एजेंडे पर चलता मीडिया
   दिनांक 01-मई-2018
चौथा स्तम्भ / नारद 
मीडिया पर चलने वाली खबरें एक खास नजरिए से परोसी जाती हैं, जरूरत सावधान रहने की बलात्कार की घटनाएं हों या कोई दूसरा अपराध, मीडिया के एक बड़े वर्ग को इन सब में अवसर नजर आ रहा है। यह अवसर देश को बदनाम करने और उसकी छवि को धूमिल करने का है। इसी तबके ने कठुआ कांड को 'अंतरराष्ट्रीय' बनाने का काम किया। ऐसे हर मामले में पहले से तय तरीका होता है। घटना के बाद एनजीओ के जरिए आंदोलन खड़ा किया जाता है। फिर फिल्मी सितारों की विरोध की प्रायोजित तस्वीरें सामने आती हैं। इसके बाद बरखा दत्त जैसी कोई कथित पत्रकार वॉशिंगटन पोस्ट में लेख लिखती हैं और बड़ी सफाई से इसके लिए हिंदू समुदाय को आरोपित करती हैं।
 महिलाओं पर अत्याचार समाज और सरकारों के लिए बड़ी समस्या है। लेकिन मीडिया इस समस्या पर कुछ अलग ही खेल खेल रहा है। ये सब किसके इशारे पर हो रहा है समझना जरूरी है। हर अखबार और चैनल में बलात्कार की 2-3 खबरें रोज होती हैं। कनिष्ठ पत्रकारों को भी पता होता है कि पीड़ित की पहचान को सामने लाना अपराध है। इसके बावजूद कठुआ मामले में दिल्ली उच्च न्यायलय में खड़े होकर देश के 12 मीडिया समूहों ने झूठ बोला कि उन्हें इस नियम का पता ही नहीं था। लगता यही है कि बच्ची की तस्वीर दिखाने के पीछे उद्देश्य था कि दंगे भड़क जाएं और कांग्रेस पार्टी उस आग में अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक सके।
कांग्रेसी नेता रेणुका चौधरी ने बलात्कार पीड़ित महिलाओं की तुलना शोले फिल्म के खलनायक सांभा से की। उन्होंने कहा कि बलात्कार के बाद लड़की जब थाने जाती है तो पुलिस पूछती है, ‘कितने आदमी थे।’ मानवीय संवेदना के एक मुद्दे पर एक महिला नेता की विकृत सोच बड़ी खबर बन सकती थी। लेकिन कुछ अज्ञात कारणों से चैनलों ने इसे पूरी तरह से हटा लिया। दूसरी तरफ जब केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार ने कहा कि बलात्कार रोकना हमारी जिम्मेदारी है, लेकिन मीडिया को भी थोड़ी संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। तो वे सारे मीडिया समूह उन पर पिल पड़े जिन पर कुछ दिन पहले ही असंवेदनशीलता दिखाने के लिए उच्च न्यायालय ने जुर्माना ठोका।
 उधर कर्नाटक में चुनावी माहौल गर्म है। आम तौर पर इन दिनों मीडिया पिछली सरकार के कामकाज की समीक्षा करता है। बेंगलुरु की सड़कें गड्ढों से भरी पड़ी हैं, कानून-व्यवस्था का बुरा हाल है, लेकिन दिल्ली के मुख्यधारा मीडिया में इस बारे में कोई रिपोर्ट नहीं दिखेगी। वोट पाने के लिए राज्य का मुख्यमंत्री उत्तर और दक्षिण का अनावश्यक विवाद पैदा करने की कोशिश करता है, लेकिन दिल्ली के मीडिया को इसमें कुछ बुरा नहीं लगा। इधर दिल्ली के अखबार एक बार फिर से अरविंद केजरीवाल के बारे में विज्ञापननुमा समाचारों से भरे दिख रहे हैं। विज्ञापनों की धौंस देकर समाचार को प्रभावित करने का यह खेल खुलेआम चल रहा है। जल बोर्ड का पाइप फटने से आधी दिल्ली दो दिन तक जाम में रही, लेकिन किसी अखबार या चैनल ने मुख्यमंत्री पर प्रश्न नहीं उठाया। जबकि उनके पास इकलौता यही मंत्रालय है और उसका ये हाल है। स्वास्थ्य सेवाओं पर अखबारों में झूठी तारीफें छपती हैं, लेकिन जब सरकारी अस्पताल में सिर की चोट में पैर का आॅपरेशन कर दिया गया तो मामला फौरन रफा-दफा हो गया। ये मुद्दे जनता के हित से जुड़े हैं, अच्छा होता कि अगर मीडिया विज्ञापन का लालच छोड़कर जनहित को प्राथमिकता देता।