यह भी भी बीत जाएगा
   दिनांक 18-मई-2018
ओशो अपने भक्तों को बड़ी प्रसिद्ध सूफी कहानी सुनाते थे। एक सम्राट ने अपने सारे बुद्धिमानों को बुलाया और उनसे कहा- ‘मैं कुछ ऐसे सूत्र चाहता हूं, जो छोटा हो, बड़े शास्त्र नहीं चाहिए, मुझे फुर्सत भी नहीं बड़े शास्त्र पढ़ने की। वह ऐसा सूत्र हो जो एक वचन में पूरा हो जाए और जो हर घड़ी में काम आये। दुख हो या सुख, जीत हो या हार, जीवन हो या मृत्यु सब में काम आये, तो तुम लोग ऐसा सूत्र खोज लाओ।’
उन बुद्धिमानों ने बड़ी मेहनत की, बड़ा विवाद किया कुछ निष्कर्ष नहीं हो सका। वे आपस में बात कर रहे थे। एक ने कहा- ‘हम बड़ी मुश्किल में पड़े हैं बड़ा विवाद है, संघर्ष है, कोई निष्कर्ष नहीं हो पाया, हमने सुना है एक सूफी फकीर गांव के बाहर ठहरा है क्यों न हम उसी के पास चलें?’

वे लोग उस सूफी फकीर के पास पहुंचे। उसने एक अंगूठी पहन रखी थी। अपनी अंगुली से वह निकालकर सम्राट को दे दी और कहा- ‘इसे पहन लो। इस पत्थर के नीचे एक छोटा सा कागज रखा है उसमें सूत्र लिखा है वह मेरे गुरु ने मुझे दिया था। मुझे तो जरूरत भी न पड़ी इसलिए मैंने अभी तक खोलकर देखा भी नहीं।’
उन्होंने एक शर्त रखी थी कि ‘जब कुछ उपाय न रह जाएं, सब तरफ से निरुपाय हो जाओ, तब इसे खोलकर पढ़ना। ऐसी कोई घड़ी न आयी उनकी बड़ी कृपा है इसलिए मैंने इसे खोलकर पढ़ा नहीं, लेकिन इसमें जरूर कुछ राज होगा आप रख लो। लेकिन शर्त याद रखना इसका वचन दे दो कि जब कोई उपाय न रह जाएगा सब तरफ से निरूपाय असहाय हो जाओगे तभी अंतिम घड़ी में इसे खोलना।’

क्योंकि यह सूत्र बड़ा बहुमूल्य है अगर इसे साधारणत: खोला गया तो अर्थहीन होगा। सम्राट ने अंगूठी पहन ली, वर्षों बीत गये कई बार जिज्ञासा भी हुई फिर सोचा कि कहीं खराब न हो जाए, फिर काफी वर्षों बाद एक युद्ध हुआ जिसमें सम्राट हार गया, और दुश्मन जीत गया। उसके राज्य को हडप लिया।

वह सम्राट एक घोड़े पर सवार होकर अपनी जान बचाने के लिए भाग निकला। राज्य तो गया संगी साथी, दोस्त, परिवार सब छूट गये, दो-चार सैनिक और रक्षक उसके साथ थे। वे भी धीरे-धीरे हट गये क्योंकि अब कुछ बचा ही नहीं था तो रक्षा करने का भी कोई सवाल न था।

दुश्मन उस सम्राट का पीछा कर रहा था, तो सम्राट एक पहाड़ी घाटी से होकर भागा जा रहा था। उसके पीछे घोड़ों की आवाजें आ रही थीं। टापें सुनाई दे रही थीं। प्राण संकट में थे, अचानक उसने पाया कि रास्ता समाप्त हो गया, आगे एक बड़ा गड्ढा था। वह लौट भी नहीं सकता था, एक पल के लिए सम्राट स्तब्ध खड़ा रह गया कि क्या करें ?
फिर अचानक याद आयी। खोली अंगूठी, पत्थर हटाया, निकाला कागज। उसमें एक छोटा सा वचन लिखा था- यह भी बीत जाएगा। सूत्र पढ़ते ही उस सम्राट के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी। उसके चेहरे पर एक बात का ख्याल आया सब तो बीत गया, मैं सम्राट न रहा, मेरा साम्राज्य गया, सुख बीत गया, जब सुख बीत जाता है तो दुख भी स्थिर नहीं हो सकता।’

शायद सूत्र ठीक कहता है अब करने को कुछ भी नहीं है। लेकिन सूत्र ने उसके भीतर कोई सोया तार छेड़ दिया। कोई साज छेड़ दिया। यह भी बीत जाएगा ऐसा बोध होते ही जैसे सपना टूुट गया। अब वह व्यग्र नहीं, बेचैन नहीं, घबराया हुआ नहीं था। वह बैठ गया।

संयोग की बात थी, थोड़ी देर तक तो घोडे की टाप सुनायी देती रहीं फिर टाप बंद हो गयी, शायद सैनिक किसी दूसरे रास्ते पर मुड़ गये। घना जंगल और बीहड़ पहाड़। उन्हें पता नहीं चला कि सम्राट किस तरफ गया है। धीरे-धीरे घोड़ों की टाप दूर हो गयी, अंगूठी उसने वापस पहन ली।

कुछ दिनों बार दोबारा उसने अपने मित्रों को वापस इकठ्ठा कर लिया, फिर उसने वापस अपने दुश्मन पर हमला किया। पुन: जीत हासिल की। फिर अपने सिंहासन पर बैठ गया। जब सम्राट अपने सिंहासन पर बैठा तो बड़ा आनंदित हो रहा था।

तभी उसे फिर पुन: उस अंगूठी की याद आयी उसने अंगूठी खोली कागज को पढ़ा, फिर मुस्कुराया दोबारा। सारा आनन्द, विजय का उल्लास, विजय का दंभ सब विदा हो गया। उसके वजीरों ने पूछा- ‘आप बड़े प्रसन्न थे। अब एक दम शांत हो गये। क्या हुआ ?’

सम्राट ने कहा- ‘जब सब कुछ बीत जाएगा तो इस संसार में न तो दुखी होने को कुछ है और न ही सुखी होने को कुछ है। तो जो चीज तुम्हें लगती है कि बीत जाएगी उसे याद रखना। अगर यह सूत्र पकड़ में आ जाए, तो और क्या चाहिए? तुम्हारी पकड़ ढीली होने लगेगी। तुम धीरे-धीरे अपने को उन सब चीजों से दूर पाने लगोेगे जो चीजें बीत जाएंगी... क्या अकड़ना, कैसा गर्व, किस बात के लिए इठलाना, सब बीत जाएगा। यह जवानी बीत जाएगी ।

याद बन-बन के कहानी लौटी, सांस हो-हो के वीरानी लौटी, लौटे सब गम जो दिये दुनिया ने, मगर न जाकर जवानी लौटी। यह सब बीत जाएगा। यह जवानी, यह दो दिन की इठलाहट, यह दो दिन के लिए तितलियों जैसे पंख- ये सब बीत जाएंगे। यह दो दिन की चहल-पहल फिर गहरा सन्नाटा, फिर मरघट की शान्ति।