महंगी शराब पीने और सुअर का मांस खाने वाले मुसलमान थे जिन्ना ! महंगी शराब पीने और सुअर का मांस खाने वाले मुसलमान थे जिन्ना !
महंगी शराब पीने और सुअर का मांस खाने वाले मुसलमान थे जिन्ना !
   दिनांक 10-मई-2018
महंगी शराब पीने और पोर्क खाने वाले जिन्ना से लगाव और नोबेल विजेता भौतिक विज्ञानी अब्दुलस्सलाम से दूरी की पाकिस्तानी पहेली दिलचस्प है


महंगी शराब स्कॉच और पोर्क यानी सूअर के गोश्त को पसंद करने वाला कोई मुसलमान मुसलमानों का नेता कैसे हो सकता है ? हैरान न हों क्योंकि जिन्ना के मामले में ऐसा ही है! वह कैसे करोड़ों लोगों के नायक हो सकते हैं ?विश्व मानचित्र पर पाकिस्तान उदय सिर्फ इस आधार पर हुआ था क्योंकि जिन्ना मुसलमानों के लिए अलग मुल्क चाहते थे। शराब और सुअर का मांस दोनों ही गैर इस्लामिक हैं। बावजूद इसके जिन्ना को मुसलमान अपना हीरो कहते हैं। इससे उलट एक शीर्ष मुस्लिम वैज्ञानिक की उपेक्षा की कहानी भी देखिए,
पाकिस्तान के नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद अब्दुस्सलाम की वहां कोई स्वीकार्यता नहीं हैं। उन्हें भौतिक विज्ञान में श्रेष्ठ कार्य के लिए नोबेल दिया गया लेकिन वह अहमदिया समुदाय से थे और मुसलमान उन्हें इस्लाम में नहीं मानते थे इसलिए पाकिस्तान सरकार ने 1974 में संसद में बिल पास करवा के अहमदिया लोगों को इस्लाम से बाहर कर दिया था। दरअसल अहमदियाओं को सिर्फ इसलिए वहां मुसलमान नहीं समझा जाता है क्योंकि वो मोहम्मद साहब को आख़िरी नबी नहीं मानते हैं।

जब रमजान के दिनों में दिया भोजन की व्यवस्था का आदेश
जिन्ना ने 14 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान के गवर्नर जनरल पद की कराची में शपथ ली। उन्हें भारत के वायसराय लार्ड माउंटबेटन ने शपथ दिलवाई । कहते हैं कि उन्होंने उस अहम कार्यक्रम को देख रहे अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे शपथ ग्रहण समारोह के बाद अतिथियों के लिए भोजन की व्यवस्था करें। उस समय हिजरी कैलेंडर के अनुसार रमजान चल रहे थे रमजान में सुबह सहरी के बाद इफ्तार (रोजा खुलने का समय) जब तक रोजा खुलने का समय न हो जाए तब तक भोजन तो दूर की बात पानी पीना भी मुसलमानों के लिए निषेध है। इस पर अधिकारियों ने उन्हें समझाया कि रमजान में ऐसा करना सही नहीं रहेगा। तब जाकर जिन्ना को अपनी भूल का अहसास हुआ।

पीते थे महंगी शराब
जिन्ना लगभग रोज शराब पीते थे और सूअर का गोश्त खाते थे। उनके दिल्ली स्थित बंगले में एक बार था, जहां पर महंगी शराब हमेशा उपलब्ध रहती थी। जानकार कहते हैं कि उन्हें इस्लाम की कोई गहरी जानकारी नहीं थी। फिर भी जिन्ना एक इस्लामिक देश के संस्थापक बन गए।
जिन्ना उदारवादी मुसलमानों की पसंद हों यह तर्क भी अटपटा है क्योंकि जिन्ना की वकालत करने वाले मुसलमान पाकिस्तान के नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद अब्दुस्सलाम को याद नहीं रखते। उन्हें भौतिक विज्ञान में श्रेष्ठ कार्य के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था। वे पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मुल्तान से थे। मगर उनकी सबसे बड़ी ग़लती ये थी कि वो इस्लाम की "अहमदिया" विचारधारा से आते हैं और पाकिस्तान सरकार ने 1974 में संसद में बिल पास करवा के अहमदिया लोगों को इस्लाम से बाहर कर दिया था। अहमदिया लोगों को मुसलमान सिर्फ इस लिए नहीं समझा जाता है क्योंकि वो मोहम्मद साहब को आख़िरी नबी नहीं मानते हैं। कट्टरपंथी अहमदियों को मुसलमान नहीं मानते। मुसलमानों की ये क़ौम पाकिस्तान में मुसलमानों के हाथों ही जुल्म की शिकार हैं। ये अपने को मुसलमान नहीं कह सकते। पाकिस्तान में आए दिन अहमदियों को मारा जाता है। उनकी मस्जिदों में आग लगा दी जाती हैं। वहां पर उनकी स्थिति हिन्दुओं, सिखों, शियाओं, ईसाइयों या सिखों जैसी है।

कितनी बड़ी विडंबना है जहां कराची में इस्लाम के किसी फर्ज को न निभाने वाले जिन्ना का खूबसूरत मकबरा बना है। वहां खुद को मुसलमान कहने वालों की भीड़ लगी रहती है। दुवाएं मांगी जाती है जिन्ना की आत्मा कि शांति के लिए फातिहा पढ़ा जाता है । वहीँ अब्दुस्सलाम की क़ब्र पंजाब प्रांत के एक आम से क़ब्रिस्तान में है। क़ब्र के सिरहाने लगे हुए पत्थर पर पहले लिखा था "पाकिस्तान के अकेले मुसलमान नोबेल पुरस्कार विजेता"। बाद में पाकिस्तान सरकार ने "मुसलमान" शब्द हटवा दिया। उस क़ब्र पर न कोई फातिहा पढ़ता है और न कोई दुआ होती है। अब अब्दुस्सलाम का नाम पंजाब यूनिवर्सिटी तक से हटा दिया गया है।

हमारे कथित प्रगतिशील सेकुलर बुद्धिजीवी जो जिन्ना को दबी में अच्छा बताने की कोशिश करते हैं वे यह नहीं देख पा रहे हैं कि उस पाकिस्तान में एक महान वैज्ञानिक को कितना अपमान झेलना पड़ा। पिछले वर्ष अब्दुस्सलाम के भाई एडवोकेट मलिक सलीम लतीफ और उनके बेटे एडवोकेट फरहान पर उस समय गोलीबारी की गई जब वो कोर्ट जा रहे थे। उस हमले में लतीफ की मौके पर ही मौत हो गई और उनका बेटा गंभीर रूप से घायल हो गया। मलिक सलीम लतीफ की हत्या उनके मजहबी विश्वास के चलते की गई थी। हमले के पीछे इस्लामिक कट्टरपंथियों का हाथ था।