ऑपरेशन मेघदूत बर्फ में छूटा था पाक का पसीना
   दिनांक 24-अप्रैल-2018
पाकिस्तान हमेशा से सियाचिन पर कब्जा करने की कोशिश करता आ रहा है, लेकिनभारतीय सेना के हाथों उसे हर बार मुंह की खानी पड़ी। फिर भी वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आता

सियाचिन दुनिया का सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र। जहां तापमान शून्य से 50 डिग्री नीचे चला जाता है, वहां हमारे जवान निरंतर मुस्तैद रह सरहद की हिफाजत करते हैं। पाकिस्तान ने कई बार इस इलाके में घुसपैठ की कोशिश की, पर उसे हर बार मुंह की खानी पड़ी। चाहे वह आॅपरेशन मेघूदत हो या कारगिल युद्ध।
1978 की बात है। कुमाऊं रेजिमेंट के कर्नल नरेंद्र कुमार जर्मनी के कुछ पवर्तारोहियों से बात कर रहे थे। बातों-बातों में एक पर्वतारोही ने उन्हें बताया कि साल्टोरो रेंज की तरफ से पर्वतारोहण के लिए उन्हें पाकिस्तान से वीजा मिला है। कर्नल को लगा कि जिस जगह की बात हो रही है, वह तो भारतीय क्षेत्र है। उन्होंने तत्काल सेना मुख्यालय को इसकी सूचना दी। इस मुद्दे पर बैठक हुई और हर पहलू पर विचार करने के बाद यह निष्कर्ष निकला कि पाकिस्तान इस हिस्से से घुसपैठ कर सकता है। उसे रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत है। उस समय तपीश्वर नारायण रैना भारतीय सेना अध्यक्ष थे। आगे चल कर कर्नल नरेंद्र की यह आशंका सही साबित हुई। हालांकि भारत ने पाकिस्तान के मंसूबे को नाकामयाब कर दिया।
उस समय तक सियाचिन पर सेना की तैनाती नहीं हुई थी। ऑपरेशन मेघदूत के तहत सबसे पहले सियाचिन पहुंचने वाले दल की अगुआई करने वाले ले. जनरल (से.नि.) संजय कुलकर्णी बताते हैं, ‘‘1978 में कुमाऊं रेिजमेंट में तैनात कर्नल एन. कुमार पहली बार वहां पहुंचे। इससे पहले तक केवल जहाज और हेलि9कॉप्टर से ही सियाचिन की निगरानी की जाती थी। 1982 में भी वे सियाचिन गए और तीन माह तक वहां रहे। 1983 में जब सेना का एक दल सियाचिन गया तो वहां सोडा रैपर मिले, जिन पर जापानी भाषा में कुछ लिखा था। उस दल में मैं भी शामिल था। इससे साफ हो गया कि पर्वतारोहण के बहाने पाकिस्तान इस क्षेत्र में घुसपैठ कर रहा है।’’ खुफिया एजेंसियों से भी सूचना मिली कि इस क्षेत्र में पाकिस्तानी फौज की स्पेशल सर्विसेज ग्रुप (एसएसजी) सक्रिय है। उस समय पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ एसएसजी में कर्नल थे और इस अभियान की जिम्मेदारी उन्हीं पर थी।


1 मई, 1984 को सेना को सूचना मिली कि मुशर्रफ की अगुआई में पाकिस्तान ने इस क्षेत्र पर कब्जा करने की योजना बनाई है। चूंकि जून तक इस क्षेत्र में तापमान -30 से -40 डिग्री तक पहुंच जाता है। पाकिस्तान की योजना थी कि इतनी सर्दी में भारतीय सेना वहां पहुंच नहीं पाएगी और वह उस इलाके में अपनी चौकी स्थापित कर लेगा। बकौल कुलकर्णी, सेना मुख्यालय में रणनीति बनी और बिग्रेडियर चन्ना को इस आॅपरेशन के नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंपी गई। भीषण ठंड में इतनी ऊंचाई पर टिके रहने के लिए सेना को गर्म कपड़ों और अन्य सामान की जरूरत थी। सेना की पश्चिमी कमान के प्रमुख ले. जनरल पी.एन. हून को इसके लिए यूरोप भेजा गया। यूरोप में जिस कंपनी के पास वे सामान लेने गए, वहीं से उन्हें पता चला कि पाकिस्तान ने कंपनी को अपने जवानों के लिए ऐसे ही उपकरणों की आपूर्ति का आॅर्डर दिया है। बहरहाल, पी.