पसमांदा मुसलमानों से चिढ़ते थे जिन्ना पसमांदा मुसलमानों से चिढ़ते थे जिन्ना
पसमांदा मुसलमानों से चिढ़ते थे जिन्ना
   दिनांक 11-मई-2018
इस्लाम के नाम पर अलग मुल्क मांगने वाले जिन्ना खुद कितने गैर इस्लामिक थे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह स्वयं कभी जातिप्रथा से बाहर नहीं निकल पाए। जिन्ना पसमांदा यानी पिछड़ी जाति के मुसलमानों से चिढ़ते थे।



मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में पृथक इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान के लिए चले आंदोलन से पसमांदा यानी दलित मुसलमान गायब थे। मुस्लिम लीग सभी मुसलमानों की पार्टी नहीं थी। उस पर कब्जा मात्र अशराफ मुसलमानों का था न कि पसमांदा (पिछड़े) मुसलमानों का। क्योंकि अगर मुस्लिम लीग तमाम मुसलमानों की पार्टी होती तो 1938 में पटना में हुए एक निकाय के उपचुनाव में अब्दुल कैयूम अंसारी साहब को टिकट मिल गया होता। उन्होंने टिकट मांगा था तब लीग के नेताओं ने उनसे कहा था -"अब जोलाहे ( अंसारी) भी विधायक बनने का सपना देखने लगे हैं।" दरअसल पसमांदा मुसलमान बंटवारा चाहते ही नहीं थे। अगर कोई मुस्लिम लीग को सभी मुसलमानों की पार्टी समझता है तो वह कुछ पसमांदा मुसलमानों के नाम बता दे जो लीग में किसी भी ज़िम्मेदारी के पद पर रहे हो। पसमांदा आंदोलन के इतिहासकार श्री नुरूउल एन जिया कहते हैं कि सन 1940 में पसमांदा मुसलमानों ने देश के बंटवारे के विरोध में दिल्ली में एक विरोध प्रदर्शन आयोजित करवाया। उसमें लगभग चालीस हज़ार की संख्या में पसमांदा मुसलमान मौजूद थे। मुस्लिम लीग के लगभग सभी शिखर नेता अशराफ जातियों से थे। मुसलमानों में अशराफ जातियों का मतलब अगड़ी जातियों से है। यहीं नहीं, वे बड़े जमींदार या नामवर वकील थे। जिन्ना बड़े वकील और पैसे वाले इंसान थे। उनके नंबर दो साहिेबजादा लियाकत अली भी बैरिस्टर थे। वे करनाल और मुजफ्फरनगर के जमींदार थे। जमियातुल मोमिनीन/मोमिन कांफ्रेंस और उसकी साप्ताहिक पत्रिका मोमिन गैज़ेट के मुस्लिम लीग विरोध का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पत्रिका के संपादक मौलाना अबु उमर भागलपुरी ने अपने सम्पादकीय(1937ई०)में मुस्लिम लीग को निम्नलिखित अंदाज में परिभाषित किया:- "लीग एक ऐसा बलिगृह(क़ुर्बान गाह) है जहां हवस और स्वार्थ पर गरीबों की बलि दी जाती है। लीग संगे तराज़ू है जो सौदे के वक़्त किसी पलड़े पे झुक पड़ेगी। मुस्लिम लीग एक सियासी डिक्शनरी है जिसमें हर किस्म के कमज़ोर शब्दों का भण्डार है। उन्होंने अपने एक संपादकीय में मुस्लिम लीग को पूंजीवादी और उच्च वर्ग का स्टेज़ बताया।
24 मार्च 1940 को लाहौर में हुए अपने अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने "पाकिस्तान" के प्रस्ताव को पारित कर दिया था। जिसके विरोध में सबसे संगठित, तार्किक सधा और गरजदार आवाज़ मोमिन नौजवान कांफ्रेंस ने अपने 19 अप्रैल 1940 को पटना में हुए अधिवेशन में उठाई। उसके बाद की तिथियों में भी विभिन्न अधिवेशनों में मोमिन कांफ्रेंस अपने आखिरी सांस तक भारत के बंटवारे के विरोध में मज़बूती से आवाज़ उठाती रही।
जमीयतुल मोमिनीन (मोमिन कांफ्रेंस) के अध्यक्ष मौलवी मुहम्मद ज़हीरुद्दीन एडवोकेट ने 26 अप्रैल 1943 को दिल्ली में हुई वर्किंग कमेटी की मीटिंग में स्पष्ट शब्दों में कहा था "मुस्लिम लीग सत्ता और शक्ति की उतनी ही पूजा करती है जितनी की कांग्रेस,वह पूंजीवाद व ठेकेदारी का वैसा ही प्रतिनिधित्व करती है। और ये सब के सब अधिनायकवाद और व्यक्तिवाद के प्रेमी और सेवक है।" वरिष्ठ लेखक फैयाज अहमद फैजी के अनुसार, सचाई यह है कि मुस्लिम लीग के नेताओं और अन्य खास नेताओं में पसमांदा बिरादरी के मुसलमान नहीं थे। हालांकि मुसलमानों की कुल आबादी में ये 90 फीसद हैं। कहने वाले कहते हैं कि जिन्ना जैसे अशराफ मुसलमान नहीं चाहते थे कि पाकिस्तान में पसमांदा को उनके हक देने पड़े।
 
