पिटे प्यादों की बड़ी चाल!
   दिनांक 01-मई-2018
 
पिटे प्यादों की बड़ी चाल!महाभियोग। इसका वही हश्र हुआ जो अपेक्षित था। राहुल गांधी की औपचारिक-अनौपचारिक अगुआई में कांग्रेस का वही हश्र हो रहा है जो अपेक्षित है।गौर कीजिए, इस बात में जरा भी अतिरंजना नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष का जिक्र इसलिए जरूरी हो जाता है कि पकी उम्र में अनुभव का कच्चापन जो अब तक केवल उनके व्यक्तिगत व्यवहार में झलकता था, अब ऐसा ही हल्कापन देश की सबसे बुजुर्ग पार्टी के सांगठनिक व्यवहार में झलकने लगा है। क्या जरूरत थी कांग्रेस को इस फजीहत की जो अपने आका के निर्देशों पर चलते हुए उसे झेलनी पड़ी! या कांग्रेस संगठन के भीतर नेताओं की ऐसी एक भी पर्त नहीं बची जो कुनबे के सामने हर मसले पर दंडवत हुए बिना भी कुछ सोच-समझ सकती हो! तार्किक, तथ्यपूर्ण और विवेकशील ढंग से सोचने के लिए स्वस्थ क्रियाशील मस्तिष्क चाहिए। किन्तु इस प्रकार सोची गई बात को संगठन के आंतरिक मंच पर रखने के लिए एक मजबूत रीढ़ का होना भी जरूरी है। क्या कांग्रेस के भीतर समझ, समन्वय और परिपक्वता की ऐसी कोई रीढ़ बची है? शायद नहीं! कहना कठिन है। क्या एक भी रीढ़दार कांग्रेसी, पार्टी में राहुल का सलाहकार नहीं है! शायद हां! शायद इसलिए क्योंकि अभिषेक मनु सिंघवी, पी. चिदंबरम और डॉ. मनमोहन सिंह का नाम महाभियोग प्रस्ताव पर समर्थन करने वाले सांसदों की सूची में नहीं है। किन्तु ऐसे में सवाल है कि यदि बारीक कानूनी मसले पर ऐसे दिग्गज कांग्रेसी बाहर खड़े रहे तो फिर यह सूची किसकी है? गर्दन हिलाने वालों की? और नहीं तो क्या! 
कपिल सिब्बल इन नामों को सूची से जानबूझकर अलग रखने की बात कर रहे हैं। ऐसे में मनमोहन सिंह अपनी स्थिति पर क्या कह रहे हैं? जाहिर है- कुछ नहीं! मनमोहन सिंह का मौन समझा जा सकता है, किन्तु सिब्बल की बात पर सिर्फ हंसा जा सकता है। क्योंकि यदि इतनी ही समझबूझ, छान-फटक और सलाह के साथ यह सूची बनी थी तो इसमें सेवानिवृत्त सांसदों के नाम डालने की समझदारी किसके खाते में डाली जाए? तो यहां फिर वही बात साबित होती है- पार्टी निश्चित ही राहुल की अगुआई में चल रही है। 
वैसे, इस सारे प्रकरण में सिर्फ कांग्रेस पार्टी ने राहुल के चलते गच्चा नहीं खाया बल्कि खुद युवराज भी वाम दलों के हाथ का प्यादा बन गए। तंत्र में रहते हुए लोकतांत्रिक संस्थाओं को धक्का पहुंचाना जिनका प्रिय खेल है अराजकता के पैरोकार वे वामपंथी पर्दे के पीछे रहे। राहुल की हनक को एक कच्चे-पक्के महाभियोग नोटिस के तौर पर भुना लिया गया। ऐसे में : 
— केंद्र सरकार समर्थकों के लिए यह राहत की बात इसलिए नहीं है, क्योंकि होकर भी यह हमला सीधे भाजपा पर नहीं था। (उन्हें तो इस वर्ष और तीखे-जोरदार हमलों के लिए तैयार रहना ही है) 
— कांग्रेस समर्थकों को भी एक-दूसरे को दिलासा देने की जरूरत नहीं है। (क्योंकि राहुल की अगुआई में उन्हें भविष्य के इतने दिलासे मिल चुके हैं कि आंखें-दिल, दोनों भर चुके हैं।) 
— महाभियोग की राह बंद होने से देश के बाकी लोगों को भी ‘आफत टल जाने’ का भ्रम पालने की जरूरत नहीं है। क्योंकि संख्याबल और संवैधानिक पैमानों पर लचर ठहरने वाले नोटिस का उद्देश्य प्रस्ताव को पारित कराने से ज्यादा देश की न्यायपालिका की साख को धक्का पहुंचाने का था। यह घटिया चाल चलने वाले बिसात के पहले कदम पर ही पिट जाने के बावजूद शीर्ष न्यायालय पर संदेह की कीचड़ उछालने का काम तो कर ही गए! 
बहरहाल, इस प्रकरण के बाद, किसी भी राजनीति और विचारधारा का हिस्सा होते हुए भी भारतीयता और इस देश के लोकतंत्र में आस्था रखने वालों के लिए समझने वाली कुछ बातें तो हैं। ये बातें भारतीय लोकतंत्र की बुनावट और संतुलन को समझने के लिए जरूरी हैं- पहली बात, भारत ब्रिटेन नहीं है, जहां सबसे ऊपर संसद है। दूसरी बात, भारत अमेरिका भी नहीं है जहां शीर्ष न्यायालय सबसे ऊपर है। और सबसे महत्वपूर्ण बात-भारत, भारत है। यह कोई पिरामिड-नुमा रचना नहीं है बल्कि यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था के अलग-अलग पाए समान हैं। इन्हें समान रखते हुए सबके कार्य और अधिकार क्षेत्र संविधान द्वारा पूर्व में ही तय करते हुए, जनता स्वयं पर अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से स्वयं ही शासन करती है। ताजा प्रकरण में देश की व्यवस्था के एक पाए पर खास तरह से प्रहार करते हुए उसे छोटा करने और तंत्र को डगमगाने की चाल चली गई। निश्चित ही महाभियोग भी इस संविधान की दी हुई व्यवस्था है। विराट-सम्माननीय न्यायालय के लिए भी एक प्रकार का अंकुश। किन्तु इसे राजनीति की निरंकुश इच्छाओं का औजार बनाने की छूट हर्गिज नहीं दी जा सकती। 
कांग्रेस की किरकिरी राहुल गांधी की आदत हो सकती है। कांग्रेस भी ऐसी किरकिरी की आदी हो सकती है। किन्तु यह देश अपनी संवैधानिक संस्थाओं पर राजनैतिक हमले का आदी नहीं है। आपातकालीन हथकंडे और उसके बाद के राजनैतिक परिणाम इसका उदाहरण हैं। वामपंथ का प्यादा बने युवराज के पैंतरे कांग्रेस की नैया पार लगाएंगे या इसे और गहरे भंवर में ले जाएंगे? देखते रहिए।