आखिर राहुल को विपक्ष क्यों नेता नहीं मानता ?

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राहुल गांधी में नेतृत्व क्षमता है या नहीं इस बात पर उनकी अपनी पार्टी में ही संशय है। फेडरल फ्रंट के लोग उन्हें कितने हल्के में लेते हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह उन्हें अपने साथ आने का न्यौता तो दे रहे हैं लेकिन उनकी शर्तों के साथ। इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि विपक्ष की आगे की रणनीति जो भी होगी उसमें राहुल की अहम भूमिका तो कतई नहीं होगी।  

 

2019 में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की ताजपोशी का सपना देख रही कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका ममता बनर्जी ने दिया है। बंगाल की शेरनी के तौर पर राजनीतिक हलकों में विख्यात रहीं पश्चिम बंगाल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी वही नेता हैं, जिन्होंने केंद्र की मोदी की सरकार के खिलाफ फेडरल फ्रंट बनाने की बीते मार्च में शुरुआत की थी। ममता बनर्जी ने एक समाचार चैनल को दिए इंटरव्यू में साफ कर दिया, “कांग्रेस भाजपा के खिलाफ प्रस्तावित फेडरल फ्रंट में एक साझेदार के तौर पर हिस्सा बन सकती है मगर फ्रंट के नेता के तौर पर नहीं। कांग्रेस को फ्रंट के लिए यह बलिदान देना पड़ेगा। अगर वह ऐसा नहीं करती है तो खुद अपने रास्ते पर चल सकती है। ”

 

ममता बनर्जी के इस ऐलान का मकसद साफ है। राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस को प्रस्तावित फेडरल फ्रंट के नेतृत्व के दावे से पीछे हटना पड़ेगा। यह पहला मौका नहीं है, जब राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने से किसी विपक्षी नेता ने इंकार किया है। इसके पहले 13 मार्च को राहुल की ही माता और कांग्रेस संसदीय दल की चेयरमैन सोनिया गांधी की डिनर पार्टी में जाते वक्त राष्ट्रीय जनता दल के नेता और लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने साफ कहा था, “अभी हम सिर्फ बात करने जा रहे हैं, नेतृत्व का सवाल बाद में हल होगा।”

 

महाभियोग प्रस्ताव का भी किया विरोध

 

ममता बनर्जी यहीं पर नहीं रूकीं। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्ताव का भी उन्होंने विरोध किया है। इस मसले पर भी उनकी राय कांग्रेस की राय से अलग है। ममता ने कहा है, “ प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्र के खिलाफ महाभियोग का नोटिस देना गलत था। कांग्रेस हमारा समर्थन चाहती थी, लेकिन हमने ऐसा नहीं किया।” ममता यहीं नहीं रूकीं। उन्होंने कहा, “मैंने सोनिया गांधी, राहुल गांधी से महाभियोग नोटिस न देने को कहा था। मैंने उनसे कहा था कि हमारी पार्टी न्यायपालिका में हस्तक्षेप नहीं चाहती है।”

 

राहुल में नहीं नेतृत्व कौशल का स्पार्क

 

देश की सबसे पुरानी पार्टी का नेता होने की वजह से कांग्रेस और राहुल के सलाहकार राहुल को मोदी विरोधी राजनीति का खुद-ब-खुद केंद्र मान रहे हैं। लेकिन पहले तेजस्वी यादव और अब फिर ममता बनर्जी का उन्हें नेता नहीं मानने के पीछे आखिर क्या वजह है? इसका जवाब कांग्रेस के ही एक नेता देते हैं। नाम न छापने की शर्त पर उनका कहना है कि दरअसल राहुल अब तक अपना नेतृत्व कौशल नहीं दिखा पाए हैं। वंशवादी राजनीति के खिलाफ कांग्रेस को छोड़कर एंटी डायनेस्टी फ्रंट चलाने वाले भानुप्रताप नारायण मिश्र अक्सर कहा करते हैं कि राहुल में वह स्पार्क ही नहीं है, जो विपक्षी राजनीति की अगुआई कर सकें।

 

वैसे राहुल के नेतृत्व को लेकर सवाल उठाने वाली ममता बनर्जी के बारे में यह भी जानना चाहिए कि वे खुद इंदिरा-राजीव की नजदीकी रही हैं। जनता पार्टी के शासनकाल के दौरान गिरफ्तार इंदिरा गांधी की रिहाई को लेकर उन्होंने कोलकाता में हंगामा किया था। इसका प्रतिसाद उन्हें 1984 के आम चुनावों में राजीव गांधी ने दिया। उन्हें जादवपुर लोकसभा सीट से राजीव ने ही उम्मीदवार बनाया था। उस दौरान इंदिरा लहर में ममता ने वामपंथी राजनीति के दिग्गज सोमनाथ चटर्जी को हराया था। इसके बाद उन्हें केंद्र सरकार में युवा मामलों का राज्यमंत्री बनाया गया था। कांग्रेस से ममता ने 1996 में जब अलग राह चुनी, तब उन्होंने कांग्रेस पर पश्चिम बंगाल में सीपीएम की कठपुतली होने का आरोप लगाया था। साफ है कि ममता अगर राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाती हैं तो उसके खास मायने हैं। 

