पुलिस फायरिंग नहीं करती तो कोई जिंदा नहीं बचता
   दिनांक 23-मई-2018

तुतुकुड़ी में बरपाई गयी हिंसा और आगजनी की मौके से आंखों देखी रपट जिलाधिकारी कार्यालय में काम करने वाली एक महिलाकर्मी की दिल दहलाने वाली दास्तान....

 

(पाञ्चजन्य ब्यूरो )
रोज की तरह 22 मई की सुबह 8.30 बजे बच्चों का नाश्ता और दोपहर का खाना बनाकर अपने दफ्तर के लिए निकली थी। 9.45 बजे के आसपास जब मैं दफ्तर में दाखिल हुई तो वहां जिलाधिकारी कार्यालय के गेट पर करीब दो सौ पुलिस वाले पहरेदारी पर थे। एक महिला पुलिसकर्मी ने मुझे रोककर मेरा पहचान पत्र मांगा। उसकी जांच करने के बाद उसने मुझे दफ्तर के अंदर जाने दिया। सिर्फ मेरी ही नहीं, हमारे दफ्तर में आने वाले हरेक आदमी को जांच के बाद ही दफ्तर के अंदर आने दिया जा रहा था। हम समझ गये कि जांच और पूछताछ तुतुकुड़ी और आसपास के गांवों में स्टरलाईट मुद्दे पर 'घेराव' करने की घोषणा करने वाले प्रदर्शकारियों की वजह से की जा रही थी।
रोजाना की तरह हम सुबह 11.10 बजे चाय पीने के लिए कैंटीन की तरफ गये। उस वक्त हमने कई पुलिसवालों को अंदर की तरफ बहुत तेजी से भागकर आते देखा। उनके चेहरों पर डर साफ झलक रहा था। उनपर पत्थर बरसाये जा रहे थे। उन्हें निशाना बनाकर हजारों की तादाद में पत्थर फेंके जा रहे थे। हम हैरान थे और क्या करें, क्या न करें की हालत में जिलाधिकारी कार्यालय के अंदर चले गये। इसके बाद 20,000 से ज्यादा, जी हां, 20,000 से ज्यादा प्रदर्शनकारी घातक हथियार, लाठियां, लोहे की छड़ें, शीशे की बोतलें और पेट्रोल बम लेकर कार्यालय के परिसर में घुस आये। भीषण उग्रता और हिंसक हाव भाव के साथ उन्होंने पुलिसवालों के, कार्यालय के और वहां काम करने वाले हम लोगों के वाहनों को तोड़ना शुरू कर दिया। वे बेलगाम और ज्यादा हिंसक होने लगे थे। सुरक्षा के लिए वहां तैनात 100 से ज्यादा नौजवान पुलिसकर्मियों ने उनका मुकाबला किया, उन्हें काबू करके तितर-बितर करने की कोशिश की।
चूंकि बेकाबू प्रदर्शनकारी हजारों की संख्या में थे इसलिए गिनती में कम पुलिस वाले उनका सामना नहीं कर पाये। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर बर्बर हमला बोल दिया था। इसलिए पुलिस वाले भी अपनी जान बचाकर भागने को मजबूर थे। इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने जिलाधिकारी कार्यालय में खड़े सभी वाहनों को देखते ही देखते आग केे हवाले कर दिया। पूरा कार्यालय धूंए में घिर गया। कार्यालय धूंए के गुबार में घिरा जंग का मैदान जैसा लग रहा था। इस बीच प्रदर्शनकारी भीड़ में जिलाधिकारी कार्यालय के दरवाजों को लोहे की छड़ों और पत्थरों से पीटना शुरू कर दिया। दरवाजे टूट गये, उग्र भीड़ कार्यालय के अंदर दाखिल हो गयी। हिंसक भीड़ को देखकर हम सब इतने डर गये कि चीखने-चिल्लाने लगे। हमें अपनी जान पर खतरा महसूस हुआ। उग्र प्रदर्शकारियों ने वहां तैनात एक महिला पुलिसकर्मी पर हमला बोल दिया। उन्होंने उसकी कमीज फाड़ी और उसे छूते हुए उसके साथ अश्लील हरकतें करने की कोशिश की। डर के मारे वह चीख कर एक तरफ भागी और अपने शरीर को फटी कमीज से ढकने की कोशिश करने लगी। (बाद में घर लौटकर मैंने यह वाकया अपने पति को सुनाया तो मेरी आंखों से भी आंसू बह निकले थे)
कार्यालय में घुस आये प्रदर्शनकारियों ने कार्यालय को आग लगानी शुरू कर दी। लगभग उसी वक्त लगभग 100 पुलिस वाले देवदूत की तरह वहां आये। कार्यालय में घुसते ही उन्होंने लकड़ी की बंदूक जैसी छड़ से चार बार आसमान की तरफ निशाना साधकर धमाके किये। धमाकों की आवाज बिल्कुल ही थी जैसी दीवाली के पटाखों से आती है। ये धमाके सुनकर प्रदर्शनकारी पुलिस पर घातक हथियारों से चोट करते हुए और पत्थर बरसाते हुए कार्यालय से बाहर की तरफ भागे। उस मौके पर पुलिसवालों के पास प्रदर्शनकारी भीड़ को काबू करने के लिए जब कोई चारा नहीं बचा तो उन्हें गोलियां चलानी पड़ी। कार्यालय से बाहर निकलकर भीड़ एक चौराहे की तरफ भागी। इस बीच प्रदर्शनकारियों के दो अन्य जत्थों ने जिलाधिकारी कार्यालय पर पीछे से हिंसक हमला कर दिया था। इस हमले में 10 से ज्यादा पुलिसवालों के सिर में चोट आयी और खून बहने लगा। यह हमला गुरिल्ला युद्ध जैसा हमला था। एक बार फिर प्रदर्शनकारियों से संख्या में कम पड़ने पर पुलिस वाले बचने के लिए भागने लगे। लेकिन जिलाधिकारी कार्यालय तीन तरफ से इमारतों से घिरा होने की वजह से पुलिसवालों के लिए छुपने की कोई जगह नहीं रही।
ऐसे नाजुक हालात में स्थिति परनियंत्रण करने के लिए, पुलिस वालों और कार्यालय के कर्मचारियों की जीवन रक्षा के लिए, जनता की और सरकार की संपत्ति को बचाने के लिए आखिरकार पुलिस को गोलियां चलानी पड़ी। कुछ प्रदर्शनकारियों की मृत्यु इसी वजह से हुई।
अगर संकट के उस पल पर पुलिस वाले आकर गालियां नहीं चलाते तो कार्यालय के दसियों कर्मी और 100 से ज्यादा पुलिस वाले हिंसक भीड़ का शिकार हो गये होते। तुतुकुड़ी के वे प्रदर्शनकारी आतंकवादियों जैसे ही लग रहे थे। उनसे पुलिस ने सैनिकों की तरह टक्कर ली थी। मुझे तो लगा था जैसे उस दिन उस दंगे में उस हिंसक भीड़ के हाथों मेरी मौत होने वाली थी। लेकिन पुलिस वालों ने देवदूत की तरह आकर हम सब की जान बचा ली। मैं उन्हें नमन करती हूं और हमारी जिंदगी बचाने के लिए उनका बार-बार शुक्रिया करती हूं।