भारतीय परंपरा की पहचान : छाऊ नृत्य
   दिनांक १४-अप्रैल-२०१८

भारतीय संस्कृति और परंपरा अनेक प्रकार की कलाओं से सजी हुई है | ये कलाएँ भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न भाग है | इन कलाओं के बिना हमारी संस्कृति, परंपराएँ अधूरी हैं | शास्त्रीय कलाएँ भारत की समृद्ध परंपरा का बखान तो करती ही हैं, लेकिन कुछ ऐसी लोककलाएँ भी हैं, जिनके कारण हमारी संस्कृति आज भी इस दुनिया में बुलंद मीनार की तरह सर उठाए खडी है | भारत की इन्ही लोक कलाओं में से एक कला है लोकनृत्य कला | और इन लोकनृत्यों में एक प्रसिद्ध लोकनृत्य है "छाऊ" | यह नृत्य उडीसा, बंगाल और झारखंड में प्रसिद्ध है |
"छाऊ" शब्द की व्युत्पत्ती :
कुछ विद्वानों की जानकारी के अनुसार छाऊ शब्द की व्युत्पत्ती संस्कृत के "छाया" शब्द से हुई है, और कुछ के अनुसार "छावनी" शब्द से भी छाऊ यह शब्द बना है | ये दोनों ही शब्द "छाऊ" नृत्य का वर्णन कर सकते हैं | क्यूँकी छाऊ नृत्य में पौराणिक काल में राक्षस और देवताओं की बीच होने वाले युद्ध को दिखाया जाता है | अत: देवताओं की "छाया" और युद्ध तकनीक दोनों का ही दर्शन होने के कारण इन दोनोंही शब्दों से "छाऊ" शब्द की उत्पत्ती होना सही माना जा सकता है |
छाउ नृत्य भाव भंगिमाओं और नृत्य का मिश्रण है। इसमें युद्ध की तकनीक विशिष्ट रूप से दिखाई गयी है | साथ ही रामायण और महाभारत की कथाओं को इस नृत्य के माध्यम से दिखाया जाता है | यह नृत्य परंपरागत लोक संगीत की धुन के साथ प्रस्तुत किया जाता है। इसके साथ प्रयुक्त होने वाले वाद्ययंत्रों में तरह-तरह के ढोल, धुम्सा और खर्का के साथ मोहुरि एवम शहनाई भी शामिल हैं।
 "छाऊ" नृत्य की विशेषताएँ :
- उडीसा, बंगाल और झारखंड के क्षेत्रीय त्यौहारों में यह लोकनृत्य बहुत प्रसिद्ध है | वार्षिक सूर्य पूजा के समय पर यह नृत्य विशेष रूप से किया जाता है |
- पश्चिम बंगाल में यह नृत्य खुले मैदान में किया जाता है। इसके लिए लगभग २० फुट चौड़ा एक घेरा बना लिया जाता है, जिसके साथ नर्तकों के आने और जाने के लिए कम से कम पाँच फुट का एक गलियारा अवश्य बनाया जाता है। जिस घेरे में नृत्य होता है, वह गोलाकार होता है। बाजे बजाने वाले सभी अपने-अपने बाजों के साथ एक तरफ़ बैठ जाते हैं। प्रत्येक दल के साथ उसके अपने पाँच या छ: बजनिए होते हैं। घेरे में किसी प्रकार की सजावट नहीं की जाती और कोई ऐसी चीज भी नहीं होती, जो इस नृत्य के लिए अनिवार्य समझी जाती हो।
- इस नृत्‍य शैली में मुखौटों का व्‍यापक प्रयोग किया जाता है | मुखौटों के माध्यम से ही देवताओं और शत्रुओं में भेद किया जाता है |
- छाऊ नृत्य सीखने में और करने में अत्यंत कठिन होता है | इसका मुख्य कारण यह भी है, कि छाऊ नृत्य में कंठ संगीत, या यूँ कहा जाये की, गीत नहीं होते | इसमें सर्वाधिक महत्व होता है, वाद्य संगीत का | साथ ही मुखौटे होने के कारण भाव भंगिमाएँ शरीर भाषा के माध्यम से दिखानी होती है | जो अपने आप में बहुत कठिन है | यह एक अत्यंत ओजस्वितापूर्ण नृत्य है | नर्तक की ऊर्जा ही इस नृत्य के लिए सब कुछ है |
छाऊ नृत्य के प्रकार :
छाऊ के प्रमुख तीन प्रकार हैं जो तीन अलग-अलग क्षेत्रों, सेराई केला (बिहार), पुरूलिया (पश्चिम बंगाल) और मयूरभंज (उड़ीसा) से हैं । युद्ध जैसी चेष्‍टाओं, तेज़ लयबद्ध कथन, और स्‍थान का गतिशील प्रयोग छाऊ की विशि‍ष्‍टता है। हर क्षेत्र के मुखौटे एक दूसरे से भिन्न है, अत: मुखौटो के आधार पर छाऊ नृत्य की विधाओं का अनुमान लगाया जा सकता है |
छाऊ नृत्य के माध्यम से वास्तविक ओडीसा, पश्चिम बंगाल और झारखंड के दर्शन होते हैं | वहाँ की कुछ छोटी छोटी परंपराएँ, वहाँ के रीति रिवाज, और वहाँ की संस्कृती इस लोकनृत्य के माध्यम से हम तक पँहुँचती है | लेकिन केवल वहाँ के कुछ गावों को छोड दिया जाय तो यह लोक नृत्य आज भी सामान्य नागरिकों तक नहीं पँहुचा है | इस नृत्य के माध्यम से भारत के एक सशक्त सांस्कृतिक रूप का दर्शन होता है, जो अपने आप में एक विशेष बात है | जिस प्रकार से भारत के हर क्षेत्र में पर्यटन आदी को विकसित करना आवश्यक है, उसी प्रकार इस बात का ध्यान रखना भी आवश्यक है कि, पर्यटन का विकास करते वक्त इन लोक कलाओं को ध्यान में रख अधिकाधिक लोगों तक इसे पँहुचाया जाय | तभी हमारी यह गुप्त कलाएँ सारे विश्व स्तर पँहुचेंगी |
वर्ष २०१७ में "राष्ट्रीय छाऊ नृत्य समारोह" का आयोजन ओडीसा में किया गया था | ओडी संगीत नाटक अकादमी के द्वारा यह समारोह आयोजित किया गया था | इस प्रकार के समारोह के माध्यम से ही देश और देश के बाहर इन कलाओं का प्रसार संभव है, भविष्य में ऐसे और भी समारोह होने चाहिये |
भारत कलाओं का भंडार है | शास्त्रीय नृत्य कलाएँ, लोक कलाएँ इनमें भारत जितना समृद्ध और कोई देश नहीं है, लेकिन समय के साथ भारत का रूप भी बदलता जा रहा है | पाश्चात्य कलाओं का शहरी भारत पर धीरे धीरे प्रभाव पड रहा है | टी.व्ही पर दिखाए जाने वाले "डान्स रिअॅलिटी शो" में भी पाश्चात्य कलाओं का बोलबाला दिखाई पडता है | ऐसे समय में अपनी लोक कलाओं का संवर्धन करना हमारे ही हाथ में है | बचपन से ही बच्चों को शास्त्रीय कलाओं के साथ लोक कलाएँ भी सिखाई जाएँ तो उनकी भी पहचान भारत की मिट्टी से होगी | इन लोक कलाओं में ही असली भारत बसता है | अत: इनकी रक्षा कर हम आने वाली पिढी को एक नये समृद्ध भारत का दर्शन कराएँ |