रोशन होगा भारत का हर कोना
   दिनांक १७-अप्रैल-२०१८
 
—सौर ऊर्जा के क्षेत्र में दुनिया को सबसे पीछे छोड़ देगा भारत, केंद्र सरकार की नीतियों के चलते उर्जा के क्षेत्र में निवेशक ले रहे दिलचस्पी
पिछले दिनों ब्रिटेन की अकाउंटेंसी फर्म अर्नेस्ट एंड यंग (ईवाई) नें अक्षय ऊर्जा क्षेत्र के लिए आकर्षक देशों की सूची में भारत को दूसरा स्थान दिया था। ईवाई ने अपने सूचकांक में भारत को अमेरिका से ऊपर जगह दी है। इसका कारण उसने भारत सरकार की ऊर्जा नीति और अक्षय ऊर्जा की दिशा में उसके प्रयासों को बताया है। असल में पिछले कुछ समय से भारत का अक्षय ऊर्जा क्षेत्र खासकर सौर उर्जा क्षेत्र विश्व भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। इसकी एक बड़ी वजह सौर उर्जा के क्षेत्र में निवेशकों को लुभाते हुए सोलर पॉवर प्लांट से उत्पादित बिजली की दर को न्यूनतम स्तर तक लाने की कारगर रणनीति रही है ।
आंकड़ों के अनुसार बीते तीन साल में भारत में सौर ऊर्जा का उत्पादन अपनी स्थापित क्षमता से चार गुना बढ़ कर 12 हजार मेगावाट पार कर गया है । यह फिलहाल देश में बिजली उत्पादन की स्थापित क्षमता का 16 फीसदी है। केंद्र सरकार का लक्ष्य इसे बढ़ा कर स्थापित क्षमता का 60 फीसदी करना है। देश धीरे धीरे हरित ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है और सौर ऊर्जा की लागत में कमी आने की वजह से अब यह ताप बिजली से मुकाबले की स्थिति में है। एक अनुमान के अनुसार साल 2040 तक भारत आबादी के मामले में चीन को पीछे छोड़ सकता है. ऐसे में भविष्य की इस मांग को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा का प्रयोग करना हमारे लिए जरुरी और मजबूरी दोनों है ।
अब भी देश के करोड़ों लोग बिजली से वंचित हैं, ऐसे में भारत सौर ऊर्जा का सबसे बड़ा बाजार बन सकता है । भारत में सौर ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़नें पर जीडीपी दर भी बढ़ेगी और भारत सुपर पावर बनने की राह पर भी आगे बढ़ सकेगा। देश में साल 2035 तक सौर ऊर्जा की मांग सात गुनी बढ़ने की संभावना है। इस क्षेत्र में अपार संभावनाओं को देखते हुए अब विदेशी कंपनियों की निगाहें भी भारत पर हैं।
सूरज से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए फोटोवोल्टेइक सेल प्रणाली का प्रयोग किया जाता है । फोटोवोल्टेइक सेल सूरज से प्राप्त होने वाली किरणों को ऊर्जा में तब्दील कर देता है । भारत में सौर ऊर्जा की काफी संभावनाएं हैं क्योंकि देश के अधिकतर हिस्सों में साल में 250-300 दिन सूरज अपनी किरणें बिखेरता है । दुनिया में अमेरिका और चीन के बाद बिजली की खपत वाले तीसरे बड़े देश भारत ने वर्ष 2022 तक 175 गीगावॉट हरित ऊर्जा के उत्पादन का लक्ष्य तय किया है। इसमें सौर ऊर्जा का हिस्सा सौ गीगावॉट होगा। यही वजह है कि अब विदेशी कंपनियों की निगाहें भी इस क्षेत्र पर टिकी हैं। भारत की ऊर्जा नीति को लेकर अमेरिका स्थित इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकॉनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस के निदेशक टिम बर्कले के अनुसार भारत के अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में वैश्विक निवेशकों की दिलचस्पी के प्रमुख कारण ऊर्जा नीति में पारदर्शिता और स्थिरता जैसे तत्व हैं। उन्होंने कहा, ‘अगर आप 25 से 35 साल के लिए निवेश करते हैं तो यह जरूरी हो जाता है कि नीतियों में स्पष्टता और स्थिरता हो.’ और फ़िलहाल भारत के सौर उर्जा बाजार में स्थिरता दिख रही है ।
भारत सरकार की अक्षय ऊर्जा नीति में सुधार की शुरुआत अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने के फैसले के साथ हुई। मोदी सरकार ने जून 2015 में जवाहरलाल नेहरू नेशनल सोलर मिशन के लक्ष्य की समीक्षा करते हुए 2022 तक सौर ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य 20 हजार मेगावॉट के आंकड़े से पांच गुना बढ़ाकर एक लाख मेगावॉट कर दिया. इसमें 40 हजार मेगावॉट बिजली रूफटॉप सोलर पैनलों और 60 हजार मेगावॉट बिजली छोटे और बड़े सोलर पॉवर प्लांटों से उत्पादित की जानी है। गौर करने की बात है कि अगर भारत इस लक्ष्य को हासिल