श्रीराम जन्मभूमि से हिंदुओं की भावना जुड़ी है
   दिनांक 23-अप्रैल-2018
गत 14 अप्रैल को विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष पद के चुनाव के बाद हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल (2003 से 2008) और परिषद के निवर्तमान अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री विष्णु सदाशिव कोकजे परिषद के नए अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं।

मूलत: इंदौर (मध्य प्रदेश) के निवासी श्री कोकजे ने 1964 में वकालत शुरू की थी। जुलाई 1990 में उन्हें मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में न्यायाधीश बनाया गया था। 2001 में वे राजस्थान उच्च न्यायालय के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश के पद पर रहे। 2002 में उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता बनाया गया। रा. स्व. संघ के स्वयंसेवक श्री कोकजे भारत विकास परिषद के अध्यक्ष रहे हैं। हिंदू मूल्यों के प्रति मुखर रहने वाले श्री कोकजे ने नया दायित्व संभालने के बाद पाञ्चजन्य के सहयोगी संपादक आलोक गोस्वामी के साथ एक बातचीत में कहा कि परिषद की कार्यसूची में श्री राम जन्मभूमि मंदिर, गोरक्षा, समान नागरिक संहिता सहित हिन्दू हितों से जुड़े तमाम मुद्दे शामिल हैं। उन्होंने कहा कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर ही बनेगा, जिसके लिए न्यायालय से शीघ्र ही सकारात्मक निर्णय आने की संभावना है। श्री कोकजे ने कहा कि हिंदू समाज के मुद्दों पर गलत दृष्टिकोण रखने वाले ‘बुद्धिजीवियों’ को चीजों को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। उनके अनुसार परिषद को संत शक्ति का मार्गदर्शन सदा मिलता रहा है और आगे भी मिलता रहेगा। प्रस्तुत हैं उनसे हुई विस्तृत वार्ता के प्रमुख अंश:


संगठन में आपको जो नया दायित्व प्राप्त हुआ है, उस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
पहली प्रतिक्रिया तो यह है कि खेद हुआ कि हमारी वर्षों की परंपरा इस बार टूट गई। अध्यक्ष का चुनाव निर्विरोध होता रहा है, पर इस बार चुनाव हुआ। इसका दुख तो है लेकिन साथ ही यह भी सही है कुछ व्यक्तियों का बहुत लंबे समय तक एक ही पद पर बने रहना ठीक नहीं है। यही परंपरा रही है हमारी। इसी कारण बदलाव हुआ है। इसके साथ ही, मैंने बार-बार यही कहा है कि हमारा कार्यक्रम नहीं बदला है, एजेंडा नहीं बदला है, केवल पदाधिकारी बदले हैं। तो उस दृष्टि से कोई बदलाव नहीं है क्योंकि संगठन के सामने व्यक्ति का ज्यादा महत्व नहीं होता।
मोटे तौर पर माना जाता है कि विश्व हिंदू परिषद यानी हिंदू हित के लिए कार्य करने वाला एक विश्वव्यापी संगठन। विश्व में कहीं के भी हिंदुओं के हित की चिंता करने वाला संगठन। इसे जरा विस्तार से समझाएं। परिषद के गठन के पीछे मूल उद्देश्य क्या था?
देखिए, एक तो तात्कालिक एजेंडा होता है और फिर उद्देश्य होते हैं। तात्कालिक एजेंडे में वर्तमान में सबसे अहम विषय है श्री राम जन्मभूमि पर राम मंदिर का निर्माण। यह हिंदुओं का मानबिंदु है। उसके लिए हरसंभव प्रयत्न करना हमारी पहली प्राथमिकता है। फिर सामाजिक समरसता का विषय है कि समाज में व्याप्त असमानता को दूर करना। सामाजिक कुरीतियों को दूर करना। गोहत्या को रोकना। गोवंश को बढ़ावा देना। ये सब मुद्दे हमेशा से रहे हैं। हमारा उद्देश्य भी यही है, इन विषयों पर काम करना। यही उद्देश्य पहले भी था।
पिछले दिनों श्री राम जन्मभूमि प्रकरण दोबारा से उभरा है। उस पर परिषद की क्या सोच है?
परिषद की सोच यही है कि श्री राम के जन्मस्थान पर शीघ्र मंदिर बनना चाहिए, भव्य मंदिर बनना चाहिए। मंदिर के अलावा वहां कुछ नहीं बनना चाहिए। पर उसमें दिक्कत यह है कि जिस जगह पर मंदिर बनाना है वह विवादित है। न्यायालय में उसका विवाद चल रहा है। इसके न्यायालय में लंबित होने के बावजूद जो कुछ हम कर सकते हैं, जितनी हमारी सीमा है वह करेंगे। हम पूरा जोर लगाकर न्यायालय से अपने पक्ष में निर्णय करवाएं और अगर वैसा नहीं होता है तो हम शासन पर दवाब डालकर उससे इस संबंध में कानून बनवाएं। यह अलग बात है कि उस कानून को भी न्यायालय में चुनौती दी जाएगी। हमें पुन: न्यायालय में बलपूर्वक इस विषय को रखना होगा। लेकिन इसके अलावा हमारे पास कोई उपाय नहीं है।
न्यायालय ने कहा है कि बातचीत के जरिए इस मामले को निपटा लें। इस दृष्टि से क्या प्रयास हो रहे हैं?