महत्वपूर्ण है कि अशरफ अक्सर पसमांदा आंदोलन पर मुस्लिम समाज को बांटने का आरोप लगाकर पसमांदा आंदोलन को कमज़ोर करने की कोशिश करते हैं। जिसके चपेट में अक्सर पसमांदा आ भी जाते हैं। जबकि पसमांदा आंदोलन एक वंचित समाज को मुख्यधारा में लाने की चेष्टा, सामाजिक न्याय का संघर्ष, हक़ अधिकार की प्राप्ति का प्रयत्न है। वे यह भी कहते हैं कि अशराफ, हमेशा से धर्म का इस्तेमाल अपनी सत्ता और वर्चस्व के लिए करता आ रहा है, और इसमें सफल भी रहे है। अतः उसके लिए यह आरोप लगाना बहुत आसान है। पसमांदा की तरक़्क़ी में सबसे बड़ी बाधा अशराफ ही बना हुआ है जो पसमांदा को धार्मिक और भावनात्मक बातों में उलझा कर उसको उसकी असल समस्याओं, रोज़ी रोटी, सामाजिक बराबरी और सत्ता में हिस्सेदारी से दूर रखते हुए स्वयं को सत्ता के निकट रखना सुनिश्चित किये हुए है।

अब आप समझ सकते हैं कि जिस जिन्ना के पाकिस्तान में पसमांदा मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं है, वहां पर हिन्दुओं की हालत क्या होगी। जोगिन्द्रनाथ मंडल को जिन्ना ने अपनी कैबिनेट में विधि मंत्री का दायित्व सौंपा। तब यही कहा जा रहा था कि इस्लामिक पाकिस्तान में सबके हक सुरक्षित हैं कयोंकि मंडल दलित हिन्दू थे। पर हुआ इसके ठीक विपरीत। मंडल पाकिस्तान के पहले और शायद आखिरी हिन्दू मंत्री बने। मंडल का संबंध ईस्ट बंगाल ( अब पाकिस्तान) से था। वे वहां पर मुस्लिम लीग के नेता थे। मंडल अपने को बाबा साहेब अंबेडकर के विचारों से बहुत प्रभावित बताते थे। वे दलित थे। वे 1946 में पंडित नेहरु के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार में भी विधि मंत्री थे। मंडल ने पाकिस्तान में रहना इसलिए स्वीकार किया था क्योंकि जिन्ना ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि पाकिस्तान में हिन्दुओं और दलितों के हितों का ध्यान रखा जाएगा। पर मंडल की जिन्ना की 11 सितंबर,1948 में मौत के बाद पाकिस्तान में अनदेखी होने लगी। नतीजा ये हुआ कि वे पाकिस्तान को छोड़कर भारत आ गए। ये 1951 के आसपास की बातें हैं। यानी पाकिस्तान के लिए चले आंदोलन से लेकर बाद तक वहां पर पसमांदा मुसलमानों और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए कोई जगह नहीं रही।