कर लेता है तो हरित ऊर्जा के मामले में वह दुनिया के तमाम विकसित देशों से आगे निकल जाएगा। इसके अलावा इससे 2030 तक तेल आयात में 10 फीसदी की कटौती करने का लक्ष्य भी हासिल हो जाएगा। यह प्रदूषण मुक्त सस्ती ऊर्जा के साथ-साथ ऊर्जा उपलब्धता और देश की आत्मनिर्भरता बढ़ाने में सहायक साबित होगा। लेकिन इस बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए 6 लाख करोड़ रुपये का भारी-भरकम निवेश जुटाने की चुनौती है जिससे निपटने के लिए सरकार ने निवेशकों से जुड़े जोखिम में खुद को साझेदार बनाने का फैसला किया. यह इसलिए भी जरूरी था कि राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों की खस्ता माली हालत को देखकर ज्यादातर निवेशक पैस फंसने के डर से आगे नहीं आ रहे थे. इसके समाधान के लिए केंद्र सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक, केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के त्रिपक्षीय समझौते से सोलर एनर्जी कार्पोरेशन ऑफ इंडिया (एसईसीआई) बनाया. इसके जरिए निवेशकों को भरोसा दिलाया गया कि उनके सोलर पॉवर प्लांट से पूरी बिजली खरीदी जाएगी और पैसा फंसने की नौबत नहीं आएगी। सरकार ने सोलर पॉवर प्लांट के लिए जमीन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए भी कदम उठाए हैं । सच्चाई यह है कि सरकार के ये सभी प्रयास निवेशकों का भरोसा बढ़ाने में सफल रहे हैं । इससे न केवल पूंजी की उपलब्धता बढ़ी, बल्कि कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा में भी बढ़ोतरी हुई है ।
कारोबारी पत्रिका ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मोदी सरकार ने भारत की फोटोवोल्टिक क्षमता को बढ़ाने के लिए सोलर पैनल निर्माण उद्योग को 210 अरब रुपए (3.1 अरब अमेरिकी डालर) की सरकारी सहायता देने की योजना बनाई है। समझा जाता है कि ‘प्रयास' नामक इस योजना के तहत सरकार वर्ष 2030 तक कुल ऊर्जा का 40 फीसदी हरित ऊर्जा से पैदा करना चाहती है। सौर ऊर्जा के क्षेत्र में केंद्र सरकार के कृतसंकल्प होनें की वजह से निकट भविष्य में यहां इस क्षेत्र में तेजी से विकास हो रहा है ।
विकास का जो माँडल हम अपनाते जा रहे है उस दृष्टि से अगली प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में हमे उर्जा उत्पादन को लगभग दुगुना करते जाना होगा । हमारी उर्जा खपत बढ़ती जा रही है । इस प्रकार उर्जा की मांग व पूर्ति में जो अतंर है उसे कम करने के लिए अब अक्षय उर्जा ही एकमात्र विकल्प बचा है । पिछले दिनों राष्ट्रापति भवन में जलवायु परिवर्तन के खिलाफ अस्तित्व में आए अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (आईएसए) के पहले सम्मलेन से यह साफ हो गया है की भारत दुनियाँ में सौर क्रांति का नेतृत्व करेगा । ऊर्जा के गहराते संकट के दौर में आज सौर ऊर्जा यानी सोलर एनर्जी हर किसी की उम्मीदों की न खत्म होने वाली किरण साबित हो रही है। दरअसल, धरती को जितनी ऊर्जा की आवश्यकता है वह सूर्य ही पूरी कर सकता है। इसलिए अब दुनियाँ को ऐसी सौर क्रांति की जरुरत महसूस हो रही है जिससे पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए हम अपनी उर्जा जरूरतें पूरी कर सकें ।
सस्ती व सतत ऊर्जा की आपूर्ति किसी भी देश की तरक्की के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। सौर उर्जा और अक्षय उर्जा स्रोतों के लिए भारत में पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं जो ग्राम स्वराज्य या स्थानीय स्तर पर स्वावलंबन के सपने के लिए भी अनुकूल हैं, इसलिए देश में इन्हे बड़े पैमाने पर अपनाने की जरूरत है । जिससे देश में उर्जा के क्षेत्र में बढती मांग और आपूर्ति के बीच के अंतर को कम किया जा सके । इसके लिए हमें न केवल वैकल्पिक ऊर्जा बनाने के लिए पर्याप्त इंतजाम करना होगा, बल्कि सांस्थानिक परिवर्तन भी करना होगा जिससे कि लोगों को स्थानीय स्तर पर ही ऊर्जा की आपूर्ति की जा सके। कुलमिलाकर सौर उर्जा के क्षेत्र में भारत आशातीत प्रगति कर रहा है जिससे एक उम्मीद जगी है कि आने वाले कुछ सालों में भारत उर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो सकेगा ।