सरकार किसी की भी बने पर ये पांच बातें साफ हैं
   दिनांक 17-मई-2018
कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणामों की घोषणा के बाद बहुमत की फांस कईयों के दिलों की धड़कनें बढ़ाए हुए है। कृपया शांत हो जाइए! जनता ने जो करना था कर दिया। परिणाम से जो संदेश निकलना था वह एकदम साफ है। बाकी काम आप राज्यपाल और राजनेताओं पर छोड़ दीजिए क्योंकि वे नेतृत्वकर्ता, निर्णायक और अपने काम में सिद्धहस्त हैं। आनेवाली सरकार जो भी हो इन नतीजों से जो बातें साफ हो गर्इं उन्हें क्रमवार ढंग से समझना जरूरी है। कर्नाटक को लेकर पाञ्चजन्य संपादक हितेश शंकर का विश्लेषण :—
कांग्रेस अब वो कांग्रेस नहीं रही
एक ऐसी राजनैतिक शक्ति जो दशकों तक निर्णायक रही अब मानना चाहिए की चुक गई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1964 तक जवाहरलाल नेहरू का एकछत्र मंच, इसके आगे खासकर (1969 से 1973 तक) इंदिरा को मजबूती का प्रतीक बताने वाली पार्टी अब इतिहास में कर्नाटक की ‘मजबूरी’ के प्रतीक के तौर पर जानी जाएगी। नतीजों के और जो भी आकलन हों सबसे साफ बात यह है कि yeddyurappa को कर्नाटक के आंकड़ों ने हाशिए पर ला छोड़ा है।
विभाजक राजनीति की इसलिए जनता ने नकारा
विभाजक राजनीति को कर्नाटक ने जोरदार झटका दिया है। गुजरात के बाद कर्नाटक (वाया भीमा कोरेगांव और सोशल मीडिया के जरिए भारत बंद) की राह पकड़ने वाली हिन्दू विभाजक राजनीति के लिए यह नतीजे आईने की तरह साफ हैं। लिंगायत समाज में फांक पैदा करने की चाल कांग्रेस के लिए ही फांस साबित हुई यह कहने में हर्ज नहीं।सामाजिक विभाजन की ओर इंगित करने के नतीजे भाजपा के लिए अच्छे रहे हैं। विश्लेषकों के अनुसार लिंगायत समुदाय के प्रभाव क्षेत्र वाली 62 सीटों में जहां भाजपा को पहले जहां 28 सीटें प्राप्त थीं वहीं इन नतीजों के बाद इनकी संख्या बढ़कर 40 पहुंच गई है।
अनुसूचित जाति/जनजातियों को पत्ते की तरह नहीं फेंट सकते !
कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) दोनों की नजर इस हिंदू समाज के इस वर्ग को रिझाने पर पर थी। जनता दल ने इसके लिए जहां बहुजन समाज पार्टी से हाथ मिलाया वहीं कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया तो इसके लिए किसी भी हद से गुजर जाने को तैयार थे। कर्नाटक की राजनीति से जुड़ा यह दिलचस्प तथ्य है कि 1985 के बाद से यहां किसी पार्टी को दोबारा सरकार बनाने में सफलता नहीं मिली। सिद्धारमैया यह अभिशाप तोड़ना चाहते थे इसके लिए उन्होंने प्रतीक भी ठीक चुना- डी. देवराज उर्स।
अनुसूचित जाति/जनजाति के उत्थान लिए संवेदनशीलता से काम करने के लिए याद किए जाने वाले उर्स कर्नाटक के ऐसे मुख्यमंत्री थे जिन्हें लगातार दो कार्यकाल और जनता का भरपूर प्यार मिला। सिद्धारमैया इसी ‘फ्रेम’ में खुद को ‘फिट’ कर लेना चाहते थे। किन्तु जनता दल को माया की दोस्ती और सिद्धारमैया को धो-पोंछकर चमकाई गई छवि, वह कुछ न दिला सके जिसकी उन्हें आस थी। इस पैंतरे में निहत खतरे सिद्धारमैया समझ रहे थे और इसीलिए वह एक की बजाय दो सीटों से चुनाव लड़े किन्तु चामुंडेश्वरी सीट पर वह बुरी तरह धो दिए गए और बादामी सीट से करीब 1700 वोटों से दम फुलाने वाली जीत ही उन्हें नसीब हुई।
