"ऑपरेशन मेघदूत" जब भारतीय सेना ने बर्फ में खोदी थी पाकिस्तानियों की कब्र
   दिनांक 17-अप्रैल-2018
33 साल पहले 17 अप्रैल को पाकिस्तान ने सियाचिन ग्लेशियर को कब्जा करने की योजना बनाई थी

 

खुफिया जानकारी मिलने के बाद भारतीय सेना ने किया था पाकिस्तान के इस मंसूबे को नाकामयाब
 
 
पाकिस्तान हमेशा से भारत की पीठ में छुरा घोपते हुए आया है लेकिन हर बार भारतीय सेना से उसे मुंह की खानी पड़ी। 1965 और 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान ने किस कदर मुंह की खाई इसे पूरी दुनिया जानती है, लेकिन कुछ किस्से ऐसे हैं जो शायद सभी लोग नहीं जानते। ऐसा ही एक किस्सा है आॅपरेशन मेघदूत का। जिसमें भारत ने पाकिस्तानी सेना के सियाचिन को कब्जा करने के मंसूबे को नाकामयाब कर दिया था।
 
यह समय था 1984 अप्रैल का। भारतीय इंटलीजेंस को सूचना मिली कि पाकिस्तान अपनी फौज के माध्यम से सियाचिन पर कब्जा करने की योजना बना रहा है। पाकिस्तान ने इसके लिए पूरी योजना तैयार कर रखी है। पाकिस्तानी वायु सेना ने इसके लिए 17 अप्रैल को कब्जा करने का समय तय किया था। सियाचिन दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्रों में पहले नंबर पर है। यहां तापमान —50 डिग्री तक चला जाता है। लगातार बर्फीली हवाएं चलती रहती हैं। परिस्थितियां ऐसी कि सांस ले पाना भी मुश्किल होता है। सियाचिन में भारतीय सीमा के एक तरफ चीन है तो दूसरी तरफ पाकिस्तान। भारत की सुरक्षा के लिहाज से यह जगह बहुत महत्वपूर्ण है। यहां पर स्थित बाना पोस्ट दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र की सबसे ऊंची पोस्ट है जो समुद्रतल से 22,143 फीट की ऊंचाई पर है।
 
पाकिस्तान ने बनाई थी सियाचिन पर कब्जे की योजना
 
पाकिस्तान ने 17 अप्रैल को सियाचिन पर कब्जे की योजना बनाई थी। पाकिस्तानी फौज पूरी तरह तैयार थी लेकिन भारतीय खुफिया एजेंसी को इस बारे में पूरी खबर लग चुकी थी। पाकिस्तान को इस बात का अंदाजा नहीं था कि भारतीय सेना को इस बारे में पूरी जानकारी मिल चुकी है। तत्काल पाकिस्तान के इस मंसूबे को नाकाम करने की रणनीति बनाई गई। इस आॅपरेशन को नाम दिया गया आॅपरेशन 'ऑपरेशन मेघदूत'। आॅपरेशन मेघूदत के तहत वायुसेना ने अपनी योजना तैयार की। सियाचिन में चल रही बर्फीली हवाओं के बीच भारतीय सेना को पाकिस्तानी सेना के वहां पहुंचने से पहले अपनी पोजीशन लेनी थी वह भी इस तरह कि किसी को भनक न पड़े।
 
हैलीकॉप्टर के माध्यम से पहुंचाया गया जवानों को
 
'ऑपरेशन मेघदूत' के तहत भारतीय फौज को इंदिराकोल से लेकर सिआ ला, बिलाफोंड ला, और गियांग ला पर कब्जा कर सियाचिन को अपने कब्जे में लेने का आदेश दिया गया। वायुसेना ने अपने हेलीकॉप्टरों की मदद से जवानों को सियाचिन जैसे ऊंचाई वाले स्थानों पर पहुंचाया। वायु सेना के एमआई-17, एमआई 6 एमआई 8 और चीता हेलीकॉप्टरों ने इस आॅपरेशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऑपरेशन का पहला चरण मार्च 1984 में ग्लेशियर के पूर्वी बेस के लिए पैदल मार्च के साथ शुरू हुआ। कुमाऊं रेजिमेंट की एक बटालियन और लद्दाख स्काउट्स की यूनिट ने हथियारों और जरूरी सामान के साथ जोजिला दर्रे से होते हुए सियाचिन की और बढ़ना शुरू किया। लगभग 6500 मीटर की ऊंचाई पर भारतीय जवानों को जिस दुश्मन का सबसे ज्यादा सामना करना था वह था यहां का जानलेवा मौसम। इस जगह का मौसम हर पल बदलता है और तापमान -30 तक चला जाता है। इस कारण यहां बात करना तो दूर की बात सांस लेना भी मुश्किल होता है। हवा में आॅक्सीजन की कमी के कारण और भी कई तरह की दिक्कतों का सामना लोगों को करना पड़ता है।
 
