वामपंथियों को नहीं सुहाते थे डॉ. आंबेडकर
   दिनांक 19-अप्रैल-2018

डॉ. आंबेडकर के राष्ट्रवादी विचारों के कारण वामपंथी उनके विरोध में रहते थे। वामपंथियों के विरोध की वजह से बाबासाहेब पहला आम चुनाव हार गए थे भारतरत्न डॉ. बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर भारतीय कम्युनिस्टों से बिल्कुल अलग विचार रखते थे। उनका मानना था कि देश पर आई किसी आपत्ति को टालने के लिए बहुत ही जरूरी हो तो कम्युनिस्टों का साथ लिया जा सकता है, अन्यथा नहीं। डॉ. आंबेडकर ने अगस्त, 1936 में 'इंडीपेंडेंट लेबर पार्टी' की स्थापना की। इसका लक्ष्य भूमिहीनों, गरीब किसानों और मजदूरों के हितों की रक्षा करना था। उन दिनों उनकी पार्टी के प्रयासों के कारण ही कारखानों के कामगारों के कल्याण के लिए अनेक बेहतर कानून बने। उनके इन्हीं कार्यों के कारण ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 1942 में गवर्नर जनरल की काउंसिल में श्रममंत्री नियुक्त किया था। उस दौरान उन्होंने 'लेबर एक्ट' बनाया। 17 सितंबर, 1937 को पहले कृषि सुधार विधेयक के जरिए उन्होंने 'खोटी' प्रणाली को समाप्त करवाया। यह प्रणाली समाज के एक बड़े तबके को शोषण की ओर धकेल रही थी। 
स्वतंत्रता के बाद हुए पहले आम चुनाव में डॉ. आंबेडकर को हराने के लिए कम्युनिस्टों ने एड़ी-चोटी एक कर दी थी। फरवरी, 1953 में भारत-जापान सांस्कृतिक संघ के उपाध्यक्ष एम. आर. मूर्ति के सम्मान में आयोजित समारोह में डॉ. आंबेडकर ने कहा था, ''आने वाली पीढि़यों को किसी एक के रास्ते पर चलना होगा। चाहे वे बुद्ध के धम्म मार्ग पर चलें या फिर साम्यवाद के मार्ग पर। धम्म मार्ग ने लोकतंत्र एवं समाजवादी रचना को आगे बढ़ाया, जबकि साम्यवाद राजनीतिक उद्देश्यों के लिए मजदूरों का इस्तेमाल कर रहा है।''बाबासाहेब कहते थे, ''धर्म में भगवान की भक्ति होना बहुत ही जरूरी है जिससे भगवान को प्राप्त किया जा सके।'' मगर उन्होंने इसे राजनीति से अलिप्त रखने रखने की बात भी कही थी। 
डॉ. आंबेडकर हमेशा सामाजिक लोकतंत्र स्थापित करने का मुद्दा उठाया करते थे। उन्होंने असमानता, छुआछूत, भेदभाव, सामाजिक कुरीतियों और जातीय भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाई। वहीं दूसरी तरफ साम्यवादियों ने कभी भी सामाजिक लोकतंत्र के मुद्दों को नहीं उठाया। वे केवल वर्गों की बात करते रहे। जातीय भेदभाव, छुआछूत, महिला-पुरुष असमानता आदि मुद्दों पर न तो कोई आंदोलन किया और न ही उन मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाया।डॉ. आंबेडकर हमेशा से ही लोकतंत्र, नैतिक मूल्यों और शोषण के विरुद्ध शांतिपूर्ण आंदोलन में विश्वास करते थे। मगर उनका यह भी कहना था कि संविधान में इतने सारे उपाय निर्देशित, निहित हैं कि लोगों को अपने अधिकारों के लिए कभी आंदोलन की भी जरूरत न पड़े। अगर पड़ती है तो लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि सरकारें अपने संवैधानिक सिद्धांतों को लेकर विफल हो रही हैं। दूसरी तरफ साम्यवादी खेमे का मानना है कि खूनी क्रांति के जरिए ही समाज या सत्ता में परिवर्तन लाया जा सकता है। शिक्षा पर इनका आधिपत्य होने के कारण इन्होंने कभी भी आंबेडकर के विचारों को शैक्षणिक संस्थानों में नहीं बढ़ने दिया। इस कारण एक बहुत बड़ा वर्ग इनके विचारों से वंचित रह गया है।
डॉ. आंबेडकर राष्ट्रवादी विचार से प्रेरित थे। वे देश की एकता, अखंडता एवं विकास को प्राथमिकता देते थे, वहीं दूसरी ओर साम्यवादी विचारधारा को राष्ट्रवाद से ही चिढ़ है। बाबासाहेब को इन लोगों की हकीकत तब पता चली जब जनवरी, 1928 में मिल मजदूरों के हक की बात करते समय कम्युनिस्टों ने दलित मजदूरों के हित की बात नहीं की।
देवराज सिंह