क्या आधी रात को न्यायालय के दरवाजे आम आदमी के लिए भी खुल सकते हैं ?
   दिनांक 18-मई-2018
जी हां कानून अनुसार ऐसा संभव है लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं, देश के इतिहास में आम नहीं केवल कुछ खास मामलों पर सुनवाई के लिए तीन बार सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खोले गए, इसके अलावा रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद के बाद न्यायमूर्ति एम एन वेंकटचलैया के घर पर ही अदालत लगी थी। एक तरफ जहां अदालतों में लंबित पड़े मामलों का ढेर है वहीं हाईप्रोफाइल मामलों में रात को भी सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खुल जाते हैं। कानून में रात को सुनवाई का क्या प्रावधान है ? क्या कभी आदमी के लिए भी रात को अदालत खुली ? देशभर की अदालतों में लंबित पड़े मामले कितने हैं ? इन सब बिंदुओं पर पाञ्चजन्य की विशेष रिपोर्ट:—




सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में 16 मई 2018 को यह पहला मौका नहीं था जब आधी रात में अदालत लगाई गई और किसी मामले को सुना गया हो। यह तीसरी बार हुआ जब रात को सुप्रीम कोर्ट खोलकर अदालत लगाई गई थी।  इससे पूर्व 1985 में एक कारोबारी की जमानत और 2015 में मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की फांसी पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर आधी रात में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी।  ध्यान देने वाली बात यह है कि तीनों बार रात में अदालत किसी आम जन के लिए नहीं खुली। रात को केवल खास लोगों के लिए अदालतें खोली गईं और उनकी सुनवाई हुई। यह सही है कि कई बार अदालतों को रात में भी काम करने की चर्चाएं होती हैं लेकिन उसका उद्देश्य लंबित पड़े मामलों को जल्द से जल्द निपटाना होता है। यह देश के इतिहास में पहली बार है कि किसी राज्य में सरकार बनाने को लेकर रात को कोई सुप्रीम कोर्ट के दर पर पहुंंचा।

इस बार अदालत रात में खुलने की वजह थी कर्नाटक में राज्यपाल द्वारा भाजपा को सरकार बनाने का न्यौता देने के खिलाफ कांग्रेस की याचिका। हालांकि कांग्रेस इसमें सफल नहीं हो सकी। तीन जजों न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति एके सीकरी और न्यायमूर्ति ए बोबड़े ने राज्यपाल के न्यौते और भाजपा के बीएस येद्दयुरप्पा के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण समारोह पर रोक लगाने से साफ इन्कार कर दिया, लेकिन कोर्ट ने उनकी बात पूरी सुनी।

क्या हुआ उस दिन

—बुुधवार देर रात सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया।
—रात एक बजे मुख्य न्यायाधीश ने मामले की सुनवाई के लिए 3 जजों की बेंच गठित की गई
— 2.10 बजे से सुनवाई शुरू हुई। तड़के 5.30 बजे तक चली


वही सिंघवी दे रहे थे न्यायालय में दलीलें जिनकी सीडी पर हुआ था बवाल

देश सो रहा तब सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस नेता व वकील अभिषेक मनु सिंघवी द्वारा दलीलों का दौर जारी था। यह वहीं सिंघवी हैं जिनकी मीडिया में एक महिला के साथ अश्लील सीडी सामने आने के बाद बवाल हुआ था, बाद में यह खुद उस सीडी को दिखाने पर रोक लगाने के लिए कोर्ट पहुंच गए थे।

1985 में कारोबारी थापर को रात को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दी थी

साल 1985 में कड़े फेरा कानून के तहत आरोपित प्रमुख कारोबारी एल एम थापर की जमानत याचिका पर सुनवाई करने के लिए मध्यरात्रि के बाद शीर्ष अदालत के दरवाजे खोले गए थे। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की बहुत आलोचना हुई थी क्योंकि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ई एस वेंकटरमैया ने मध्यरात्रि में उद्योगपति एल एम थापर को जमानत दी थी। ध्यान दें एलएम थापर भी कोई आम आदमी नहीं थे बल्कि बड़े कारोबारी थे।

