क्या तीसरे विश्वयुद्ध की तरफ बढ़ रही है दुनिया

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सीरिया पर अमेरिकी हमले से स्थिति बिगड़ती जा रही है। कई विशेषज्ञ इसे तृतीय विश्वयुद्ध का आगाज मान रहे हैं। पिछले दिनों लंदन जासूसी कांड और जहर देने के

 

 

 

 

मसले पर रूस और पश्चिमी देशों के बीच कूटनीतिक गहमा-गहमी अभी चल ही रही थी कि इसी दौरान सीरिया की चुनिंदा जगहों पर अमेरिका द्वारा भारी बमबारी कर दी गई। इस मुहिम को अंजाम देने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिटेन और फ्रांस का भी साथ लिया। रासायनिक हथियारों के भंड़ारों को नष्ट करने के लिए 105 मिसाइल दागी गईगईं। हमले के बाद ट्रंप ने कहा कि तीन देशों ने बर्बरता और क्रूरता के खिलाफ कदम उठाया है। ट्रंप ने ट्ववीट किया मिशन पूरा हुआ। हमला अचानक किया गया। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की संयुक्त सेनाओं ने सीरिया के रासायनिक हथियार के महत्त्वपूर्ण स्थलों पर इतनी तीव्र गति से हमला किया कि वह संभल भी नहीं पाया। तीनों देशों की सेनाओं ने अपने-अपने अचूक और अत्याधुनिक हथियारों से हमले किए। फ्रांस और ब्रिटेन ने भी अपने लड़ाकू विमानों का प्रयोग किया। ब्रिटेन ने चार विध्वंसक टोरनाडों फाइटर्स से सीरिया पर क्रूज मिसाइलें दागी। फ्रांस नौसेना ने अपने कम से कम तीन अत्याधुनिक फ्रिगेटस से क्रूज मिसाइले दागी। राफेल लड़ाकू विमानों से सीरिया पर हमले की बात खुद फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रो ने स्वीकार की। राष्ट्रपति मैक्रों ने ट् वीटर पर फ्रांस के एयर बेस से राफेल के उड़ान भरने का वीडियो शेयर किया।

 

सीरिया ने बताया संप्रभुता पर हमला

 

सीरिया ने इस आक्रमण का कड़े शब्दों में विरोध किया है। सीरिया ने कहा कि यह संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। रूस, चीन और ईरान ने हमले की कठोर शब्दों में निंदा की है। रूस ने तो धमकी भी दी है कि इसके परिणाम घातक होंगे।

 

कहीं विश्वयुद्ध की आहट तो नहीं ?

 

प्रश्न यह उठता है कि क्या सीरिया का गृह युद्ध विश्वयुद्ध का रूप ले सकता है? क्या विश्व के देशों के बीच दरारें बढ़ रही हैं। सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असाद को हटाने के लिए अमेरिका कई बार प्रयास कर चुका है। रूस और ईरान अशद के समर्थन में खड़े हैं। चीन अंतर्राष्ट्रीय समीकरण को देखते हुए रूस के पक्ष में है। तुर्की और सऊदी अमेरिका के साथ खड़े है। सात वर्षों के युद्ध में पाँच लाख से ज्यादा जोग मारे जा चुके है।

 

दरअसल लड़ाई इस्लामिक स्टेट अर्थात् आईएस को खत्म करने को लेकर शुरू की गई थी, जिसमें रूस और अमेरिका एक साथ एक ही मंच पर खड़े हैं। मकसद भी एक था। इस्लामिक स्टेट के दीवार को ध्वस्त करने की। स्वार्थ और अहम् में बात बनने की जगह बिगड़ने लगी। रूस के राष्ट्रपति पुतिन इस बात पर अडिग थे कि सीरिया में एक मजबूत नेतृत्व ही विद्रोही गिरोह को कब्जे में ला सकते है। दूसरी तरफ अमेरिका और कुछ पश्चिमी देश अशद को हटाना ही उनकी प्राथमिकता बन गई। अमेरिका का मानना था कि जब तक बशर अल अशद ... को हटाया नहीं जाता जब तक समस्या का हल नहीं ढूंढ़ा जा सकता। बात वहीं से बिगड़ने लगी। रूस ने 2015 में बशर अल अशद को सैनिक सहायता भी मुहैया करवा दिया। अब दुश्मनी रूस और अमेरिका के बीच ठन गई है।

 

ट्रंप और ओबामा दोनों की नीतियां अलग अलग

 