 

मोर्चे का इतिहास नया नहीं

 

भारतीय राजनीति में मोर्चो का इतिहास नया नहीं है। यह बात और है कि अब के पहले तक सारे मोर्चे कांग्रेस की केंद्रीय सरकारों के खिलाफ बनते रहे हैं। 1988 में तेलुगू देशम के तत्कालीन महासचिव एनटी रामाराव के संयोजन में राष्ट्रीय मोर्चा बना था। जिसने 1989 के आम चुनावों में कांग्रेस को शिकस्त दी। उसे बाहर से तब भारतीय जनता पार्टी ने भी समर्थन दिया था, जिसके बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने थे। दूसरी बार कांग्रेस के खिलाफ 1996 में संयुक्त मोर्चा बना, जिसमें भारतीय जनता पार्टी सहयोगी नहीं थी। कांग्रेस के खिलाफ बने इस मोर्चे की पहले देवेगौड़ा और बाद में इंद्रकुमार गुजराल की जो सरकारें बनीं, उलटबांसी ही थी कि उन्हें उस कांग्रेस ने समर्थन दिया, जिसके खिलाफ मोर्चा बनाकर गैर भारतीय जनता पार्टी विपक्षी पार्टियां चुनावी मैदान में उतरी थीं।

 

मोटे तौर पर देश में तीसरी बार मोर्चे का विचार आया है, जिसे ममता बनर्जी, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव और आंध्र के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू का समर्थन हासिल है। यह मोर्चा इस मामले में भी ऐतिहासिक है, जो पहली बार भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाली केंद्र सरकार के खिलाफ बना है। इसके लिए चंद्रशेखर राव ने पहली बार ममता बनर्जी के इस विचार का साथ 20 मार्च को दिल्ली में दिया था, जब उन्होंने ममता बनर्जी से मुलाकात की थी और वैकल्पिक मोर्चे पर जोर दिया था। इसके बाद खुद ममता बनर्जी ने 28 मार्च को सोनिया गांधी के साथ ही भारतीय जनता पार्टी से नाराज चल रहे अरूण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा और यशवंत सिन्हा के साथ ही आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल से मुलाकात कीं। सोनिया से मुलाकात के बाद ममता बनर्जी ने तब कहा था, "सोनिया गांधी के साथ राजनीति पर चर्चा हुई...हम चाहते हैं कि कांग्रेस भी एक साथ रहे, कांग्रेस भी इस पहल में हमारी मदद करे...हम चाहते हैं कि कर्नाटक में कांग्रेस जीते, यूपी में अखिलेश और मायावती साथ रहें और बिहार में लालू-कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ें।"

 

एक राजनीतिक जानकार के मुताबिक ममता बनर्जी को लगता है कि राहुल गांधी की अगुआई देश की जनता में उम्मीदें नहीं भर पाई है। विपक्षी राजनीति का बड़ा चेहरा रहे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का चेहरा बन गए हैं। इसलिए ममता बनर्जी को लगता है कि भविष्य में हालात बने तो समूचा विपक्ष राहुल की बजाय उन पर दांव लगाने की ज्यादा सोचेगा। इसकी बड़ी वजह उनका जुझारू होना है। फिर भारतीय जनता पार्टी विरोधी राजनीति में उन्होंने जो अतिवादी राह अख्तियार कर रखी है, धर्मनिरपेक्षता के नाम पर विपक्षी राजनीति के अनुकूल है।

ममता को पता है कि अगर राहुल गांधी को नेता मान लिया जाएगा तो उन राज्यों में फेडरल फ्रंट के लिए मुसीबतें खड़ी हो जाएंगी, जहां कांग्रेस की प्रतीकात्मक उपस्थिति ही रह गई है। ये राज्य तेलंगाना, ओडिशा और तमिलनाडु हैं। ममता ने अपने इंटरव्यू में शायद इसी वजह से कहा है, “यदि हम भाजपा के साथ आमने-सामने की लड़ाई करते हैं तो ओडिशा में बीजेडी, आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू और तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव पर सबकुछ छोड़ देंगे।”

 

वैसे भी कांग्रेस के पास अभी लोकसभा में महज 47 सांसद हैं, जो सदन की कुल संख्या के दहाई से भी कम है। जिस तरह उसने बजट सत्र को तबाह किया, उससे वह भले ही अपनी पीठ थपथपा ले, लेकिन इसका आमलोगों के बीच संकेत ठीक नहीं गया है। इसलिए भी ममता कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करने से हिचक रही हैं। ऐसे में फेडरल फ्रंट की तसवीर क्या होगी, इसे देखा जाना दिलचस्प रहेगा। लेकिन एक बात तय है कि ममता के ऐलान से मोदी को चुनौती देने वाले राहुल गांधी की स्वीकार्यता पर सवाल जरूर उठ गए हैं। जो 2019 के आम चुनावों को गहरे तक प्रभावित करेंगे।