इस्लामी दबदबे के नए उभार ने इस प्रक्रिया को बल पूर्वक दबाये रखा। सन् 1979 में खुमैनी के सत्तारोहण के बाद अनेक जरथुस्त-पंथी वहाँ से पलायन कर गए। जो रहे, वे छिपे-से मौन हो गए। इसीलिए ईरान में पारसी अंतर्धारा के प्रति आज दुनिया को बड़ी कम जानकारी है। लोग यह तथ्य भी नहीं जानते कि 2011 की जनगणना के अनुसार आधिकारिक रूप से आज भी ईरान में 25 हजार जरथुस्त मतावलंबी हैं। भारतीय पारसियों समेत दुनिया भर में जरथुस्त-पंथ एक जीवित धर्म है, जिन के मानने वाले हर कहीं जीवन के विविध क्षेत्रों में अग्रणी लोग हैं।

सन् 2007 में ‘फेडरेशन ऑफ जोरास्ट्रियन एसोसियेशन ऑफ अमेरिका’ ने गणना कर पाया था कि विश्व में अभी लगभग दो लाख जरथुस्त-पंथी हैं। लेकिन यह संख्या काफी अधिक हो सकती है। ईरान में जरथुस्तपंथियों की गिनती संपूर्ण नहीं है। कई लोग इस्लामी शासन के भय से इसे व्यक्त नहीं करते, न खुल कर नवयोत का उपयोग करते हैं। क्योंकि अभी ईरान में इस्लाम छोड़ने की सजा मौत है। इसीलिए बाहर रहने वाले जरथुस्त-पंथी पुरोहित भी किसी ईरानी को खुले रूप में नवयोत संस्कार देने से बचते हैं। इसी संदर्भ में, हालिया आंदोलन में खुली इस्लाम विरोधी अभिव्यक्तियों का महत्व समझा जाना चाहिए। प्रवासी ईरानी अपनी सभ्यता की पुरानी भाषा अवेस्तां, जिस में जरथुस्त-पंथ की शिक्षाएं हैं, पर शोध, अध्ययन करते हैं। सतकर्म का आग्रह उस की एक केंद्रीय शिक्षा है। जरथुस्त ने तीन चीजों पर बल दिया था – अच्छे विचार, अच्छे शब्द और अच्छे कर्म। अग्नि को जरथुस्त-पंथी पवित्र और ज्ञान का दैवी प्रकाश मानते हैं। रोचक बात है कि ईरान में चालू आधिकारिक इतिहास कुछ वैसे ही पढ़ाया जाता है, जो भारत में अपनी भूमिका के बारे में अंग्रेज पढ़ाते थे। कि अरब मुस्लिमों ने फारस को जरथुस्तवादियों की बर्बरता से मुक्त कर ‘सभ्य’ बनाया!

सन् 1979 के बाद खुमैनी क्रांति ने ईरान में हर क्षेत्र में इस्लामी कानूनों को सख्ती लागू किया। खुमैनी ने पहले ही लिखा था कि, ‘जरथुस्त-पंथी लोग हीन, अग्नि-पूजक हैं। ... यदि फारस के मंदिर की यह धूल की आग नहीं बुझाई गई तो यह फैल जाएगी और लोगों को (जरथुस्त) पंथ में निमंत्रित करने लगेगी।’ लिहाजा, खुमैनी के सत्तासीन होने के बाद जरथुस्त-पंथ पर भारी चोट की गई। जरथुस्त-पंथी लोगों को दंडित, प्रताड़ित किया गया। कुछ मारे गए, कइयों को जेल हुई और उन की नौकरियाँ चली गईं। उन्हें बड़े सरकारी, सैनिक पदों पर रखना प्रतिबंधित कर दिया गया। सामान्य अपराधों के लिए मुसलमानों की तुलना में उन्हें मिलने वाली सजाएं बढ़ा दी गईं। वे अपने धार्मिक प्रकाशन सीमित संख्या में ही छाप सकते थे। तेहरान के जरथुस्त मंदिर में जरथुस्त के चित्र हटाकर खुमैनी की तस्वीर लगा दी गईं। आदि।

पर इन्हीं कड़ाइयों ने अनेक ईरानियों में अपनी प्राचीन जरथुस्त-सभ्यता के प्रति नए सिरे से कौतूहल भी जगाया। इस्लाम छोड़कर गोपनीय रूप से पुनरांतरण भी होते रहे। जो लोग ईरान से बाहर भागे उन में भी एक पुनर्जागरण चलता रहा। क्योंकि, जब विदेशी सहपाठी, अध्यापक उन से फारसी सभ्यता, जरथुस्त-दर्शन और इस्लाम-पूर्व ईरान के बारे में पूछते तो प्रवासी ईरानियों को आश्चर्य और संकोच भी होता कि अपने ही इतिहास के बारे में उन्हें कुछ नहीं मालूम है! धीरे-धीरे उन्हें अपनी दो पहचान, ईरानी और मुस्लिम, के बीच एक फाँक भी महसूस हुई।