वोक्कालिंगा, दलित और कन्नड़ तालमेल की जिस कॉकटेल ( V-O-D-KA : Vokkaliga, dalit & Kannada ) का खुमार जेडीएस और बसपा नेता चुनाव पूर्व से महसूस कर रहे थे वह 16 सीटों पर हांफते उम्मीदवारों को मिले नाममात्र वोटों ने उड़ा दिया।
जानकारों के अनुसार, अनुसूचित जाति/जनजाति के मतदाताओं ने सिद्धारमैया की अगुआई वाली कांग्रेस और मायावती-देवगौड़ा के तालमेल को जिस तरह ठेंगा दिखाया है वह भविष्य की राजनीति का संकेत और इस वर्ग की राष्ट्रीय आग्रहों के प्रति सकारात्मक चेतना का द्योतक है। ध्यान देने वाली बात है कि उपरोक्त समुदाय के प्रभाव वाले जिन क्षेत्रों में भाजपा को रोकने के लिए घोषित-अघोषित समझ का दावा किया जा रहा वहां भाजपा पूर्व की 23के मुकाबले 28 सीटें जुटाने में कामयाब रही।
कांग्रेस को राज्यभर में ज्यादा समर्थन की बात झूठ
निश्चित ही यह चौथी बात उपरोक्त तीनों बातों से ज्यादा दिलचस्प है। नतीजे आने पर सब साफ दिख रहा है किन्तु यह बारीक बात यहां भी दबी रह गई है। भाजपा के मुकाबले मत प्रतिशत में बारीक अंतर पूरे चुनाव के मत प्रतिशत का सकल योग हो सकता है किन्तु राज्य में सीटों के स्तर पर जनादेश का विभाजन करते हुए देखें तो यह तिलिस्म टूट जाता है।कांग्रेस को कुछ सीटों पर एकमुश्त वोट मिले हैं बाकी राज्य में पार्टी छीजन का शिकार है। जबकि भाजपा को इसके मुकाबले पूरे राज्य में जोरदार समर्थन मिला है और उसका प्रदर्शन (अपवादों को छोड़कर) खास क्षेत्र, ब्लॉक या बसाहट के मुकाबले ज्यादा समावेशी और राज्यव्यापी है।
मुस्लिम बहुल इलाकों में भी भाजपा भारी
इस पहेली में गुंथी एक और पहेली कांग्रेस का सिरदर्द और भविष्य की राजनीति का संकेत हो सकती है। बिदर, रायचूर, बीजापुर और गुलबर्गा जैसी कुछ भारी मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों पर यह संकेत उभरा है। यह ऐसी सीटें हैं जहां कांग्रेस को थोक वोट की उम्मीद थी, लेकिन उनकी यह उम्मीद भाजपा के दमदार प्रदर्शन से धराशाई हुई है। बीजापुर सिटी से भाजपा के बसनगौड़ आर पाटिल का पचास प्रतिशत वोट लेते हुए कांग्रेस के अब्दुल हमीद मुशरिफ को हराना इस संकेत को साफ करने के लिए काफी है। रायचूर सीट से भाजपा के डॉ. शिवराज पाटिल को करीब 46 प्रतिशत मत मिलना और कांग्रेस के सैयद यासीन का 36 फीसदी पर सिमट जाना काफी कुछ कहता है। इसी तरह तुमकुर विधानसभा से भाजपा को 35 प्रतिशत से ज्यादा मत प्राप्त हुए हैं जबकि कांग्रेस के रफीक अहमद 30 फीसद वोट जुटा सके। युवा मुस्लिमों के प्रगतिशील सवालों पर चुप्पी और तीन तलाक जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर दकियानूसी रुख मुस्लिम समाज के भीतर कांग्रेस के प्रति प्रेम में दरार पैदा करने वाले कारक हो सकते हैं। जाहिर है इससे इनकार कांग्रेस को आने वाले दिनों में और भारी पड़ने वाला है। कर्नाटक के लिए अलग झंडे, हिन्दी के प्रति नाहक दुराग्रह और समाज समुदाय को बांटने की चाल चलते हुए कांग्रेस मुंह के बल जा गिरी है।