इस नफरत की काट जरूरी
   दिनांक 21-अप्रैल-2018
हृदय से घृणा का भाव निकल जाना चाहिए। सब भगवत्स्वरूप हैं ऐसा अगर साक्षात्कार हुआ, तो हृदय में घृणा का भाव नहीं रहता। —माधव स. गोलवलकर (श्रीगुरुजी समग्र दर्शन,खण्ड 6, पृ. 23)
बाबासाहेब के जीवन और विचारों को केंद्र में रखता पाञ्चजन्य का यह अंक सामान्य होकर भी विशेष है। जब यह अंक पाठकों के हाथ में आएगा तब देश में बाबासाहेब की जयंती से जुड़े आयोजनों की रंग-चमक होगी। यह उत्साही चमक ठीक है किन्तु खतरे की बात यह है कि आज बाबासाहेब के नाम को आगे रखकर कुछ स्वार्थी राजनैतिक गुट और उनके गुर्गे नफरत के अलाव सुलगाए बैठे हैं। अप्रैल के पहले दो हफ्तों में आठ दिन के अंतराल पर जब दो बार 'देश' में आग लगाने की कोशिश की जा चुकी हो तब बाबासाहेब को जानना और उनके दृष्टिकोण से परिस्थितियों को समझना ज्यादा जरूरी हो जाता है। यह अंक इसी जरूरत को पूरा करने की दिशा में एक कदम है। यह कदम जरूरी हो जाता है क्योंकि :
— भठूरों की डकार के साथ उपवास का उपहास उड़ाते नेता,
— सवार्ेच्च न्यायालय के फैसले को पढ़ने से पहले ही मीन-मेख निकालने को तैयार 'भारत तोड़ो ब्रिगेड,' और
— अनुसूचित जाति-जनजाति के बीच अफवाहें फैलाते बूढ़ी पार्टी के युवराज... अपनी-अपनी उधेड़बुन में ये सब एक खतरनाक जाल बुन रहे हैं
क्यां? क्योंकि उनके लिए यह अस्तित्व का प्रश्न है।
— मुस्लिम तुष्टीकरण में डूबने के बाद उन्माद को पोसने की हद तक बढ़ी सेकुलर राजनीति'सबका साथ, सबका विकास' के सामने हलकान है।
— अनुसूचित जातियों का नाम लेकर अपना घर भरने वाले नेता-नेत्रियों का तेज 'अंत्योदय और उज्ज्वला' के सूर्य के सामने जुगनू साबित हो रहा है।
— हर तरकीब आजमाकर भी बुजुर्ग पार्टी के अधेड़ युवराज राजनीति के हाशिए पर ही पड़े हैं क्योंकि कुनबा राजनीति की विफलता और अकथ घोटालों की लंबी फेहरिस्त पहले से उनके नाम लोकतंत्र की बही में दर्ज है।
ऐसे में सामाजिक सौहार्द के शिकारियों ने'बाबासाहेब' के नाम को औजार बनाने की ठानी है। समाज हित में इस चाल को समझना जरूरी है। यह समझ बाबासाहेब की कसौटियों पर,उनके नजरिए से परिस्थितियों की परख करते हुए ही हो सकती है। सो, कुछ सवाल बनते हैं :
— देश को पीछे रखने और अपने हित की बात पहले सोचने वाली राजनीति के बारे में बाबासाहेब क्या सोचते थे?
— आज 'भीम' की डफली बजाते कॉमरेडों का छल तब बाबासाहेब ने किस तरह पकड़ा था!
— आज बाबासाहेब का नाम भुनाने को बेचैन कांग्रेस का तब कांग्रेसी होने के बावजूद बाबासाहेब के साथ व्यवहार कैसा था? इन सब सवालों के जवाब उस विराट जीवन में बिना झांके, उनके वैचारिक आधार को बिना समझे तलाशना असंभव है। पाञ्चजन्य का प्रयास है कि बाबासाहेब के जीवन और इस जीवन की सकारात्मक ऊर्जा को वर्तमान परिस्थितियों में संदभार्ें के साथ अपने पाठकों के बीच पहुंचाया जाए।
एक और बात, पाञ्चजन्य की वेबसाइट का नए कलेवर में लोकार्पण बाबासाहेब की जयंती के दिन ही तय हुआ है। सत्य और समानता के सेनापति को आधुनिक सूचना-संचार माध्यम से हमारी यह छोटी-सी श्रद्धाञ्जलि है। ऐसे दौर में जहां सब गति के पीछे भाग रहे हैं और लगातार खबरों की बौछार लोगों को परेशान करने की हद तक बढ़ चुकी है, साप्ताहिक पत्रिका के अतिरिक्त देश-दुनिया के समाचार प्रतिदिन उसी सटीकता के साथ उपलब्ध कराना हमारी प्रतिबद्धता है और बड़ी चुनौती भी, किन्तु आशा है, पाञ्चजन्य पाठकों के विशाल परिवार का व्याप और स्नेह अब और तेजी से बढ़ेगा। तकनीक, रचनात्मकता और सकारात्मकता के सेतु हमारी साख को और बढ़ाने वाले साबित होंगे। साप्ताहिक पत्रिका और नए स्वरूप में वेबसाइट भी; आपको यह प्रयास कैसा लगा,अवश्य बताइएगा।