इस प्रसंग में, कुछ जरथुस्त-पंथी लोग इंटरनेट को चमत्कारी वरदान मानते हैं। इस से ईरानियों के बीच अपने इतिहास के प्रति नयी उत्सुकता और ललक बढ़ी। इस ने बौद्धिक, साहित्यिक प्रतिबंधों को लगभग नाकारा बना दिया है। ‘पर्शियन रेनेशाँ फाउंडेशन’ जैसे संगठन ईरानी नवजागरण के प्रति उत्सुकता रखने वालों को तरह-तरह की रोचक सामग्रियाँ उपलब्ध कराते हैं। ऐसे ईरानियों की संख्या लाखों में बताई जाती है जो महसूस करते हैं कि चाहे वे मुस्लिम समझे जाते रहे, पर उन्होंने कभी सोच-विचार कर इस्लामी मान्यताओं को स्वीकार नहीं किया था। अब वे नए सिरे से जरथुस्त दर्शन को स्वयं जानना-परखना चाहते हैं। ताकि अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को स्वयं तुलनात्मक रूप से समझ सकें।

जरथुस्त-पंथ की पवित्र पुस्तक गाथा में जरथुस्त द्वारा रचित सत्रह गीत हैं, जो किसी मतवाद के बजाए संतुलित और शान्तिपूर्ण जीवन का दर्शन है। किसी जबरिया थोपे गए मतवाद के सामने वह आज भी अत्यंत उपयोगी और आकर्षक प्रतीत होता है। खुले मस्तिष्क के किसी ईरानी युवक को यह अपने देश की गौरवपूर्ण विरासत लग सकती है। इस की बजाए मुस्लिम कहलाने में उन में कोई अपनी, ईरानी विशिष्ट पहचान का कोई तत्व नहीं मिलता।

यह सब नई ईरानी युवा पीढ़ी के चिंतनशील लोगों में एक जटिल अंतर्द्वंद्व पैदा करता है। पर धुँधले रूप में वे ईरान का भविष्य एक बहुधर्मी, उदार समाज के रूप ही देख रहे हैं जहाँ वैचारिक, सांस्कृतिक, मजहबी दमन या एकाधिकार नहीं रहेगा। विशेषकर, जहाँ जरथुस्त-पंथ का सम्मानजनक स्थान होगा, क्योंकि वह विशिष्ट ईरानी चीज है! अतः जिसे ईरान में ही दमित-प्रताड़ित रखना तर्कहीन प्रतीत होता है। कुछ ईरानी तो यहाँ तक महसूस करते हैं कि जैसे यहूदियों का अपना देश इजराइल है, उसी तरह जरथुस्त-पंथियों की अपनी भूमि ईरान ही है। संभवतः इसी संकेत से डरकर, ईरान के इस्लामी नेता इजराइल को दुनिया के नक्शे से मिटा देने की कसमें खाते हैं! वरना उन्हें डर है, कि देर-सवेर पुनः जरथुस्त-पंथ ईरान को अपना केंद्र बना लेगा और इस्लामी एकाधिकार जाता रहेगा। न केवल ईरान, बल्कि पास-पड़ोस के अन्य मुस्लिम देशों में भी जरथुस्त-पंथ के प्रति आकर्षण बढ़ सकता है। आखिर, स्वयं अयातुल्ला खुमैनी ने यह आशंका व्यक्त की थी।

यह आशंका निराधार न थी, इस का सब से बड़ा प्रमाण खुमैनी की इस्लामी क्रांति के दस साल बाद स्वयं एक ईरानी राष्ट्रपति के विस्तृत भाषण में मिलता है। ईरान के राष्ट्रपति सैयद मुहम्मद खातमी ने अपने सार्वजनिक भाषणों में भी खुला संकेत दिया था कि इस्लाम कोई सर्वकालिक विचारधारा, सभ्यता या व्यवस्था नहीं है। वे सन् 1982 से 1992 तक ईरान के संस्कृति मंत्री और 1997 से 2005 तक वहाँ के राष्ट्रपति रहे थे। सन् 2000 में अपने एक भाषण में उन्होंने प्रश्न उठाया, ‘‘क्या इस्लामी सभ्यता कभी एक बार उदित होकर कुछ सदी पहले अस्त नहीं हुई? क्या किसी सभ्यता के अवसान का यह अर्थ नहीं होता कि अब हम इस की शिक्षाओं के आधार पर अपने विचार तथा कर्म नहीं गढ़ सकते? क्या यह नियम हमारे इतिहास पर लागू नहीं होता? क्या इस्लामी सभ्यता के उदय और अस्त का मतलब यह नहीं था कि इस्लामी सभ्यता का आधार बनने वाला इस्लाम धर्म का युग जा चुका?’’

