कब तक परोसते रहेंगे झूठी खबरें?
   दिनांक 25-अप्रैल-2018

चौथा स्तम्भ / नारद
मीडिया को महिलाओं की सुरक्षा को लेकर अपनी दोहरी मानसिकता बदलने की जरूरतसामयिक मुद्दों पर मीडिया के रुख और रुखाई की परतें खंगालता यह स्तंभ समर्पित है विश्व के पहले पत्रकार कहे जाने वाले देवर्षि नारद के नाम। मीडिया में वरिष्ठ पदों पर बैठे, भीतर तक की खबर रखने वाले पत्रकार इस स्तंभ के लिए अज्ञात रहकर योगदान करते हैं और इसके बदले उन्हें किसी प्रकार का भुगतान नहीं किया जाता। 
2014 में चर्च पर हमलों की फर्जी खबरों से जो सिलसिला शुरू हुआ था वह ‘मंदिर में बलात्कार’ तक पहुंच चुका है। रोज इसमें एक नया पन्ना जुड़ता जाता है। ऐसा कोई दिन नहीं जाता, जब मीडिया संगठित तरीके से कोई झूठी खबर न उड़ाए। जब तक अदालत और कानून की दहलीज पर पहुंचकर वह खबर फर्जी साबित होती है, तब तक अगले झूठ का नंबर आ चुका होता है। जम्मू में कठुआ के रसाना गांव में दिल्ली के चैनल किसी अज्ञात डर से सच नहीं बोल सके। उन्होंने भी ‘तीन दरवाजे’ और चार बड़ी खिड़कियों वाले कमरे में झांका जिसे बलात्कार की जगह बताकर दुनिया भर में प्रचारित किया गया, लेकिन जो दिखा उसे उन्होंने बताया नहीं। जी न्यूज की टीम ने पहली बार वे सब बताया जिसे बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से छिपाया गया था। 
कठुआ कांड में मीडिया की भूमिका संदिग्ध है। जिस तरह से तीन महीने पुरानी घटना को अचानक एक ही दिन में तूल दिया गया, उससे पता चलता है कि कोई  ‘रिंग मास्टर’ काम कर रहा है। गांव के लोगों ने सीबीआई जांच की मांग करते हुए प्रदर्शन किया तो उसे  ‘बलात्कारियों के समर्थन में प्रदर्शन’ बताया गया। प्रदर्शनकारियों के हाथों में तिरंगा होने और उनके जय श्री राम के नारों पर लगभग सभी चैनलों पर उन्हें कोसा गया। महिला सुरक्षा को लेकर मचे सारे हंगामे के बीच उधर जेएनयू में एक छात्रा ने अजय कुमार नाम के एक प्रोफेसर पर यौन शोषण का आरोप लगाया पर यह मामला मीडिया की सुर्खियों से गायब है क्योंकि प्रोफेसर वामपंथी संगठनों से जुड़ा हुआ है। 
करीब एक साल पहले बल्लभगढ़ में ट्रेन में जुनैद नाम के लड़के की हत्या पर मीडिया ने खूब शोर मचाया था। अपने इस स्तंभ में हमने तभी बताया था कि सीट के लिए हुए झगड़े में ‘बीफ’ शब्द घुसाने का काम आजतक चैनल ने किया था। अदालती कार्रवाई में यह बात साबित हुई कि झगड़ा सीट का ही था और इसमें हिंदू-मुसलमान का कोई मामला नहीं था। पर मीडिया अब चुप्पी साधे हुए है। 
अखबारों और चैनलों का यह रवैया तब और खुलकर सामने आया, जब आतंकी मामले में फंसाए गए स्वामी असीमानंद समेत पांचों लोगों को अदालत ने दोषमुक्त कर दिया। कुछ दिन पहले मोहम्मद आमिर नाम का एक आरोपी जेल से रिहा हुआ था तो आजतक चैनल ने ‘मैं आतंकवादी नहीं था’ नाम से कार्यक्रम चलाया था। सबने उस फैसले को न्याय की जीत बताया और पूछा गया कि जेल में बीते 14 साल कौन लौटाएगा? लेकिन यह सद्भावना स्वामी असीमानंद के लिए देखने को नहीं मिली। जज ने 2 महीने पहले रिटायरमेंट की अर्जी दे दी तो उस बहाने कहानी गढ़ने की कोशिश हुई। इंडिया टुडे समेत कुछ चैनलों ने तो जज के खिलाफ कोई जांच लंबित होने की ब्रेकिंग न्यूज भी चलाई। फैसलासुनाते ही मीडिया के जरिए एक जज के चरित्रहनन का यह तरीका चिंताजनक है। 
होली से ठीक पहले वामपंथी गिरोहों और कुछ तथाकथित पत्रकारों ने ‘गुब्बारे’ फेंके जाने का आरोप लगाकर खूब हंगामा मचाया था। फोरेंसिक जांच में यह रिपोर्ट फर्जी निकली। यह मामला भी देश और हिंदुओं को बदनाम करने की कोशिशों की लंबी सूची की एक कड़ी बनकर रह गया। चिंता की बात यह है कि ऐसा करने वाले पत्रकार आज भी मुख्यधारा मीडिया में महत्वपूर्ण पदों पर हैं और उसी पत्रकारिता को जारी रखे हुए हैं। आखिर मीडिया अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को कब समझेगा?