चर्च सबसे बड़ा अलोकतांत्रिक घुट घुटकर मर रहे बिशप नन और पादरी ?

चर्च खुद कितना लोकतांत्रिक है इसका खुलासा कई बार हो चुका है। चर्च के सिस्टम में घुट—घुटकर अनेक पादरी, नन और बिशप मर रहे हैं। कई किताबें हैं जो चर्च की पोल खोलती हैं

कैथोलिक चर्च देश में लोकतंत्र पर खतरे की बात करता है वह अपने गिरेबान में झांक कर देखे कि चर्च के अंदर कितना लोकतंत्र है , अनेक पादरी और नन चर्च के सिस्टम के अंदर घुट रहे हैं , उनके पास बाहर आने का काेई रास्ता नहीं है , उनकी पीड़ा काे सुनने वाला काेई नही हैं। वेटिकन के प्रतिनिधि बिशप चर्च के अधिनायकवाद के खिलाफ खड़े हाेने वालाें का कितनी निर्दयता से दमन करते है यह छिपा हुआ नहीं है। इनके मुंह से लोकतंत्र पर खतरे की बात सुन कर हंसी आती है।

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले सत्तारूढ़ दल के खिलाफ अभियान चलाने की तैयारी में चर्च मैदान में उतर आया है। दिल्ली कैथोलिक चर्च के आर्कबिशप अनिल कोटो की पादरियों आैर चर्च कलीसियाआें को लिखी चिट्ठी यही बताती है , कि देश में लोकतंत्र पर खतरे की आड़ में चर्च भाजपा नीत सरकार काे सत्ता से बाहर करने की तैयारी में हैं। इसके लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है। हालांकि चर्च के अंदर कितना लोकतंत्र है यह वह अच्छी तरह जानते हैं।

जबसे केंद्र में मोदी सरकार बनी है चर्च लगातार कर रहा है हमले

चर्च द्वारा सरकार विरोधी अभियान चलाने पर अधिकतर बुद्धिजीवी ईसाइयाें की कम संख्या का हवाला देकर इसके अप्रभावशाली होने की बात करते है , वह यह भूल जाते है कि चर्च की जड़ें बहुत गहरी हैं आैर वह लाेगाें के मत काे प्रभावित करने की क्षमता रखता है। केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद चर्च लगातार इस सरकार पर हमलावर रहा है , हालांकि सरकार की तरफ से चर्च या ईसाई समाज के खिलाफ ऐसा काेई काम नही किया गया जिससे उन्हें काेई नुकसान हाे।

पोप को भारत आने का अधिकारिक न्यौता न देने से सरकार से नाराज है चर्च

जमीनी सचाई यह है कि दूसरी सरकारों के समय तुष्टिकरण की राजनीति का पूरा लाभ उठाने वाले चर्च नेताआें काे अपना महत्व कम हाेता दिखाई दे रहा है। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि कैथाेलिक चर्च लम्बे समय से पोप फ्रांसिस काे भारत बुलाना चाहता था लेकिन सरकार द्वारा पाेप को आधिकारिक न्यौता न मिलने से वह माेदी सरकार से नाराज है।

इससे पहले गुजरात चुनाव में भी चर्च ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का सीधा प्रयास किया था। इसकी शुरूआत दिसंबर 2017 के गुजरात विधानसभा चुनावों के साथ शुरू हुई , जब गांधीनगर के आर्कबिशप थॉमस मैकवान ने "राष्ट्रवादी ताकतों" को हराने और उन्हें "देश पर कब्जा करने" से रोकने के लिए एक पत्र जारी किया। उन्होंने अपने पत्र में लिखा था कि "गुजरात में चुनाव परिणाम से अंतर आ सकता हैं"। थॉमस मैकवान ने चिट्ठी लिखकर ईसाई समुदाय के लोगों से अपील की थी कि वे गुजरात चुनाव में ‘राष्ट्रवादी ताकतों ’ को हराने के लिए मतदान करें। यह स्पष्ट तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय एवं चुनाव आयोग की आचार संहिता का उल्लंघन किया गया था।

