समरसता की अनूठी पहल
   दिनांक 01-मई-2018

 
रपट/आंध्र प्रदेश
 
पाञ्चजन्य ब्यूरो
हाल ही में हैदराबाद के श्रीरंगनाथन मंदिर में 2,700 साल पुरानी परंपरा तोड़कर पुजारियों ने अनुसूचित जाति के एक भक्त को कंधे पर बिठाकर मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कराया। इस समय देश में वैष्णव संत रामानुजाचार्य की 100वीं जयंती चल रही है। इसलिए इस संप्रदाय के सभी मंदिरों में विशेष अनुष्ठान चल रहे हैं। इसी अनुष्ठान के क्रम में यह अभिनंदनीय काम हुआ है।
इससे कुछ दिन पहले केरल से खबर आई थी कि अनुसूचित वर्ग के कुछ विद्वानों को मंदिरों में पुजारी नियुक्त किया गया है। त्रावणकोर देव स्वामी बोर्ड (टीडीबी) की एक पहल से यह संभव हुआ है। मंडल 1,248 मंदिरों का प्रबंधन देखता है। इनमें सबरीमाला का प्रसिद्ध अयप्पा स्वामी मंदिर भी शामिल है। इन मंदिरों में 36 गैर-ब्राह्मणों सहित अनुसूचित जाति के छह पुजारियों की नियुक्ति हुई है। सबसे खास बात यह है कि नियुक्ति से पहले इनकी लिखित और मौखिक परीक्षा ली गई। बोर्ड द्वारा संचालित एक मंदिर में येदू कृष्णन, जो अनुसूचित वर्ग के हैं, नाम के पुजारी काफी समय से बखूबी पूजा-पाठ का काम कर रहे हैं। इसके पहले मदुरै के पास उथपुरम गांव के मंदिर में अनुसूचित जाति के लोगों का प्रवेश एक ऐतिहासिक और युगांतरकारी घटना थी। इस मंदिर में अनुसूचित वर्ग के प्रवेश पर 20 साल से रोक लगी हुई थी। ये लोग प्रतीकात्मक रूप से मंदिर परिसर में खड़े पीपल के पेड़ की परिक्रमा लगाकर पूजा-अर्चना कर लिया करते थे। विश्व हिंदू परिषद के कारण इन लोगों को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति मिली थी।
 दक्षिण भारत के मंदिरों में इस वर्ग के लोगों को प्रवेश करने का अवसर त्रावणकोर के महाराजा के कारण 1936 में मिला था। इसके बाद जुलाई, 2008 में तिरुपति मंदिर में इन्हें पूजा का अधिकार दिया गया था। कुछ दिन पहले अखाड़ा परिषद ने प्रयाग में हुई एक बैठक के दौरान इस समुदाय के संत कन्हैयानंद गिरि को महामंडलेश्वर की उपाधि देने की घोषणा की है। उन्हें यह उपाधि आगामी कुंभ मेले में दी जाएगी।इन कार्यों से अनुसूचित जाति के लोगों में निश्चित रूप से यह संदेश जाएगा कि वे हिंदू समाज के ही अभिन्न अंग हैं। यह पहल उनमें गरिमा बढ़ाएगी, वे जातिगत हीनताबोध से मुक्त होंगे और उनका आत्मबल भी प्रबल होगा।
 ये तीनों काम इस देश की सनातन संस्कृति के अनुसार हुए हैं। इस संस्कृति में भेदभाव तो कहीं था नहीं, लेकिन जैसे-जैसे बाहरी लोग यहां आए, वैसे-वैसे उन लोगों ने अनेक प्रकार के भेदभावों को जन्म देना शुरू किया। समय बीतने के साथ उन भेदभावों की खाई इतनी चौड़ी होती गई कि समरस समाज भी बिखरने लगा, एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से दूर होने लगा। इन सबको देखते हुए ही गांधी जी ने अपने एक भाषण में कहा था, ‘‘अछूतों का एक अलग वर्ग बना देना हिंदू धर्म के माथे पर कलंक है। यह अस्पृश्यता रूपी राक्षस तो रावण से भी भयंकर है और जब हम इस राक्षस की पूजा करते हैं, तब तो हमारे पाप की गुरुता और बढ़ जाती है। यदि इसे धर्म कहें तो ऐसे धर्म से मुझे घृणा होती है। यह हिंदू धर्म हो ही नहीं सकता। मैंने तो हिंदू धर्म द्वारा ईसाइयत और इस्लाम का आदर करना सीखा है, फिर यह पाप हिंदू धर्म का अंग कैसे हो सकता है? इस पाखंड और अज्ञान के खिलाफ यदि जरूरत पड़े तो मैं अकेला लड़ूंगा, अकेला तपश्चर्या करूंगा और उसका नाम जपते हुए मरूंगा।’’अब समाज प्रायश्चित कर रहा है और अपने लोगों को गले लगा रहा है तो इसका स्वागत हर भारतीय को करना चाहिए। सामाजिक समरसता के लिए यही एकमात्र मार्ग है, यही सनातन धर्म के हित में है।