कर्नाटक का कांटा और इतिहास में दबी कहानी...क्या मानेंगे कर्नाटक के राज्यपाल वजूभाई वाला कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की बात ?

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गुजरात में भी एक बार ऐसी ही स्थिति हुई थी तब वजूभाई वाला जो आज कर्नाटक के राज्यपाल हैं तब गुजरात भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे तब केंद्र में एचडी देवगौड़ा की सरकार थी जो कांग्रेस के समर्थन से टिकी हुई थी 22 बाइस साल बाद राजनीति के किरदार तो वही हैं, लेकिन उनकी भूमिकाएं बदल गई हैं। वजूभाला भी हैं और देवेगौड़ा भी। 22 साल पहले गेंद देवेगौड़ा के पाले में थी और आज वजुभाई वाला के... गुजरात चुनावों के नतीजे सबके सामने हैं, कांग्रेस ने सत्ता पाने के लिए आंखें बंद करके जनता दल सेक्युलर को समर्थन देने की बात भी कह दी है। एचडी देवेगौड़ा कर्नाटक की इस क्षेत्रीय पार्टी के सर्वेसर्वा हैं। अब यह राज्यपाल वजूभाई वाला के विवेक पर निर्भर करता है कि वह किसको पहले सरकार बनाने का आमंत्रण दें। भाजपा को जिसके पास बहुमत से कुछ संख्या कम है या फिर कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर के गठबंधन को जो मिलजुली सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं। क्या वजूभाई वाला सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली भाजपा को पहले मौका देंगे या फिर कांग्रेस और जद (एस) को ? इसके लिए हमें जरा कुछ सालों पीछे जाकर देखना पड़ेगा। कहते हैं इतिहास खुद का दोहराता है। गुजरात में भी एक बार ऐसी ही स्थिति हुई थी तब वजूभाई वाला जो आज कर्नाटक के राज्यपाल हैं तब गुजरात भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे।

गुजरात में भी एक बार ऐसी ही स्थिति हुई थी तब वजूभाई वाला जो आज कर्नाटक के राज्यपाल हैं तब गुजरात भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे तब केंद्र में एचडी देवगौड़ा की सरकार थी जो कांग्रेस के समर्थन से टिकी हुई थी 22 बाइस साल बाद राजनीति के किरदार तो वही हैं, लेकिन उनकी भूमिकाएं बदल गई हैं। वजूभाला भी हैं और देवेगौड़ा भी। 22 साल पहले गेंद देवेगौड़ा के पाले में थी और आज वजुभाई वाला के...

गुजरात चुनावों के नतीजे सबके सामने हैं, कांग्रेस ने सत्ता पाने के लिए आंखें बंद करके जनता दल सेक्युलर को समर्थन देने की बात भी कह दी है। एचडी देवेगौड़ा कर्नाटक की इस क्षेत्रीय पार्टी के सर्वेसर्वा हैं। अब यह राज्यपाल वजूभाई वाला के विवेक पर निर्भर करता है कि वह किसको पहले सरकार बनाने का आमंत्रण दें। भाजपा को जिसके पास बहुमत से कुछ संख्या कम है या फिर कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर के गठबंधन को जो मिलजुली सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं। क्या वजूभाई वाला सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली भाजपा को पहले मौका देंगे या फिर कांग्रेस और जद (एस) को ? इसके लिए हमें जरा कुछ सालों पीछे जाकर देखना पड़ेगा। कहते हैं इतिहास खुद का दोहराता है। गुजरात में भी एक बार ऐसी ही स्थिति हुई थी तब वजूभाई वाला जो आज कर्नाटक के राज्यपाल हैं तब गुजरात भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे।

इतिहास खुद को दोहराता है यह बात आज कर्नाटक के परिप्रेक्ष्य में बात बिल्कुल सटीक बैठ रही है। वैसे हिंदुत्व की सनातनी अवधारणा से जुड़ी एक मान्यता भी इस कहावत के सटीक बैठती है। यह मान्यता है कि आपने जो भी कर्म किए हैं, उनका हिसाब भी यहीं यानी इसी धरती पर इसी जन्म में पूरा करके जाना है।