ध्यान दें, इस्लामी ईरान गणतंत्र के राष्ट्रपति पद से ऐसे प्रश्न उठाना ही वहाँ की सामाजिक, वैचारिक स्थिति और वहाँ के सामाजिक-बौद्धिक वर्ग में चलने वाले विवादी चिंतन की पर्याप्त झलक दे देता है! यह सब खुमैनी की इस्लामी क्रांति के बीस वर्ष बाद कहा गया। अर्थात्, इस कथन में उस खुमैनी-क्रांति की व्यर्थता स्वीकार करने की भी पूरी झलक है। कि उस क्रांति ने कठोर इस्लामी तानाशाही और अंतहीन मजहबी प्रचार के बावजूद वस्तुतः कुछ हासिल नहीं किया। न आम इरानियों को इस्लाम के प्रति निश्शंक बनाया। उसी भाषण में आगे राष्ट्रपति खातमी कहते हैं, ‘‘यह प्रश्न हमारी क्रांति को मथ रहा है। यदि हम ने उस पर पूरे संयम, संतुलन तथा वस्तुनिष्ठ होकर विचार नहीं किया, यदि हमें इस प्रश्न का कोई ठोस उत्तर नहीं मिला तो हमारी क्रांति को अपरिहार्य रूप से बड़े खतरों तथा कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।’’

इस के बाद सभ्यता और धर्म के अंतर पर अपने विचार रखते हुए, खातमी कहते हैं, ‘‘यदि इस्लामी सभ्यता का सूरज डूब गया और ऐसा बड़ी-बड़ी उपलब्धियों के बावजूद हुआ तो भी इतना कहा जा सकता है कि धर्म के प्रति एक काल-विशेष के अनुकूल पड़ने वाले दृष्टिकोण का अंत हुआ – स्वयं धर्म का अंत नहीं हुआ।’’ फिर वे एक बड़ी गंभीर, तत्वतः इस्लाम-विरुद्ध बात कहते हैं, ‘‘हम विशेष देश-काल के अनुकूल तैयार धार्मिक शिक्षाओं को स्वयं धर्म का प्रत्यय मान बैठने की भूल करते हैं।’’ इस के बाद खातमी पुनः नई सभ्यताओं के बनने की चर्चा करते हैं। फिर यह जोड़ते हैं, ‘‘इस प्रकार, पुरानी इस्लामी-सभ्यता का तो अवसान हो गया तो धर्म की जड़ें गहरी हैं और यह नई सभ्यताओं को जन्म दे सकता है भले ही धर्म की कोई विशेष व्याख्या जो अतीत में इस्लामी सभ्यता की भावभूमि रही – अब अनुपयोगी हो चली हो।’’ अपने भाषण में वे मानवता से प्रेम और मानवीय स्वतंत्रता की जरूरत भी बताते हैं।

राष्ट्रपति खातमी की इन बातों पर ध्यान दें – ये ऐसी बातें हैं जो कोई भी हिन्दू, बौद्ध या यूरोपीय सेक्यूलर विद्वान भी खुशी-खुशी स्वीकार करेगा। ठीक इसीलिए, जिन बातों को कोई इस्लामी आलिम, उलेमा कतई मंजूर नहीं करेगा। यानी, न केवल राष्ट्रपति खातमी एकांतिक इस्लाम की कोई अनुशंसा नहीं कर रहे, बल्कि वे प्रकारांतर साफ मानते हैं कि अब नई सभ्यता की तैयारी का समय है, तथा पुरानी इस्लामी मान्यताओं को तिलांजलि देनी पड़ेगी। क्योंकि वे अनुपयोगी हो चुकी हैं। उस खास इस्लामी दृष्टिकोण का अंत हुआ। यह सर्वोच्च ईरानी नेता के बेलाग, सार्वजनिक, विचार थे! यह भारत में तमाम मुसलमानों के लिए विशेषकर विचारणीय है।

