लोकतंत्र में चर्च की दखलअंदाजी क्यों ?
   दिनांक 23-मई-2018
 चर्च देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में दखल देने लगा है। दिल्ली के आर्कबिशप अनिल काउटो का सभी पादरियों को पत्र लिखना और वेटिकन की वेबसाइट द्वारा उसका समर्थन करना इस बात को साबित करता है कि देश में चर्च हिंदू समाज के खिलाफ एक बड़ी साजिश में जुटा है
लोकतंत्र के मायने क्या हैं ? लोकतंत्र के मायने हैं जहां व्यक्ति अपनी मर्जी से जिसे चाहे उसे वोट दे। जहां लोगों द्वारा चुने गए प्रतिनिधि मिलकर सरकार चलाएं उस तंत्र को लोकतंत्र कहा जाता है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के खिलाफ आज साजिश रची जा रही है। चर्च देश में किस तरह से लोकतंत्र में दखल दे रहा है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली के आर्कबिशप अनिल काउटो ने जो पत्र लिखा वेटिकन न्यूज ने उसका समर्थन करते हुए अपनी वेबसाइट पर इस संबंध में आर्टिकल भी डाला है।
https://www.vaticannews.va/en/church/news/2018-05/india-delhi-archdiocese-prayer-fast-campaign-couto.html

विश्व हिंदू परिषद ने आर्कबिशप के पत्र की आलोचना करते हुए इसे भारत की धर्मनिरपेक्षता पर चर्च का सीधा हमला करार दिया है। वीएचपी के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने आरोप लगाया कि यह रोमन कैथलिक चर्च के मुख्यालय वेटिकन का सीधा हस्तक्षेप और धर्म के आधार पर भारत को बांटने की कोशिश है क्योंकि इन बिशप को पोप नियुक्त करते हैं। उनकी जवाबदेही भारत के प्रति नहीं बल्कि पोप के प्रति है।
क्या देश में अब चर्च तय करेगा कि किसको वोट देना है ? किसको वोट नहीं देना है ? उल्लेखनीय है कि चर्च पर कन्वर्जन करने के हमेशा से आरोप लगते रहे हैं, लेकिन अब चर्च देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी दखल देने लगा है। ताजा मामले में नई दिल्ली के आर्कबिशप अनिल काउटो की विवादास्पद चिट्ठी सामने आने के बाद एक नया विवाद शुरू हो गया है। जो उन्होंने तमाम पादरियों को लिखी है। आर्कबिशप ने ईसाई समुदाय से 2019 के लोकसभा चुनाव में नई सरकार के लिए विशेष प्रार्थना करने की भी बात लिखी है माना जा रहा है कि परोक्ष रूप से आर्कबिशप ने वर्ष 2019 में नरेंद्र मोदी सरकार नहीं बने, इसके लिए लोगों से दुआ करने की अपील की है। वेटिकन ने अपनी वेबसाइट पर खबर लिखकर आर्कबिशप की चिट्ठी पर मुहर लगा दी है जिससे यह पुष्ट होता है कि चर्च एक साजिश के तहत देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में दखल दे रहा है। यह कोई पहला मामला नहीं है इससे पहले भी गोवा के ईसाई चर्च द्वारा प्रकाशित पत्रिका में एक लेख छपा था जिसमें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार वाली मौजूदा सरकार की तुलना नाजीवाद से की गई थी। ऐसा ही मामला गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले भी आया था जब गांधीनगर के आर्चडायोसिस आर्चबिशप ने एक पत्र लिख कर ईसाई समुदाय के लोगों से देश को ‘सांप्रदायिक ताकतों’ से बचाने की अपील करते हुए कहा था कि अल्पसंख्यकों के बीच ‘असुरक्षा की बढ़ती भावना’ के बीच देश का ‘लोकतांत्रिक ताना बाना’ दाव पर है । इसी तरह पूर्वोत्तर के विधानसभा चुनाव के मतदान को लेकर नागालैण्ड के बैपटिस्ट चर्च ने एक खुला पत्र लिख कर कहा था कि लोग भाजपा का विरोध करें क्योंकि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक शाखा है। आज चर्च द्वारा देश में सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने की कोशिश की जा रही है लेकिन इस पर कथित सेकुलर लॉबी के लोग कुछ भी बोलने से बच रहे हैं। इस विषय पर समाज में विमर्श खड़ा करने की जरूरत है।