आखिर इस कहावत और मान्यता की इस समय चर्चा क्यों...इसकी वजह है कर्नाटक की राजनीतिक घटनाएं। कर्नाटक में सत्ता पर कब्जे को लेकर कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर के चुनाव बाद वाला गठबंधन जिस तरह उतावला है, वह एक तरह से गुजरात के इतिहास का ही दोहराव है।

ठीक 22 साल पहले गुजरात में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी। तब वजुभाई वाला राज्य भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष थे, जबकि गुजरात के मुख्यमंत्री थे सुरेश भाई मेहता। गुजरात भाजपा में तब शंकर सिंह बाघेला की अगुआई में विधायकों के एक गुट ने विद्रोह कर दिया। सुरेश मेहता और वजुभाई वाला अपनी सरकार का बहुमत साबित करने के लिए गुजरात के तत्कालीन राज्यपाल मध्य प्रदेश निवासी कृष्णपाल सिंह से मोहलत मांग रहे थे। गुजरात भाजपा अध्यक्ष के नाते वजुभाई वाला का तर्क था कि सरकार के बहुमत का परीक्षण विधानसभा के पटल पर ही होना चाहिए। लेकिन तब केंद्र में कांग्रेस के समर्थन से चल रही एचडी देवेगौड़ा की सरकार थी। वह प्रधानमंत्री थे। उनकी सरकार कांग्रेस की मजबूत बैसाखी पर टिकी हुई और कांग्रेस नहीं चाहती थी कि गुजरात में सुरेश मेहता की अगुआई वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार चले। लिहाजा उसने केंद्र सरकार को इशारा कर दिया था कि वह किसी भी कीमत पर मेहता सरकार को अपना बहुमत साबित करने का मौका न दे। शंकर सिंह बाघेला बेशक अब कांग्रेस छोड़ चुके हैं, लेकिन इतिहास जानता है कि उन्होंने कांग्रेस की शह पर ही भारतीय जनता पार्टी से विद्रोह किया था। बहरहाल केंद्र सरकार के इशारे पर राज्यपाल कृष्णपाल सिंह ने मेहता सरकार को बहुमत साबित करने का मौका नहीं दिया। उन्होंने केंद्र सरकार को राज्य में संवैधानिक संकट होने की रिपोर्ट भेज दी। इस रिपोर्ट को तत्कालीन देवेगौड़ा सरकार ने स्वीकार करने में जरा सी भी देर नहीं लगाई और 19 सितंबर 1996 को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। जैसे ही हालात कांग्रेस के अनुसार हुए , शंकर सिंह बाघेला के बहुमत लायक विधायक जुटा लिए गए और राज्य में संवैधानिक संकट खत्म हो गया। यह तारीख राष्ट्रपति शासन लागू होने के सिर्फ 34 दिनों बाद ही आ गई और 23 अक्टूबर 1996 को शंकर सिंह बाघेला को देवेगौड़ा सरकार के इशारे पर राज्यपाल कृष्णपाल सिंह ने शपथ दिला दी।

अहमदाबाद के अंग्रेजी पत्रकार परिमल सिंह कहते हैं, कर्नाटक में गुजरात का दोहराव हो रहा है। अब देवेगौड़ा जी को समझ में आ रहा होगा कि सरकार के बहुमत साबित करने का मौका मिलने या ना मिलने के बीच की राजनीति का दर्द क्या होता है?

कर्नाटक की मौजूदा और गुजरात की अतीत जैसी समान घटनाओं के ही चलते शायद राजनीति को विडंबनाओं का खेल कहा जाता है। बाइस साल बाद राजनीति के किरदार तो वही हैं, लेकिन उनकी भूमिकाएं बदल गई हैं। वजूभाला भी हैं और देवेगौड़ा भी। 22 साल पहले गेंद देवेगौड़ा के पाले में थी और आज वजुभाई वाला के...

कर्नाटक की मौजूदा और गुजरात की अतीत जैसी समान घटनाओं के ही चलते शायद राजनीति को विडंबनाओं का खेल कहा जाता है। बाइस साल बाद राजनीति के किरदार तो वही हैं, लेकिन उनकी भूमिकाएं बदल गई हैं। वजूभाला भी हैं और देवेगौड़ा भी। 22 साल पहले गेंद देवेगौड़ा के पाले में थी और आज वजुभाई वाला के...