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की नीति ओबामा से अलग है। ट्रंप मध्यपूर्व में अमेरिकी वर्चस्व जो शीतयुद्ध के दौरान था, उसे बहाल करना चाहते है। ओबामा बातचीत के द्वारा रासायनिक हथियारों के प्रतिबंद्ध का सख्ती से पालन करने के हिमायतर थे। जबकि ट्रंप ने शक्ति प्रदर्शन की बात कही थी। वहीं दूसरी तरफ रूस के नेता पुतिन रूस की खोई हुई अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को पुर्नस्थापित करने की निरंतर कोशिश में लगे हुए है। शीतयुद्ध की ... से लेकर नाटो (सैनिक संगठन) के विस्तार तक, हर कदम पर रूस को जलील और कमजोर करने की कोशिश अमेरिका और पश्चिमी देशों के द्वारा की जाती रही है। पुतिन ने इसे चुनौती के रूप में लिया। निरंतर पुतिन रूस के सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में उभरे। पिछले महीने पुनः राष्ट्रपति बनने के बाद यह बात पूरी दुनिया देख चुकी है।

 

अमेरिका और रूस में दोनों में कितना दम

 

क्या रूस अमेरिका के साथ दो-दो हाथ करने के लिए सक्षम है? क्या वर्तमान रूस पूर्व सोवियत संघ की तरह सक्षम और शक्तिशाली है? रूस की श्रेणी में कितने देश खड़े हो सकते है? इन तमाम प्रश्नों का हल ढूंढ़ना जरूरी है।

बाहरी शक्तियों की सोच

 

अमेरिका की महत्त्वपूर्ण चुनौती रूस और ईरान को लेकर है। तुर्की की वजह से भी अमेरिका चिंतित है। कुर्द तुर्की की तरफ से सक्रिय है। अमेरिका जनेवा सम्मेलन में तय किए गए फार्मूले पर इस समस्या का हल ढूंढ़ना चाहता है। अमेरिकी सेना सीरिया में तैनात है। सीरिया तुर्की सीमा पर जो क्षेत्र विद्रोहियों से खाली करवाया गया, जिसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका अमेरिकी सेना की रही है, उसे वह अशद के हिस्से में नहीं जाने देना चाहता। अमेरिका इस जिद पर अडिग है कि पश्चिमी देशों के द्वारा जो रणनीति बनाई गई थी, जिसकी शुरूआत अशद को हटाने से ही शुरू होगी, आज भी वहीं है। दूसरी तरफ रूस की वायुसेना सीरिया के उत्तर-पश्चिमी ठिकानों पर जमी हुई है। पुतिन की रणनीति इरान, सीरिया और तुर्की के साथ मिलकर विद्रोही गिरोह के क्षेत्रों को अपने में मिलाने की है। पिछले दो वर्षों में अशद ने रूस की मदद से कई क्षेत्रों पर अपना अधिकार जमा लिया है। तुर्की उस हर समीकरण के पक्ष में है जहाँ से एक अलग कुर्द राष्ट्र की मांग को दबाया जा सके। क्योंकिस कुर्द राष्ट्र की मांग अगर जोर पकड़ेगी तो सबसे अधिक नुकसान तुर्की को होगा।

 

शीतयुद्ध के दौरान पूर्व सोवियत संघ और अमेरिका मुख्यतः अप्रत्यक्ष युद्ध लड़ रहे थे। अप्रत्यक्ष भिड़ंत में कई बार ऐसा लगा और दिखा भी कि अब दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर है लेकिन परिस्थितियों को संभाल लिया गया। सीरिया युद्ध कई मायनों में शीतयुद्ध से अलग है। इसमें भिडंत प्रत्यक्ष है। दोनो देशों की वायु सेना एक ही जगह पर है। यह अलग बात है कि अमेरिका रूस को अत्यंत ही कमजोर और छोटा समझता है। पूर्व सोवियत संघ वाला दमखम रूस से पास नहीं है लेकिन कहानी यहीं से शुरू होती है, खत्म नहीं। अमेरिका का मुख्य प्रतिद्वंद्वी चीन है। चीन प्रत्यक्ष रूप से सीरिया युद्ध में सम्मिलित नहीं है लेकिन अमेरिकी आक्रमण की निंदा चीन ने भी की है। जहां भी रूस-अमेरिका आपस में भिड़ेंगे, चीन रूस के पक्ष में होगा। अगर सीरिया को लेकर बात बिगड़ती है तो तृतीय विश्वयुद्ध को नकारा नहीं जा सकता।

 

(लेखक हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष हैं)