2015 में 12 वकील पहुंचे थे आतंकी याकूब की फांसी रुकवाने



29 जुलाई 2015 को आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुला था। कारण था मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की याचिका। सुप्रीम कोर्ट, राज्यपाल और बाद में राष्ट्रपति से मेमन की दया याचिका खारिज होने के बाद फांसी से ठीक पहले आधी रात को जाने-माने वकील प्रशांत भूषण समेत 12 वकील मुख्य न्यायाधीश के घर पहुंचे थे। उन्होंने याकूब मेमन की फांसी पर रोक लगाने की मांग की। उसके बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एच एल दत्तू ने वर्तमान मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई में तीन जजों की पीठ गठित की थी। इसके बाद देर रात को ही जज सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और मामले की सुनवाई शुरू हुई। तीन बजकर 20 मिनट पर शुरू हुई सुनवाई 90 मिनट तक चली थी। तीन जजों की इस बड़ी पीठ ने याकूब की फांसी की सजा को बरकरार रखा था।

यह दो मामले भी रात में पहुंचे थे अदालत


अयोध्या में रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद के बाद छह और सात दिसंबर 1992 की रात को न्यायमूर्ति एम एन वेंकटचलैया के घर पर मध्यरात्रि के बाद भी सुनवाई हुई थी। इस मामले में कारसेवकों द्वारा विवादित ढांचा गिराने के बाद अयोध्या विवाद का एक पक्ष तुरंत शीर्ष अदालत पहुंच गया था। अपने घर सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति वेंकटचलैया की अध्यक्षता वाली पीठ ने निर्देश दिया कि विवादित स्थल पर यथास्थिति कायम रखी जाए। इसके अलावा दिसंबर 2015 निर्भया मामले में दोषी नाबालिग को रिहा करने पर रोक लगााने की मांग करते हुए महिला आयोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तो खुले लेकिन सुनवाई नहीं हुई थी।

अदालतों में जजों और लंबित पड़े मामलों की स्थिति

देशभर की अदालतों में जजों के 6379 हजार पद खाली हैं। वहीं देशभर की अदालतों में 2.60 करोड़ मामले लंबित पड़े हुए हैं। सबसे अधिक यूपी की अदालतों में 60 49 151 केस लंबित हैं।

रात में सुनवाई के लिए तात्कालिकता का क्या नियम है ?

सुप्रीम कोर्ट के वकील देवेंद्र कुमार ने इस बारे में बताया कि रात में सुनवाई तात्कालिकता के आधार पर होती है। ऐसा कोई मामला जिसे रात में नहीं सुना गया तो आपके पास कुछ घंटों बाद उस मामले में कानूनी अधिकारों के इस्तेमाल का समय ही नहीं बचेगा। उदाहरण के तौर पर आपको शाम को कोई नोटिस या आदेश (घर तोड़ने, फांसी देने ) आदि का मिलता है जिसका अनुपालन कुछ घंटों के भीतर सुबह अदालत खुलने से पहले तक होना है तो आप रात में अदालत के समक्ष जा सकते हैं। क्योंकि सुबह आदेश पालन होने के बाद उसके खिलाफ सुनवाई का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा। इसके आगे वह बताते हैं कि केस की तात्कालिकता कोर्ट रजिस्ट्रार तय करते हैं, कोर्ट व्यक्ति याचिका दायर करेगा तो पहले रजिस्ट्रार की उसके मैरिट देखेंगे। इसके बाद मुख्य न्यायधीश को इस बारे में सूचित करेंगे। मुख्य न्यायधीश उस पर आखिरी फैसला लेंगे की वह सुनने योग्य है या नहीं। फिर सुनवाई के लिए जजों की पीठ का गठन व समय तय होता है। यह कानून आम जनता या वीआईपी सभी पर एक सामान लागू है। यहां एक बात गौर करने वाली यह भी है कि सुनवाई के बाद कोर्ट को यह लगा कि याची ने अदालत का समय बर्बाद किया है तो उस पर कोर्ट जुर्माना भी लगा सकती है।

निचली अदालतों में भी हैं प्रावधान


कानून विशेषज्ञ व वकील मनीष भदौरिया ने बताया कि आम जनता के लिए प्रत्येक निचली अदालतों में कोर्ट बंद होने यानि शाम चार बजे से अगले दिन सुबह 10 बजे कोर्ट खुलने के समय तक एक ड्यूटी एमएम की तैनाती होती है जो तात्कालिकता के आधार पर रात में आने वाले मामलों को सुनता है और संविधान में मौजूद अपने अधिकारों के अनुसार फैसला लेता है। हालांकि वहां पर ऐसी स्थिति नहीं आती क्योंकि यदि निचली अदालतों के फैसलों के खिलाफ वादी के पास अपने कानूनी अधिकारों को इस्तेमाल करने का पर्याप्त समय होता है।