स्वदेशी जीपीएस का सपना होगा साकार
   दिनांक १७-अप्रैल-२०१८
 
आईआरएनएसएस -1 आई का सफल प्रक्षेपण, जीपीएस दुनिया में नाविक के नाम से जाना जाएगा
हाल में ही एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने नेवीगेशन उपग्रह आईआरएनएसएस -1 आई का आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से सफल प्रक्षेपण किया। यह भारत के नेवीगेशन उपग्रहों की श्रेणी का आठवां उपग्रह है। पीएसएलवी ने उड़ान भरने के 19 मिनट बाद उपग्रह को कक्षा में स्थापित कर दिया। यह पीएसएलवी के 43 प्रक्षेपणों में से 41वां सफल प्रक्षेपण था। 1,425 किलोग्राम वजनी इस उपग्रह का निर्माण इसरो के सहयोग से बेंगलुरू की निजी कंपनी अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजिज ने किया है। निजी इंडस्ट्री द्वारा बनाया गया दूसरा उपग्रह है। पहला उपग्रह आईआरएनएसएस -1 एच को कक्षा में स्थापित करने का पिछले वर्ष का प्रक्षेपण असफल रहा था। आईआरएनएसएस -1 एच की जगह ही इसे प्रक्षेपित किया गया है . इसरो के चेयरमैन के सिवन ने मिशन को सफल बताते कहा कि इस उपग्रह के आईआरएनएसएस -1 ए का स्थान लेने की संभावना है जो उन 7 नेवीगेशन उपग्रहों में से एक है जो तकनीकी खामी के बाद निष्प्रभावी हो गया था। ये सातों नेवीगेशन उपग्रहों के समूह का हिस्सा हैं। नाविक (NavIC) के तहत इसरो के अभी तक 8 आईआरएनएसएस सैटलाइट छोड़े जा चुके हैं आईआरएनएसएस यानि इंडियन रीजनल नैविगेशन सैटलाइट सिस्टम, इसरो द्वारा विकसित एक सिस्टम है, जो स्वदेशी जीपीएस तकनीक पर आधारित है। इसका मुख्य उद्देश्य देश और उसकी सीमा से 1500 किलोमीटर की दूरी के हिस्से में इसकी उपयोगकर्ता को सही जानकारी देना है। IRNSS-1I इसरो की नाविक प्रणाली का हिस्सा होगा। यह सैटलाइट मैप तैयार करने, समय का बिल्कुल सही पता लगाने, नेविगेशन की पूरी जानकारी, समुद्री नेविगेशन के अलावा सैन्य क्षेत्र में भी सहायता करेगी।
आईआरएनएसएस अमेरिका के ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) की तर्ज पर दिशा सूचक सेवाएं मुहैया करायेगा। इस श्रृंखला में पहले उपग्रह का प्रक्षेपण जुलाई 2013 में किया गया था। भारतीय क्षेत्रीय दिशासूचक उपग्रह प्रणाली (आईआरएनएसएस) के तहत प्रस्तावित सात उपग्रहों के प्रक्षेपण की श्रंखला का यह अंतिम उपग्रह है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसरो को बधाई देते हुए कहा कि भारतीय जीपीएस दुनिया में नाविक के नाम से जाना जाएगा। उन्होंने कहा कि सालों से मछुआरे और नाविक चांद-सितारों की गति से समुद्र में यात्राएं करते थे। यह उपग्रह उनको समर्पित है। कुलमिलाकर इसरो की यह ऐतिहासिक उपलब्धि है जिस पर देश को गर्व है क्योकि खुद अपनी दिशासूचक प्रणाली होना कोई आसान बात नही है .
