कितने दिन चलेगी कुमार स्वामी और कांग्रेस की दोस्ती, सरकार गिराने का रहा है कांग्रेस का इतिहास
   दिनांक 25-मई-2018
आखिरकार कुमार स्वामी कर्नाटक के मुख्यमंत्री बन गए। कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर ने कर्नाटक में मिलकर सरकार तो बना ली लेकिन कितने दिन यह सरकार चल पाएगी इस बारे में कहना मुश्किल है। कांग्रेस का इतिहास रहा है कि जब-जब उसने किसी के साथ मिलकर सरकार बनाई वह ज्यादा दिनों तक नहीं चली। कांग्रेस को सत्ता में रहने की आदत है। लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाना उसका स्वभाव है। कांग्रेस के इतिहास पर सैकड़ों किताबें लिखी जा सकती हैं

नेहरू ने गिराई थी केरल की सरकार
केरल की ईएमएस नंबूदिरीपाद की सरकार देश में ही नहीं, दुनिया की पहली चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार थी। जिसने पांच अप्रैल 1957 को शपथ ली थी। इस सरकार पर देश और लोकतंत्र विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाते हुए तत्कालीन राज्यपाल बरगुल्ला रामकृष्णा राव ने नंबूदिरी सरकार के खिलाफ केंद्र सरकार को रिपोर्ट भेजी थी। जिसके बाद संविधान के अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल करते हुए तत्कालीन नेहरू सरकार ने नंबूदिरीपाद सरकार को 31 जुलाई 1959 को बर्खास्त कर दिया था। यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि 1959 वह साल है, जब कांग्रेस नेता महावीर त्यागी के तमाम विरोधों के बावजूद महज 42 साल की अपनी बेटी इंदिरा गांधी को पंडित नेहरू ने विशाल व्यक्तित्वों से भरी कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया था। कांग्रेस की राजनीति और इतिहास के शोधार्थी पत्रकार रशीद किदवई के मुताबिक उन दिनों राजनीतिक हलकों में यह कहानी चर्चा में थी कि केरल के राज्यपाल से इंदिरा गांधी ने ही मनमाफिक रिपोर्ट तैयार कराई थी।

देवगौड़ा की सरकार को भी गिरा चुकी है कांग्रेस
जिस कुमार स्वामी की अगुआ में कांग्रेस कर्नाटक में लहालोट हो रही है, उन्हीं के पिता एच डी देवगौड़ा की सरकार को 1997 में कांग्रेस ने अपनी बैसाखी खींचकर गिरा दिया था। तब के कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने इसके लिए कोई खास वजह नहीं बताई थी। इसके चलते देवेगौड़ा महज दस महीने ही प्रधानंत्री रह पाए। एक जून 1996 को प्रधानमंत्री बने एचडी देवेगौड़ा संसद में विश्वास मत हार गए। उनकी सरकार के खिलाफ 292 मत पड़े थे, जबकि 158 सांसदों ने उनका साथ दिया था। इसके बाद 11 अप्रैल 1997 को उनकी सरकार गिर गई थी। विश्वास मत पर बहस का जवाब देते हुए देवेगौड़ा ने कहा था, ‘इफ डेस्टिनी इज देयर, आई विल राइज फ्रॉम द डस्ट (यदि किस्मत होगी तो मैं धूल से उठ खड़ा होउंगा।) ’ देवेगौड़ा दोबारा धूल से खड़ा तो नहीं हुए, लेकिन वे कांग्रेस को खरी-खरी सुनाते रह गए और उनके बेटे उसी कांग्रेस के सहयोग से सरकार बनाने निकल पड़े।
 
गुजराल की सरकार भी कांग्रेस ने गिराई थी
कांग्रेस ने देवेगौड़ा के बाद उसी की बैसाखी के सहारे प्रधानमंत्री बने इंद्रकुमार गुजराल की सरकार से भी समर्थन वापस ले लिया था। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने मंत्रिमंडल से द्रमुक को हटाने की मांग को लेकर गुजराल के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार से समर्थन वापस लिया था। कांग्रेस ने राजीव गांधी की हत्या की जांच करने वाले जैन कमीशन की अंतरिम रिपोर्ट के बाद गुजराल सरकार से समर्थन वापस लेने की मांग की।
 
आपातकाल कांग्रेस का काला अध्याय
लोकतंत्र की रक्षा का दावा करने वाली कांग्रेस के इतिहास में 25 जून 1975 की आधी रात लागू आपातकाल काले अध्याय के तौर पर दर्ज है। आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार जुलाई 1979 में ही गिर गई। यह भी कांग्रेस की ही साजिश थी।