एन. हून 12 अप्रैल को ठंडे इलाके में सेना के काम आने वाले सभी उपकरण और कपड़े लेकर वापस लौटे। योजना के मुताबिक, 13 अप्रैल को दो हेलिकॉप्टर में सेना का दल सियाचिन के लिए रवाना हुआ। कुलकर्णी बताते हैं, ‘‘एक हेलिकॉप्टर में मैं, रेडियो आॅपरेटर मंगल और दो पायलट थे, जबकि दूसरे हेलिकॉप्टर में लांस नायक रमेश सिंह और प्रकाश थे। सुबह 5:30 बजे हम बिलाफोंड ला पहुंचे। वहां दूर-दूर तक सिर्फ बर्फीला रेगिस्तान था। चारों तरफ बर्फ देखकर पायलट ने हेलिकॉप्टर उतारने से इनकार कर दिया। पायलट का कहना था कि अगर हेलिकॉप्टर बर्फ में धंसा तो सभी मारे जाएंगे। लिहाजा पायलट ने हमें कूदने को कहा, लेकिन सभी ने सोचा कि अगर बर्फ ठोस नहीं हुई तो सभी बर्फ में धंस जाएंगे। हमारे पास आटे की 15 किलो की एक बोरी थी। तय हुआ कि पहले इसे ही फेंक कर देखा जाए। अगर यह बर्फ में नहीं धंसी तो हम वहां कूदेंगे, नहीं तो कोई दूसरा रास्ता सोचना पड़ेगा। बोरी नीचे फेंकने पर हमें अंदाजा हो गया कि बर्फ नहीं धंसेगी।’’
वे आगे बताते हैं, ‘‘इसके बाद मैं नीचे कूदा, फिर रमेश और प्रकाश भी कूद गए। तब तक दूसरे हेलिकॉप्टर से बाकी जवान भी आ गए और हमने फटाफट हेलिपैड बनाना शुरू किया। करीब सात बजे तक हेलिपैड तैयार हो गया और हमने जरूरत का सारा सामान उतार लिया। इस बीच, ज्यादा ठंड की वजह से मंगल बीमार हो गया। इसलिए उसे हेलिकॉप्टर से वापस भेज दिया।’’
रेडियो नहीं चलाने का आदेश
कुलकर्णी बताते हैं, ‘‘हम लोगों ने तंबू वहां लगा दिए। हमारे पास रेडियो थे, लेकिन हमें यह निर्देश था कि किसी भी सूरत में उसे नहीं चलाएंगे, क्योंकि इससे दुश्मनों को हमारी मौजूदगी की भनक लग जाती। इस बीच, रमेश भी बीमार हो गया और 16 अप्रैल को शहीद हो गया। बाद में उसे कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया। सियाचिन में मेरे व मेजर आर.एस. संधू के अलावा कुल 29 जवान थे। हमारी चिंता थी कि अगर रमेश के पार्थिव शरीर को नहीं ले जाया गया तो बाकी जवान परेशान हो जाएंगे। बहरहाल, हमने रेडियो खोला और यह संदेश बेस तक पहुंचाया। जैसे हमने रेडियो खोला, आधा घंटा बाद पाकिस्तान का हेलिकॉप्टर ऊपर से गुजरा। 13 से 16 अप्रैल तक मौसम बहुत खराब था, इसलिए हम कोई मूवमेंट नहीं कर पाए। चौथे दिन हमने बिलाफोंड ला और सिया ला, दोनों जगह पर तिरंगा फहरा दिया। इसके बाद जोंग ला को भी कब्जे में ले लिया और इस तरह सियाचिन ग्लेशियर हमारे कब्जे में था। 1949 में कराची समझौते के बाद से ही पाकिस्तान सियाचिन को अपना बताता रहा है। इस ग्लेशियर के एक ओर चीन, दूसरी ओर पाकिस्तान और बीच में भारत है। पाकिस्तान की मंशा चीन के साथ हाथ मिलाकर भारत को कमजोर करने की रही है। इसलिए विदेशी पर्वतारोहियों को भी पाकिस्तान अपने क्षेत्र से इस हिस्से में पर्वतारोहण की अनुमति देता था, ताकि इस बहाने वह इस क्षेत्र की जानकारी  जुटा सके।’’
1984 में ‘ऑपरेशन अबाबील’ की असफलता की टीस सेना प्रमुख बनने के बाद भी मुशर्रफ के मन में रही, जो 1999 के कारगिल युद्ध के रूप में बाहर आई। हालांकि इसमें भी पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी। मुशर्रफ ने अपनी किताब ‘इन द लाइन आॅफ फायर’ में इस बात का उल्लेख भी किया है।