ये एक दो प्रयास नहीं है नागालैण्ड में सम्पन्न हुए चुनाव में भी बैपटिस्ट चर्च की तरफ से कहा गया था कि जीसस के अनुयायी पैसे और विकास की बात के नाम पर ईसाई सिद्दांतो और श्रद्धा को उन लोगों के हाथों में न सौंपे जो यीशु मसीह के दिल को घायल करने की फिराक में रहते हैं। राज्य में बैपटिस्ट चर्चों की सर्वोच्च संस्था नागालैंड बैपटिस्ट चर्च परिषद् ने नगालैंड की सभी पार्टियों के अध्यक्षों के नाम यह एक खुला खत लिखा था।

किन्तु इस बार तो राजधानी दिल्ली में बैठे आर्कबिशप अनिल कोटो कह रहे हैं , कि सिर्फ पादरी ही नहीं बल्कि हर क्रिश्चियन संगठन और उसकी ओर झुकाव रखने वाले संगठन और धार्मिक संस्थायें भी उनके इस अभियान में उनका साथ दें , हमें अगले चुनाव को ध्यान में रखते हुए हर शुक्रवार को इस अभियान के तहत काम करना चाहिए। आर्कबिशप के इस अभियान को अब कैथोलिक बिशप कांफ्रेंस अॉफ इंडिया का खुला समर्थन हासिल है।

भारत के संविधान को धता बता रहा है चर्च

एक तरफ तो चर्च संवैधानिक संस्थाओ को बचाने की अपील कर रहा है । लेकिन दूसरी तरफ भारत के संविधान को धता बताया जा रहा है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशनुसार कोई भी धर्म , जाति , समुदाय या भाषा इत्यादि के आधार पर वोट नहीं मांग सकता। यहां तक कि धार्मिक नेता भी अपने समुदाय को किसी उम्मीदवार या पार्टी के पक्ष में मतदान करने के लिए नहीं कह सकता। किन्तु , जिनकी आस्थाएं भारत के संविधान की जगह राजनीतिक दलों में हों , उन्हें संविधान या संवैधानिक संस्थाओं के निर्देशों की चिंता नहीं होती बल्कि , उन्हें इसकी चिंता अधिक रहती है , कि उनके स्वार्थ एवं अन्य एजेंडे पूरे हाे सकें।

कैथोलिक चर्च देश में लोकतंत्र पर खतरे की बात करता है अनेक पादरी , नन और बिशप उच्च अधिकारियों के तुगलकी फरमानाें से त्रस्त होकर चर्च के अंदर घुट - घुट कर मर रहे हैं। उस पर कोई बात नहीं करता। चर्च के तानाशाही रवैये के विराेध में अवाज़ उठाने के कारण दिल्ली कैथोलिक आर्च डायोसिस के दलित फादर विलियम प्रेमदास चाैधरी का कितना उतपीड़न किया गया। कई साल उन्हें बिना काम के काळजी होम ( Clergy Home) में रखा गया , 2012 में "ऐन अनवांटेड प्रीस्ट" के नाम से उन्होंने अपनी आत्मकथा भी लिखी।

जेसुइट फादर एंथोनी फर्नांडिस पर लिखी पुस्तक ऊंटेश्वरी माता का महंत कैथोलिक चर्च के लोकतंत्र की पाेल खाेल देती है। फादर विलियम और जेसुइट फादर एंथोनी फर्नांडिस अब नहीं रहे। सिस्टर जेस्मी की आत्मकथा चर्च के अधिनायकवादी तंत्र से भारतीय समाज का परिचय करवाती है।

आज वह लोग भी चुप्पी साधे बैठे हैं , जो पंथ और मजहब को राजनीति से दूर रखने की वकालत करते हैं , जिन्हें भारत माता की जय और वन्देमातरम कहने मात्र से देश दो फाड़ होता दिखाई देता है। लोकतांत्रिक ताने-बाने को खतरा मानने वाले बुद्धिजीवी इस चर्च राजनीति से किनारा करते नजर आ रहे है ? हां यदि किसी मठ के महंत ने ऐसा कोई पत्र लिखा होता तो हंगामा हो जाता। टीवी चैनलों पर पैनल डिस्कशन होते , लेकिन अब सब चुप हैं। यह देश संविधान से चलेगा। मोदी रोको मिशन में भारत के चर्चों के अभी से ही जुटने से यह बात साबित होती है कि वेटिकन सिटी इशारों पर सबकुछ हो रहा है।