भारत का आईआरएनएसएस अमेरिका के ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस), रूस के ग्लोनास, यूरोप के गलीलियो जैसा है। इस कामयाबी के साथ ही भारत का अपना न केवल उपग्रहों का जाल तैयार हो जाएगा बल्कि देश के पास अपना जीपीएस शुरू हो जाएगा। अब जीपीएस के लिए भारत को दूसरे देशों पर निर्भर रहना नहीं पड़ेगा। यानी ये कामयाबी बहुत खास है। भारतीय अरमानों को पंख लगाने वाला इसरो का ये कार्यक्रम अंतरिक्ष अनुसंधान के इतिहास में भारत का गौरव बढानें वाला साबित होगा। इस मिशन की कामयाबी के साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों की जमात में शामिल हो गया है जिनके पास नेविगेशन प्रणाली है। इस तरह की तकनीक अभी अमेरिका और रूस के पास ही है । यूरोपीय संघ और चीन भी 2020 तक इसे विकसित कर पायेंगे, लेकिन भारत उससे बहुत पहले यह कामयाबी हासिल कर लेगा । यह अभियान देश के अंतरिक्ष कार्यक्रमों को नई दिशा प्रदान कर रहा है । इससे देश का नेवीगेशन सिस्टम मजबूत होगा जो परिवहनों तथा उनकी सही स्थिति एवं स्थान का पता लगाने में यह सहायक सिद्ध होगा । इस प्रक्षेपण से देश इंडियन रीजनल नेविगेशनल सैटेलाइट सिस्टम आईआरएनएसएस शुरू करने के लिए तैयार हैं क्योंकि भारत ने सात उपग्रहों को उनकी कक्षा में स्थापित कर दिया है।
नेवीगेशन सिस्टम के लिए आत्मनिर्भरता किसी भी देश के लिए काफी मायने रखती है । एक रिपोर्ट के अनुसार देशी नेवीगेशन सिस्टम आम आदमी की जिंदगी को सुधारने के अलावा सैन्य गतिविधियों, आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी उपायों के रूप में यह सिस्टम बेहद उपयोगी होगा । खासकर 1999 में सामने आयी कारगिल जैसी घुसपैठ और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से इसके जरिये समय रहते निपटा जा सकेगा। कारगिल घुसपैठ के समय भारत के पास ऐसा कोई सिस्टम मौजूद नहीं होने के कारण सीमा पार से होने वाले घुसपैठ को समय रहते नहीं जाना जा सका। बाद में यह चुनौती बढ़ने पर भारत ने अमेरिका से जीपीएस सिस्टम से मदद मुहैया कराने का अनुरोध किया गया था। हालांकि तब अमेरिका ने मदद मुहैया कराने से इनकार कर दिया था। उसके बाद से ही जीपीएस की तरह ही देशी नेविगेशन सेटेलाइट नेटवर्क के विकास पर जोर दिया गया। और अब भारत ने खुद इसे विकसित कर बड़ी कामयाबी हासिल की है ।
आईआरएनएसएस प्रणाली दो तरह की सेवाएं मुहैया कराएगा जिसमें एक मानक पोजीशनिंग सेवा जो कि सभी उपयोगकर्ताओ के लिए उपलब्ध होगी तथा सीमित सेवा जो कूट सेवा होगी एवं केवल अधिकृत उपयोगकर्ताओं को ही मुहैया होगी। भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली इंडियन रीजनल नेविगेशनल सैटेलाइट सिस्टम (आईआरएनएसएस) इसरो की एक महत्वाकांक्षी योजना है। इसरो ने आइआरएनएसएस का विकास इस तरह किया है कि न सिर्फ यह अमेरिका के ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम जीपीएस के समकक्ष खड़ा हो सके बल्कि भविष्य में उससे भी बेहतर साबित हो सके ।
