बढ़ रहा है हिंदुत्व के प्रति आग्रह
   दिनांक 24-अप्रैल-2018

पिछले सप्ताह श्री आलोक कुमार को विश्व हिंदू परिषद् के अंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। वे सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने वकील हैं। इन दिनों वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, दिल्ली प्रांत के सह प्रांत संघचालक और पाञ्चजन्य एवं आॅर्गनाइजर को प्रकाशित करने वाले संस्थान ‘भारत प्रकाशन (दिल्ली) लि.’ के प्रबंध निदेशक भी हैं। वे ‘एकात्म मानवदर्शन’ के मर्मज्ञ हैं और कई स्थानों पर ‘दीनदयाल कथा’ कर चुके हैं। उन्होंने काफी दिनों तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् का कार्य किया है। वे दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रहे चुके हैं। कुछ वर्ष तक वे संघ के प्रचारक भी रहे हैं। आलोक जी दिल्ली विधानसभा के उपाध्यक्ष और भाजपा में अखिल भारतीय प्रशिक्षण प्रमुख भी रहे हैं। अपनी मृदुभाषिता के लिए कार्यकर्ताओं के बीच पहचाने जाने वाले श्री आलोक कुमार से पाञ्चजन्य संवाददाता अरुण कुमार सिंह ने बातचीत की, जिसके प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं:

संगठन ने आपको जो नया दायित्व दिया है, उस पर आपका क्या कहना है?
मैं कृतज्ञ हूं। मैं अपनी क्षमताओं और सीमा को जानता हूं, संगठन भी जानता है। फिर भी उन्होंने मुझे काम सौंपा है। मैं प्राणपण से इसको पूरा करने का प्रयत्न करूंगा।
पिछले कुछ समय से संगठन में एक रिक्तता दिखती थी, खासकर श्री अशोक सिंहल के जाने के बाद। मुद्दों की जो धार थी वह कम हो रही थी। इन चुनौतियों से आप किस तरह निपटेंगे?
सच है कि अशोक जी का व्यक्तित्व बहुत बड़ा था। इसके साथ ही उन्होंने अपने साथ काम करने वाले कार्यकर्ताओं को सामर्थ्य भी दी थी, योग्यता भी दी थी और संकल्प भी दिया था। इसलिए उनके जाने के बाद उनके जैसा बड़ा नेता कोई नहीं था। पर विश्व हिंदू परिषद् अपना काम ठीक ढंग से करती रही है। मैं अशोक जी की तुलना में बहुत सामान्य हूं। मैं तो प्रवीण भाई की तुलना में भी सामान्य हूं। मैं सामान्य रूप से रहने वाला एक व्यक्ति हूं, एक साधारण कार्यकर्ता हूं। भगवान से यह प्रार्थना करता हूं कि मेरे जीवन में साधारणता का तत्व बना रहे। मैं अपने साथियों के बीच में असाधारण न दिखूं। हम अपनी टोली के सहारे विश्व हिंदू परिषद् के उद्देश्यों को प्राप्त करेंगे।
हिंदू हितों के लिए गठित विश्व हिंदू परिषद् अनेक आंदोलन में सक्रियता के साथ शामिल रही है। खासकर राम जन्मभूमि आंदोलन सबसे बड़ा आंदोलन रहा और राम मंदिर पूरे जनमानस की भावनाओं से जुड़ा हुआ है। अब इसमें परिषद् की क्या भूमिका रहने वाली है, आज उसकी क्या स्थिति है?
हमको लग रहा है कि हमारा लक्ष्य समीप आ रहा है। न्यायालय में सुनवाई शुरू हो गई है। हम उम्मीद करेंगे कि वह जल्दी पूरी हो। हमारे वकीलों का कहना है कि पक्ष मजबूत है, हम जीतेंगे। ऐसा होता है तो राम जन्मभूमि पर राम मंदिर बनाने का रास्ता प्रशस्त हो जाएगा। मंदिर निर्माण के लिए देशभर के गांवों से पूजित होकर अयोध्या आर्इं ईटें रखी हुई हैं। खंभों पर नक्काशी का काम पूरा हो गया है। एक बार अनुमति का काम पूरा हो जाए तो भव्य मंदिर बन जाएगा। और मान लें कि निर्णय हमारे विपरीत भी आया तो भारत की जनता अपने सांसदों पर दबाव डालकर, संसद से कानून पारित कराकर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगी। मंदिर के निर्माण को अब कोई नहीं रोक सकता।
परिषद् से जुड़े अन्यान्य संगठनों से लोगों, खासकर युवाओं को जोड़ने के लिए आपके मन में कोई योजना है?