उक्त तमाम बातें बिलकुल साफ-साफ दर्शाती हैं कि ईरानी उच्च और बौद्धिक वर्ग किन प्रश्नों से जूझ रहा है। वह इस्लामी कायदे-कानूनों, रिवाजों को न तो खुदाई मानता है, न सार्वभौमिक, न सार्वकालिक। नोट करें, गंभीरतम बातें रखते हुए खातमी ने एक बार भी न तो कुरान, न प्रोफेट को याद किया। न किसी बात के लिए उन की अनुशंसा, उदाहरण, उद्धरण ढूँढने की जरूरत महसूस की। बल्कि राष्ट्रपति खातमी ने मूल इस्लामी शिक्षाओ को केवल तात्कालिक समाज के लिए उपयुक्त कहकर उसे स्पष्तः मनुष्य निर्मित, न कि अल्लाह-प्रदत्त माना। इन सभी बातों का अर्थ यही है कि खातमी मूल इस्लामी किताब, प्रोफेट, उन के बनाए नियम आदि के प्रति आदर रखने के बावजूद आज की समस्याओं के लिए उन में कोई समाधान, उफया या मार्ग नहीं देखते। यह स्पष्टतः इस्लाम को अतीत हो गई चीज मानने का ही दूसरा तरीका है।

निस्संदेह, राष्ट्रपति खातमी ईरानी लोगों के बीच कोई अपवाद न रहे होंगे। न वे केवल अपना निजी मत दे रहे थे। क्योंकि हमें मालूम है उन की ऐसी उक्तियों के विरुद्ध वहाँ कोई हंगामा नही हुआ था। यह सब कहने के पाँच वर्ष बाद तक वे मजे से राष्ट्रपति बने रहे थे। अर्थात्, उन के जैसे सोचने-समझने वाले वहाँ बड़ी संख्या में हैं और उच्च-वर्ग में भी हैं। वरना, ऐसे स्वतंत्र चिंतक को ईरान का राष्ट्रपति कैसे बनाते? इस पृष्ठभूमि में ही हाल के ईरानी आंदोलन में इस्लाम-विरोधी अभिव्यक्तियों को ठीक-ठीक समझा जा सकता है। अनेक प्रबुद्ध इरानियों को लगता है कि धीरे-धीरे ईरान में अपनी सांस्कृतिक चेतना का विकास वर्तमान इस्लामी राज को यदि खत्म नहीं, तो काफी-कुछ परिवर्तित कर देगा। अपनी प्राचीन, समृद्ध, ऐतिहासिक विरासत के प्रति अधिकाधिक जागरूकता और ईरानी अस्मिता की भावना में वृद्धि इस का मार्ग प्रशस्त करेगी। आम मुसलमानों के बीच शिक्षा, विमर्श और ज्ञान-वृद्धि ही इस का साधन है। यही उन की रणनीति भी है। सीखने, समझने, बताने और अपने विचारों को फैलाने की यह प्रक्रिया इंटरनेट के माध्यम से बढ़ रही है। शोधकर्ताओं के अनुसार, अभी कम से कम एक लाख ऐसे ईरानी मुस्लिम हैं जो औपचारिक रूप से मुस्लिम दर्ज होते हुए भी जरथुस्त की शिक्षाओं का उपयोग करते हैं। ऐसे तो और भी बड़ी संख्या में हैं जो इस्लाम के तमाम दावों पर कतई विश्वास नहीं रखते।

इस प्रकार, सभी संकेतों से लगता है कि ईरानी लोगों में मजहबी दबाव से स्वतंत्रता पाने की माँग बढ़ने वाली है। साथ ही, प्राचीन फारस के जरथुस्त-दर्शन के प्रति उन की उत्सुकता और जागरूकता भी उसी अनुपात में निरंतर बढ़ेगी। हमारे लिए रोचक तथ्य यह भी कि जरथुस्त-दर्शन अनेक हिन्दू मान्यताओं और वैदिक विचारों से मिलता-जुलता है। बहरहाल, ईरान में बढ़ती जागरूकता के फलस्वरूप अंततः इस्लाम-पूर्व की ईरानी चेतना का इस्लामोत्तर ईरान की भावना से आ मिलने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। अर्थात्, भविष्य में एक ऐसे ईरान का विकास, जहाँ सभी धर्मों के समानता से रहने का सहज वातावरण बने। यह भी ध्यान देने की बात है कि सऊदी अरब के नए शासक प्रिंस सलमान ने सऊदी अरब के लिए भी कुछ ऐसे ही लक्ष्य की बात की है। शायद ‘जन्नत की हकीकत’ पूरे मुस्लिम विश्व पर खुलने वाली है!