आइआरएनएसएस के तहत भारत अपने भौगोलिक प्रदेशों तथा अपने आसपास के कुछ क्षेत्रों तक नेविगेशन की सुविधा रख पाएगा। इसके तहत इसरो के नेविगेशन सैटेलाइट अंतरिक्ष में प्रक्षेपण के बाद 36000 किमी की दूरी पर पृथ्वी की कक्षा का चक्कर लगाएंगे। यह भारत तथा इसके आसपास के 1500 किलोमीटर के दायरे में चक्कर लगाएंगे। जरूरत पड़ने पर उपग्रहों की संख्या बढ़ाकर नेविगेशन क्षेत्र में और विस्तार किया जा सकता है। आइआरएनएसएस दो माइक्रोवेव फ्रीक्वेंसी बैंड एल 5 और एस पर सिग्नल देते हैं। यह स्टैंडर्ड पोजीशनिंग सर्विस तथा रिस्ट्रिक्टेड सर्विस की सुविधा प्रदान करेगा। इसकी स्टैंडर्ड पोजीशनिंग सर्विस सुविधा जहां भारत में किसी भी क्षेत्र में किसी भी आदमी की स्थिति बताएगा, वहीं रिस्ट्रिक्टेड सर्विस सेना तथा महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालयों के लिए सुविधाएं प्रदान करेगा ।
जीपीएस (ग्लोबल पॉजिशनिंग सिस्टम) एक उपग्रह प्रणाली पर काम करता है। जीपीएस सीधे सेटेलाइट से कनेक्ट होता है और उपग्रहों द्वारा भेजे गए संदेशो पर काम करती है। जीपीएस डिवाइस उपग्रह से प्राप्ता सिंगनल द्वारा उस जगह को मैप में दशार्ती रहती है। वर्तमान में जीपीएस तीन प्रमुख क्षेत्रों से मिलकर बना हुआ है, स्पेस सेगमेंट, कंट्रोल सेगमेंट और यूजर सेगमेंट। जीपीएस रिसीवर अपनी स्थिति का आकलन, पृथ्वी से ऊपर रखे गए जीपीएस सेटेलाइट द्वारा भेजे जाने वाले सिग्नलों के आधार पर करता है।
भारतीय आइआरएनएसएस अमेरिकन नेविगेशन सिस्टम जीपीएस से बेहतर साबित हो सकता है। मात्र 7 सैटेलाइट के जरिए यह अभी 20 मीटर के रेंज में नेविगेशन की सुविधा दे सकता है, जबकि उम्मीद की जा रही है कि यह इससे भी बेहतर 15 मीटर रेंज में भी यह सुविधा देगा। जीपीएस की इस कार्यक्षमता के लिए 24 सैटेलाइट काम करते हैं, जबकि आईआरएनएसएस के लिए मात्र सात सैटेलाइट जरूरी है लेकिन यहाँ यह ध्यान रखना जरूरी है कि जीपीएस की रेंज विश्व व्यापी है जबकि आईआरएनएसएस की रेंज भारत और एशिया तक ही सीमित है । सुरक्षा एजेंसियों और सेना के लिए सुरक्षा की दृष्टि से भी आइआरएनएसएस काफी बेहतर है । नेविगेशन सैटेलाईट आईआरएनएसएस के अनुप्रयोगों में नक्शा तैयार करना, जियोडेटिक आंकड़े जुटाना, समय का बिल्कुल सही पता लगाना, चालकों के लिए दृश्य और ध्वनि के जरिये नौवहन की जानकारी, मोबाइल फोनों के साथ एकीकरण, भूभागीय हवाई तथा समुद्री नौवहन तथा यात्रियों तथा लंबी यात्रा करने वालों को भूभागीय नौवहन की जानकारी देना आदि शामिल हैं। आईआरएनएसएस के सात उपग्रहों की यह श्रृंखला स्पेस सेगमेंट और ग्राउंड सेगमेंट दोनों के लिए है। आईआरएनएसएस के तीन उपग्रह भूस्थिर कक्षा जियोस्टेशनरी ऑर्बिट के लिए और चार उपग्रह भूस्थैतिक कक्षा जियोसिन्क्रोनस ऑर्बिट के लिए हैं। अब सातों उपग्रहों के प्रक्षेपण के बाद आईआरएनएसएस प्रणाली ठीक ढंग से काम करना शुरू कर देगी  मंगल यान की कामयाबी के बाद इसरो का लोहा पूरी दुनिया मान चुकी है। चांद पर पानी की खोज का श्रेय भी चंद्रयान 1 को ही मिला था । भविष्य में इसरों उन सभी ताकतों को और भी कडी टक्कर देगा जो साधनों की बहुलता के चलते प्रगति कर रहा है, भारत के पास प्रतिभाओं की बहुलता है। आईआरएनएसएस-1 जी का सफल प्रक्षेपण एक बड़ी कामयाबी है जिससे देश का अपना खुद का नेवीगेशन सिस्टम विकसित हो जाएगा जो पूरे देश के लिए गर्व का विषय है क्योंकि ऐसी प्रणाली विश्व के सिर्फ कुछ ही देशों के पास है ।