चरण सिंह की सरकार भी गिराई
देश के इतिहास की बेहतर सरकारों में शुमार मोरारजी सरकार के गिरने के बाद समाजवादी धड़े के ही बड़े नेता और मोरारजी सरकार में गृहमंत्री रहे चौधरी चरण सिंह ने इंदिरा गांधी की अगुआई वाली कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सहयोग से सरकार बनाई। इस सरकार ने 28 जुलाई 1979 को शपथ लिया और तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने उन्हें 20 अगस्त 1979 तक अपना बहुमत साबित करने का वक्त दिया। लेकिन बहुमत साबित करने से पहले चौधरी चरण सिंह की सरकार से 19 अगस्त 1979 को कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद चौधरी चरण सिंह के नाम एक रिकॉर्ड दर्ज हो गया, संसद का सामना न करने वाले प्रधानमंत्री का रिकॉर्ड।

जासूसी का आरोप लगाकर चंद्रशेखर की सरकार भी कांग्रेस ने गिराई
1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की अगुआई में बनी सरकार का जब पतन हुआ तो तत्कालीन जनता दल में विभाजन हुआ। 140 सदस्यों वाले जनता दल के 54 सांसद समाजवाद के प्रखर नेता, आचार्य नरेंद्र देव के शिष्य चंद्रशेखर के साथ गए। तब राजीव गांधी की अगुआई वाली 195 लोकसभा सांसदों वाली कांग्रेस ने उन्हें समर्थन दिया। जिसके बाद 10 नवंबर 1990 को चंद्रशेखर सरकार ने शपथ ली। चंद्रशेखर सरकार ने बेपटरी हो चुकी देश की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए कई कदम उठाए। सरकार की लोकप्रियता और साख बढ़ रही थी। यह कांग्रेस के राजनीतिक हितों के अनुकूल नहीं था, लिहाजा हरियाणा पुलिस के सिपाहियों द्वारा राजीव गांधी की जासूसी कराने के आरोप में दो मार्च 1990 को कांग्रेस ने महज चार महीने पुरानी चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस ले लिया।

राज्यों में राज्यपालों का इस्तेमाल करके भी कितनी बार गिराई सरकार
कांग्रेस ने कितनी बार उसने राज्यपालों का इस्तेमाल करके सरकारें गिराईं, यह फेहरिस्त बड़ी लंबी है। जब 1980 में इंदिरा गांधी की सरकार आई तो उन्होंने उन सभी राज्यों की सरकारों को बर्खास्त कर दिया, जो जनता पार्टी या गैर कांग्रेसी दलों की थीं। उनका तर्क था कि देश का जनमत इन पार्टियों के खिलाफ है। उन्होंने 1983 में हिमाचल निवासी आंध्र के राज्यपाल ठाकुर रामलाल के जरिए राज्य की एनटी रामाराव सरकार को बर्खास्त करके भास्कर राव को मुख्यमंत्री बना दिया था।। उन्होंने इसी दौरान जम्मू-कश्मीर की फारूख अब्दुल्ला सरकार को बर्खास्त करके उनके बहनोई जीएम शाह को मुख्यमंत्री बनाया। माना जाता है कि इस घटना ने भी राज्य में आतंकवाद का बीज रोपने में बड़ी भूमिका निभाई।


ज्योति बसु की सरकार भी कांग्रेस ने गिराई
पश्चिम बंगाल में मार्च 1967 में ज्योति बसु के नेतृत्व में बनी सीपीआई (एम), सीपीआई और बांग्ला कांग्रेस की संयुक्त मोर्चा सरकार मार्च को तत्कालीन राज्यपाल धर्मवीर का इस्तेमाल करते हुए इंदिरा गांधी ने बर्खास्त कर दिया था। तब धर्मवीर की नियुक्ति का वामपंथी दलों ने विरोध किया था। इसके बाद बिना बहुमत परीक्षण के ही नवंबर, 1967 में धर्मवीर ने ज्योति बसु के बहुमत के दावे को ख़ारिज कर दिया था, जिसके बाद इंदिरा गांधी ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था।

करुणानिधि सरकार को भी इंदिरा गांधी ने किया था बर्खास्त
31 जनवरी 1976 को तमिलनाडु की करुणानिधि सरकार को इंदिरा सरकार ने बर्ख़ास्त कर दिया था। करूणानिधि का दोष इतना भर था कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से 1975 में आपातकाल लगाने के फ़ैसले को चुनौती दी थी। 1985 से 1989 तक राजीव सरकार के गृहमंत्री रहे बूटा सिंह ने राज्यों में विरोधी दलों की इतनी सरकारें बर्खास्त कीं, जिसका सानी नहीं मिलता।