''भारत का मूल स्वर है सामाजिक समरसता''
   दिनांक 14-मई-2018
गत दिनों ग्वालियर के डॉ. भगवत सहाय सभागार में सद्भावना सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में मध्य प्रदेश गोपालन एवं पशु संवर्धन बोर्ड के अध्यक्ष महामंडलेश्वर स्वामी अखिलेश्वरानंद जी महाराज उपस्थित थे। इस मौके पर उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता भारत का मूल स्वर है। सतयुग से लेेकर कलयुग तक ऋषि-मुनियों, साधु-संतों ने अपनी आध्यात्मिक परंपरा में अपने-अपने काल में सामाजिक समरसता को मुखरित किया है। स्वतंत्रता के बाद देश को नया संविधान मिला, जिसे मैं लोकतंत्र की गीता मानता हूं। संविधान में भारत को पंथनिरपेक्ष देश घोषित किया गया। ऐसा इसलिए किया गया, ताकि शासन व प्रशासन में बैठे लोग अपने धर्म, वर्ण, जाति के साथ पक्षपात और अन्य मत-पंथ, वर्ण, जाति की उपेक्षा न करें। लेकिन इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि समाज भ्रमित हो गया।
 

 
 
दुनिया में हमारे देश की जगद्गुरु, विश्वगुरु के रूप में जो पहचान थी, हमारी जीवन जीने की जो शैली थी, जो महत्वपूर्ण सूत्र, सिद्धांत थे, उन्हें हम भूलते चले गए। हमारी ऋषि परंपरा विषमता में घिरती चली गई और समाज बिखरता चला गया। लेकिन अब हमें फिर से अपनी परंपरा और संस्कृति की ओर लौटना है क्योंकि हिन्दू संस्कृति में छुआछूत को कभी स्वीकार नहीं किया गया। जिस प्रकार शबरी, केवट, निषादराज के बिना रामकथा पूर्ण नहीं है, उसी प्रकार सभी वर्ण और जातियों के बिना भारत पूर्ण नहीं है। यह सामाजिक समरसता का प्रमाण है। इस अवसर पर साध्वी परिषद की राष्ट्रीय महामंत्री साध्वी प्रज्ञा भारती ने कहा कि आज देश में चारों ओर अग्नि धधक रही है। जातिवाद और आरक्षण जैसे मुद्दों को लेकर लोगों में आक्रोश है। सभी श्रेष्ठता प्राप्त करना चाहते हैं। ऐसे में इस प्रकार के सद्भावना सम्मेलन
आवश्यक हैं।