दक्षिण विजय की अनिवार्यता

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इस क्षेत्र के विकास एवं समृद्धि के लिए हिंदू अस्मिता, विरासत का रहना जरूरी

 

अमूमन बहते हुए पता नहीं चलता कि धारा का रुख और असर क्या है। जो दूर से देखता है वही समझ पाता है पर वह न धारा को मोड़ सकता है, न ही बहते हुए को सचेत कर सकता है। राजनीति के खिलाड़ी बह रहे हैं। उनकी आंखों में केवल आज जीतने के अलावा और कुछ आजमाने की गुंजाइश नहीं है। यह भी संभावना नहीं है कि वे क.मा. मुंशी का "जय सोमनाथ" पढ़ सकें, समझें कि टीपू सुल्तान क्यों जीता था या शिवाजी के बाद मराठा साम्राज्य का पतन क्यों हुआ। आज जो स्थिति है उसमें यदि हम सिर्फ इतना भर समझ पाएं कि गजनी को रास्ता देने वाले कौन थे। जिन जाटों ने गजनी का रास्ता रोक संघर्ष किया, वे क्यों सफल न हुए और क्यों गजनी, सुल्तान गजनवी, गजनी से प्रभास पाटण और फिर लूट के सामान, गुलामों के साथ वापस प्रभास पाटण से गजनी पहुंच सका, तो बहुत कुछ संभलने, परिष्कार करने, सुधरने का मौका मिल जाएगा। दक्षिणी अलगाववाद, उत्तर-दक्षिण भेद, राजस्व के वितरण में असंतुलन के आरोपों और भाषायी नफरतों पर पलता रहा है।

 

1857 से 1947 तक का सफर नब्बे साल का है। रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, बहादुरशाह जफर, पुरबिया सैनिक, मंगल पाण्डे क्यों पैदा हुए और क्यों विफल हुए? इन नब्बे वर्षों ने स्वामी विवेकानंद, जमशेदजी टाटा, दादाभाई नौरोजी, स्वामी रामतीर्थ, दयानंद सरस्वती, लाल बाल और पाल, श्री अरविन्द, तिलक, गांधी का भारत आगमन, हेडगेवार और संघ का जन्म, सुभाष बोस, कम्युनिस्ट गद्दारी और 1946 के "डायरेक्ट एक्शन" के बाद 1947 में भारत विभाजन तथा दस लाख हिन्दुओं का संहार देखा। अभी कल की ही बात है यह। सिर्फ नब्बे वर्ष और भारत बदल गया।

 

कर्नाटक में जो देश, समाज, धर्म पर आघात कर तात्कालिक जीत की संभावनाएं तैयार करते रहे, वे वही थे, जो अपने सुख और अपनी सुरक्षा गजनवी से खरीद कर उसे रास्ता देते रहे। वे सफल न हों, वे इस बार सफल न हों, इसलिए भाजपा का जीतना जरूरी है। यह जीत न मोदी के लिए जरूरी है, न अमित शाह के लिए। यह जीत भारत के भविष्य की सुरक्षा के लिए जरूरी है। केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र, तेलंगाना, उड़ीसा... ये राज्य भारत की प्राण रेखा हैं- वैसे ही जैसे उत्तर या उस (पूर्वाञ्चल के राज्य) वहां हिंदुओं को बांटना, उनके कार्यकर्ताओं को खत्म करना, दलितों से अन्याय, उत्तर-दक्षिण का भेद बढ़ाना, विकास के नाम पर विनाश और अपार-असीम भ्रष्टाचार में जी रहे प्रदेशों के साथ आगे बढ़ सकते हैं। धन्य है यहां की जनता जो अपने दमखम, अपनी प्रज्ञा-विवेक-शक्ति के आधार पर आगे बढ़ने का उत्साह दिखा रही है।

 

बेंगलूरू किवां कर्नाटक राज्य यादवराव जोशी, हो.वे. शेषाद्रि, सूर्य नारायण राव, शान्ता अक्का, जगन्नाथ राव जोशी, कृष्णप्पा जी जैसे विराट भारतीय महापुरुषों की स्मृति से जुड़ा है। यहां सम्राट कृष्णदेव राय हुए, हरिहर बुक्का, शृंगेरीमठ, चेनम्मा की स्मृति गंध है। यहां हम्पी है-विजयनगर साम्राज्य का अपार वैभव। विश्वेश्वरैया हुए जिन्होंने पूज्य रज्जू भैया को प्रयाग विश्वविद्यालय से अपने पास और भौतिकशास्त्र में शोध के लिए आमंत्रित किया था। क्या वह कर्नाटक पुन: हम्पी विघातकों के हवाले किया जा सकता है? यह युद्ध भारत के लिए है- न कि किसी संगठन या व्यक्ति के लिए। एक बार हम भूल जाएं पारस्परिक मतभेद, ईर्ष्या, कलुष प्रतिशोध की बातें। याद रहे तो सिर्फ इतना कि यदि भारत को अखण्ड, जीवित रखना है तो उसके लिए कौन से तत्व जीवित रहने चाहिए।

 

दक्षिण हिन्दू अस्मिता, विरासत, संस्कृति और पराक्रम का क्षेत्र है। किसी भी प्रांत के मुख्य आमंत्रक विज्ञापन देख लीजिए—चाहे वे नास्तिक पार्टी के शासन में हों या अधर्मर्ी शासन में—संदेश सिर्फ एक ही मिलेगा—आइए—हमारा प्रदेश हम्पी, विजयनगर, महिषासुरमर्दिनी मन्दिर, उडुपी कृष्ण मन्दिर, श्री गुरुवायूर, श्री पद्मनामस्वामी, मीनाक्षी मंदिर, वृहदेश्वर (तंजौर) मन्दिर का प्रदेश है।

 

क्या यह आक्रोश का विषय नहीं कि यह क्षेत्र हिन्दू सभ्यता कर शिखर क्षेत्र, मन्दिरों में लूट, अनास्था और अराजकता का मानस रखने वाले नेताओं, अफसरों की अव्यवस्था का ऐसा क्षेत्र बन गया है जहां हिन्दू धार्मिक जनता को अपनी आस्था बनाए रखते हुए धर्म व जीवन व्यतीत करने में अपार बाधाओं का सामना करना पड़ता है?

 

कौन करेगा इन अव्यवस्थाओं और आघातों से रक्षा? क्या वे कर पाएंगे जिनका मानस अहिंदू संस्कारों से बंधा है? यह समय निर्णय लेकर एक नवीन भारत के उदय हेतु अपना योगदान देने का है। 1857-1947 के नब्बे वर्ष का काल यह स्मरण दिलाता है कि 1947 से 2018 तक का 71 वर्ष का समय तो बहुत थोड़ा-बहुत अपर्याप्त समय है गुलामी तथा विभाजन के तत्वों को सदैव के लिए हतबल करने का।

(लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद हैं)