हम लोग तो इसके लिए शुरू से तैयार हैं। हमारी शर्तें यही हैं कि वहां मुसलमानों को इस बात के लिए राजी होना पड़ेगा कि वहां जबरदस्ती मंदिर तोड़कर ‘मस्जिद’ बनाई गई थी। ‘मस्जिद’ कहीं और बनाने के लिए समाज तैयार है। लेकिन उस जगह पर राम का मंदिर ही बनना चाहिए।
इस संबंध में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को कैसे देखते हैं जिसमें मंदिर के साक्ष्यों को सही ठहराया गया है?
मूल बात यह है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी निर्णय में (विवादित स्थल के) अलग-अलग तीन हिस्से कर दिये। इसके बारे में सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की गई है। मोटे तौर पर पुरातत्व विभाग को उस जगह के नीचे सर्वे में मंदिर के साक्ष्य मिले हैं। ये सब बातें वहां चर्चा में आएंगी। अभी तक हमारे पास सकारात्मक संदेश है, क्योंकि न्यायालय इस विषय में जल्दी फैसला करने के पक्ष में है। न्यायालय में हस्तक्षेप की जितनी याचिकाएं थीं, सबको रद्द कर दिया गया है। ऐसे में विवाद सिर्फ पक्षों के बीच रह जाएगा, इससे कम समय लगेगा।
श्रीश्री रविशंकर जो बाहर से प्रयास कर रहे हैं, अलग-अलग लोगों से बात कर रहे हैं, उस संबंध में आपका क्या कहना है?
यह समझौते का प्रयास है। ऐसा प्रयास कोई भी कर सकता है और करना भी चाहिए। अगर इसका कोई परिणाम निकलेगा तो अच्छा ही होगा। लेकिन वह संपूर्ण हिंदू समाज की ओर से कोई वायदा नहीं कर सकते। अंतत: समझौता होना है न्यायालय में मौजूद पक्षों के बीच। तो वहां समझौते की बात होगी। ऐसे में रविशंकर जी पक्ष वालों से बात कर रहे हैं या नहीं, यह कहा नहीं जा सकता।
आपने जो दूसरा बिंदु बताया गोवंश रक्षण का, तो आज भी इस तरह के समाचार हैं कि सीमा क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर गोवंश की तस्करी हो रही है। जबकि ऐसे भी समाचार मिलते हैं कि कुछ लोग गोवंश संरक्षण के नाम पर कानून हाथ में ले लेते हैं। परिषद इस कैसे देखती है?
देखिए, परिषद का तो यह कहना है कि गोवंश की रक्षा करना, गोहत्या बंद करना, यह हमारा संवैधानिक कर्तव्य है क्योंकि हमारे नीति-निर्धारक सिद्धांतों में इन बातों को रखा गया है। यह केवल विश्व हिन्दू परिषद की मांग नहीं है, यह तो संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में है। हम तो केवल यह कह रहे हैं कि नीति-निर्देशक सिद्धांतों का पालन होना चाहिए। और जो लोग कहते हैं कि ऐसा नहीं होना चाहिए, वे संविधान की भावना के विरुद्ध बोलते हैं। संविधान में गो संवर्धन है। शराबबंदी है। समान नागरिक संहिता है। जब हम इन विषयों को उठाते हैं तो लोग कहते हैं, ‘आप देश तोड़ने की बात कर रहे हो’। अरे, संविधान निर्माताओं ने ये विषय रखे हैं! नीति-निर्देशक सिद्धांतों को लेकर आग्रह करने में क्या दिक्कत है? इसमें कुछ भी गलत नहीं है। समाज को आग्रह करना चाहिए कि नीति-निर्देशक सिद्धांतों का पालन किया जाए।
वृहत् हिंदू समाज के हित की बात करना परिषद के उद्देश्यों में शामिल है। लेकिन आज ऐसा माहौल बनाया गया है, जिसमें कोई हिंदू हित की बात करता है तो उसे सांप्रदायिक ठहराया जाता है। इस माहौल पर क्या कहेंगे?