हमारे बजरंग दल में भाई और दुर्गावाहिनी में बहनें बड़ी संख्या में आती हैं। इसलिए मैं तो यह कहूंगा कि विहिप नौजवानों का बहुतायत वाला संगठन है। आने वाले दिनों में हम सामाजिक समरसता के प्रश्न को और जोड़ सकते हैं। हम अपने हिंदू परिवारों को संस्कारित, सुगठित रखने के लिए प्रयत्न करेंगे। हम सबके जीवन में हिंदू संस्कार आएं, इसका प्रयत्न करेंगे। हमें विश्वास है कि देश की नई पीढ़ी बड़ी संख्या में हमारे साथ जुड़ेगी।
हिंदू की बात करने पर उसे राजनीति की दृष्टि से देखा जाता है। क्या हिंदू-हित पर बोलना इसी तरह सेकुलरवाद की भेंट चढ़ता रहेगा?
मैं समझता हूं कि देश का वातावरण बदल भी रहा है। हम सबने पिछले लोकसभा चुनावों में देखा कि लोग कितनी तेजी से बदल रहे हैं। अब तो बेशक नाटक ही हो, पर राहुल गांधी को भी धोती बांधकर और जनेऊ पहनकर मंदिरों में जाना पड़ रहा है। गुजरात के चुनावों में तो उन्होंने अपनी सभाओं से मुसलमानों को दूर रखने की भी कोशिश की। इसलिए हिंदू-हित की बात करना अब माफी मांगने वाली स्थिति नहीं है, रक्षात्मक नहीं है। बंगाल में अब ममता बनर्जी भी पूजा-पंडालों में जाती हैं। यही नहीं, रामनवमी के अवसर पर अपनी पार्टी के लोगों द्वारा शोभायात्राएं भी निकालती हैं।
हिंदू हेल्पलाइन, हिंदू हेल्थलाइन आदि के जरिए विश्व हिंदू परिषद् के साथ बड़ी संख्य में कार्यकर्ता जुड़े हुए हैं। क्या इस तकनीक का इस्तेमाल आगे करते रहेंगे?
तकनीक एक लगातार चलने वाली यात्रा है। जैसे-जैसे समय बदलता है तकनीक बदलती है। इसलिए तकनीक बदलने का निर्णय करने की जरूरत नहीं है। जब मैं छोटा था तो देश में टेलीविजन होता ही नहीं था। एक चैनल से दो हुए तो बहस हुई कि दो कैसे करेंगे। दो से रंगीन कैसे करें। इसलिए तकनीक हम सबकी मित्र है। जहां तक यह मित्र है वहां तक चलाएंगे। पर जहां तकनीक मित्र नहीं है वहां वह मनुष्य को बेरोजगार बनाती है। व्यक्तिगत संपर्क को कम करती है, वहां सावधानीपूर्वक व्यवहार करेंगे। इसलिए तकनीक को अपना मित्र बनाकर काम करना है तो करेंगे।
सांगठनिक दृष्टि से आपको डॉ. प्रवीण तोगड़िया की जगह मिली है। वे अपनी बातों को बहुत ही मुखरता से रखते थे। वहीं आप मृदुभाषी हैं। इस पर कुछ कहना चाहेंगे?
मैं कम से कम उनकी जैसी छवि बनाने की चेष्टा नहीं करूंगा। मुझे लगता है कि बात में दम होना चाहिए। आवाज में कितना दम है, यह जरूरी नहीं है। मैं मानता हूं कि वे उग्र थे, प्रखर थे। मैं मानता हूं कि मैं वैसा नहीं हूं। मैं जैसा हूं वैसा ही रहना चाहता हूं।