विदेश से मंगाए गए थे जवानों के लिए उपकरण
 
1984 में जब भारतीय सेना ने इस आॅपरेशन में कामयाबी पाई तब आज की तरफ आधुनिक तकनीक उपकरणों की भी कमी थी। भारतीय वायुसेना के लिए भी इस आॅपरेशन को पूरा कर पाना बेहद मुश्किल था। दरअसल लगातार बर्फ की चादर देखते रहने से 'सपेशियल डिसऑरियंटेशन' होने का खतरा रहता है। इसके चलते यहां तैनात जवानों का रक्तचाप बढ़ जाता है। उनकी मैमोरी भी कम होने लगती है। इसके चलते उपकरणों को लाने के लिए सरकार ने लेफिटनेंट जनरल पीएन हून को विदेश भेजा ताकि सेना के आॅपरेशन में काम आने वाले उपकरणों को जल्द से जल्द लाया जा सके। इसी दौरान पता चला कि जिस कंपनी से भारतीय सेना उपकरण लेने वाली थी उसी कंपनी के पास पाकिस्तानी सेना द्वारा भी उपकरणों की बुकिंग की गई थी। इस ऑपरेशन को शुरू करने से पहले भारतीय सेना और एयरफोर्स के शीर्ष स्तर के अधिकारियों ने सियाचिन में हालात की समीक्षा की। 12 अप्रैल 1984 को आखिरकार जवानों के लिए जरूरी कपड़े और सामान एमआई 17 से भारत आ पहुंचा। उस समय कुमाउं रेजीमेंट के आॅफिसर संजय कुलकर्णी उस पहले दल में थे जो वहां सबसे पहले अपने दल के साथ पहुंचे। यह दल करीब चालीस जवानों का था। बाद में वह सेना से लेफिटनेंट जनरल रिटायर हुए। चीता हेलीकॉप्टर ने यहां पर जवानों को लाने के लिए 17 राउंड लगाए और जवानों को वहां पर उतारा। 13 अप्रैल को सुबह सात बजे यहां पर तिरंगा लहरा दिया गया था। यहां पर 30 जवान आए थे लेकिन इनमें से एक को खराब हालत के चलते वापस बेस भेजना पड़ा था। विषम परिस्थितियों के चलते एक और जवान की मौत हो गई। बेहद खराब मौसम के बाद भी जवान यहां कैंप बनाने में कामयाब हो गए।
 
बिना दुश्मन को आहट दिए दिया आॅपरेशन का अंजाम
 
जब वहां जवान तीन कैंप बनाने में कामयाब हो गए तो भारतीय वायुसेना के चीता और एमआई—8 हेलीकॉप्टरों ने लद्दाख स्काउट के जवानों की एक यूनिट को सिया ला से करीब पांच किलोमीटर दूर उतारा। 17 अप्रैल को मेजर एएन बहुगुणा के नेतृत्व में जवानों ने पांच किलोमीटर का रास्ता पैदल पार कर सिया ला पर तिरंगा फहरा दिया। इस बीच लेफ्टिनेंट कर्नल डीके खन्ना और उनके जवान गियांग ला की तरफ बढ़ रहे थे, लेकिन यहां पर आसानी से दुश्मन की निगाह में आने का खतरा मंडरा रहा था। सेना ने यहां पर 23 अप्रैल तक जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइलों की तैनाती कर दी थी। सियाचिन ग्लेशियर पर भी हथियारों की आपूर्ति कर दी गई थी। इसके अलावा लेह एयर फील्ड की सुरक्षा के लिए भी जरूरी मशीनगन और मिसाइलें तैनात कर दी गई थीं। ऐसा ही थोएय एयरफील्ड पर भी किया गया था।
 
जब पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी
 
भारतीय खुफिया एजेंसियों को मिली जानकारी के अनुसार पाकिस्तान ने इस आॅपरेशन को 'ऑपरेशन अबाबील' नाम दिया था। इसके लिए बाकायदा बरजिल फोर्स बनाई थी। इस ऑपरेशन का मकसद सिया ला और बिलाफोंड ला पर कब्जा करना था। पाकिस्तान की तरफ से पहला हमला 23 जून को सुबह पांच बजे किया गया। भारतीय जवान तैयार थे पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया गया। भारतीय सेना ने पाकिस्तान के 28 जवानों को मार गिराया। पाकिस्तान फिर भी बाज नहीं आया उसने जून में फिर हमला किया लेकिन फिर मुंह की खानी पड़ी। इसके बाद पाकिस्तान ने एक बार फिर अगस्त में हमला कर कब्जा करने का प्रयास किया लेकिन भारतीय सेना ने उसके मंसूबों को कामयाब नहीं होने दिया। बाद के इन दोनों हमलों में पाकिस्तान को अपने 40 और जवानों को खोना पड़ा। 1987 में और फिर 1989 में भी पाकिस्तान ने यहां पर हमला किया लेकिन उसे मुंह की खानी पड़ी।