ऐसे माहौल के पीछे कारण यह है कि हिंदुओं का जो तथाकथित ‘बुद्धिजीवी’ वर्ग है वह भ्रमपूर्ण स्थिति में है। वह अत्यधिक उदार दिखना चाहता है। इस कारण वह मुस्लिम तुष्टीकरण तक पर आ गया है। वह न्याय पर नहीं आता। ऐसे में अधिक से अधिक ‘बुद्धिजीवियों’ से संपर्क करके उनको इस आंदोलन से जोड़ना पड़ेगा। 90 प्रतिशत हिंदुओं की भावना श्री रामजन्मभूमि से जुड़ी है। गोहत्या के विरोध में है। वे सामाजिक समरसता चाहते हैं। वे सारे उद्देश्यों के साथ चलते हैं। लेकिन जो लोग मुखर हैं, ‘बुद्धिजीवी’ कहलाते हैं उन्हें हिंदू होकर भी अपने समाज के खिलाफ बोलने में गर्व महसूस होता है। ऐसा वर्ग हिंदू समाज के अलावा कहीं और नहीं है।
आपने कहा कि ऐसे ‘बुद्धिजीवियों’ का भ्रम दूर करना पड़ेगा। क्या आप परिषद में इस तरह का कोई कार्यक्रम लेने वाले हैं?
हां, हम हर स्थान पर जाकर वहां के जो पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी, प्रभावशाली लोग हैं, उनके साथ बैठ कर बात करेंगे। उनसे आह्वान करेंगे कि वे समाज के साथ जुड़ें और हिन्दू समाज की ओर से वामपंथियों को या धर्म विरोधियों को जो तार्किक उत्तर देने चाहिए वे दें। ऐसा हो भी रहा है। सोशल मीडिया में देखिए, वहां लोग आगे आकर जवाब दे भी रहे हैं। वे सब कोई विश्व हिंदू परिषद से जुड़े लोग नहीं होते, संघ परिवार के लोग नहीं होते। अब तो सामान्य लोग भी गलत बातों का विरोध करते हैं। हम अभियान चलाएंगे कि ऐसे लोग संगठन के साथ जुडें।
इसी संदर्भ में कठुआ का मामला देखें तो उसमें भी सेकुलर वामपंथी जमात हिंदू समाज पर दोष मढ़ती दिखाई देती है। इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई है। इस पर आप क्या कहेंगे?
ये सेकुलर जनता को मूर्ख समझते हैं। यह प्रकरण धर्म से किसी तरह नहीं जुड़ता है, इस बात को समाज समझ रहा है। यह अमानवीय कृत्य है जिसका कोई समर्थन नहीं करेगा। दिक्कत यह है कि अगर कोई सिर्फ यह कहता है कि किसी निर्दोष को न फंसाया जाए तो इसको भी ‘बलात्कारी का समर्थन’ कहकर उछाला जाता है। वास्तव में यह नहीं देखा जाता है कि वह विरोध इसलिए कर रहा है कि कानूनों के बहाने किसी निर्दोष को न फंसाया जाए। वह यह बिल्कुल नहीं कह रहा है कि जो किया, वह सही किया। तो यह फर्क हमें लोगों के ध्यान में लाना पड़ेगा कि यह कहना बिल्कुल सही बात है कि किसी निर्दोष व्यक्ति को न फंसाया जाए। यह कोई नहीं कह रहा है कि कानून को हल्का कर दो या हटा दो। लोग यह कह रहे हैं कि निर्दोषों को मत फंसाओ। यही बात कठुआ प्रकरण में है और यही पिछले दिनों अनुसूचित जाति-जनजाति वाले मामले में थी।
सोशल मीडिया में जिस तरह का नकारात्मक माहौल बनाया जा रहा है, उसमें ज्यादातर तो हिंदू समाज के लोग ही शामिल हैं।
वे लोग पूरी बात समझते नहीं हैं, उनमें संस्कारों की कमी वगैरह बहुत तरह की बातें हैं। कोई गाय की बात करे तो उसे दकियानूसी विचारधारा वाला बता दिया जाता है। लेकिन उसकी उपयोगिता, उसके आर्थिक पक्ष, पर्यावरण पर पड़ने वाला प्रभाव आदि पर कोई ध्यान नहीं देता। किसी चीज के विषय में पढ़ना कुछ नहीं है, बस वह हिंदुओं से जुड़ी है तो गलत कहकर प्रचारित कर दी जाती है। इस मानसिकता को बदलने के लिए समाज सही दिशा दिखानी होगी और हम यही काम करेंगे।
परिषद को हमेशा संत शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता रहा है। यह समन्वय हमेशा बना रहे इसके लिए परिषद क्या प्रयास करने वाली है?
अभी सबसे पहले तो हम अयोध्या में रामलला के दर्शन करेंगे। उसके बाद संतों के बीच में जाएंगे। हरिद्वार और अन्य स्थानों पर अलग-अलग संतों से भेंट करेंगे। उनसे मार्गदर्शन लेंगे। संतों के साथ बैठकर विचार करेंगे। हिंदू समाज के लिए संतों का अत्यधिक महत्व है, वे मार्ग दिखाते हैं कि क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए। उनसे चर्चा करके आगे के कार्यक्रम बनाएंगे। मैं व्यक्तिगत जीवन में भी उनका मार्गदर्शन लेता रहा हूं। अनेक संतों से मिलता रहता हूं। उनसे एक ऊर्जा मिलती है। बल मिलता है।